पिछली बार हमने व्यवस्था और अराजकता के बीच के उस बेहद महीन और लगभग अदृश्य धागे पर चर्चा की थी, जिसे यह सभ्य समाज ‘अनुशासन’ का नाम देता है—मानो जंगली भेड़ियों को लोहे की जंजीर में बांध देने से वे पालतू कुत्ते बन जाएंगे। लेकिन आज, जब मैं इस बदबूदार बार के सबसे अंधेरे कोने में बैठा हूँ, जहाँ हवा में सस्ती व्हिस्की, पुराने पसीने और टूटे हुए सपनों की गंध घुली हुई है, तो मुझे एक अजीब सा एहसास हो रहा है। मेरी ग्लास में बर्फ पिघल रही है, धीरे-धीरे, निर्दयता से। यह पिघलती हुई बर्फ मुझे याद दिलाती है कि जिसे तुम गर्व से ‘कॉर्पोरेट रणनीति’ या ‘बिजनेस मॉडल’ कहते हो, वह ब्रह्मांड के सबसे क्रूर, सबसे आदिम और अटल कानून—ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम (Second Law of Thermodynamics)—के सामने घुटने टेकने से पहले की एक आखिरी, कराहती हुई चीख है।
तुम जिसे ‘विजन’ कहते हो, वह वास्तव में एक भूखे आवारा कुत्ते की उस हताशा जैसी है जो कचरे के ढेर में मांस का सड़ा हुआ टुकड़ा ढूंढ रहा है, और उसे लगता है कि उसने कोई खजाना खोज लिया है।
अव्यवस्था का नृत्य
शुद्ध भौतिकी और निर्मम वास्तविकता की भाषा में, तुम्हारा ‘बिजनेस’ एक ‘अपव्ययी संरचना’ (Dissipative Structure) मात्र है। इल्या प्रिगोगिन ने शायद इसे विज्ञान का नाम देकर नोबेल पुरस्कार जीता होगा, लेकिन अगर तुम इसकी त्वचा उधेड़ कर देखो, तो यह एक परजीवी का खेल है। एक सफल कंपनी वह नहीं है जो समाज के लिए ‘मूल्य’ पैदा करती है, जैसा कि तुम्हारे एमबीए के प्रोफेसर झूठ बोलते हैं। एक सफल कंपनी वह ब्लैक होल है जो अपने आसपास के वातावरण से उच्च गुणवत्ता वाली ऊर्जा—यानी मासूमों का वक्त, मजदूरों का खून-पसीना और निवेशकों का अंधा पैसा—गिद्ध की तरह सोखती है।
और बदले में यह सिस्टम बाहर क्या फेंकता है? भारी मात्रा में ‘एंट्रॉपी’। यानी कचरा, मानसिक अवसाद, प्रदूषण और उन निरर्थक ईमेलों का पहाड़ जिनका कोई मतलब नहीं है। तुम जिसे ‘इनोवेशन’ कहते हो, वह वास्तव में तुम्हारी उस बौखलाहट का नतीजा है जब तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारी तिजोरी में छेद है। जब तुम अपनी टीम को कॉन्फ्रेंस रूम में बंद करके ‘सिनर्जी’ और ‘कल्चर’ का पाठ पढ़ाते हो, तो तुम दरअसल उस घर्षण (Friction) को कम करने की एक नाकाम कोशिश कर रहे होते हो जो तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं की मशीन को जाम कर रहा है। यह ठीक वैसा ही है जैसे दिल्ली की जानलेवा गर्मी में एक पुराना, खटारा एयर कंडीशनर चलाने की कोशिश करना; तुम अपनी केबिन में थोड़ी सी ठंडक पाने के लिए बाहर की पूरी दुनिया को और भी ज्यादा नर्क बनाने पर तुले हो। तुम्हारी ‘ग्रोथ’ दरअसल दूसरों की तबाही की कीमत पर खरीदी गई एक अस्थायी और अनैतिक राहत है।
संरचना का भ्रम
इस दुनिया में ‘स्थिरता’ एक ऐसा झूठ है जिसे कमजोर लोग रात में खुद को दिलासा देने के लिए बोलते हैं। जो स्थिर है, वह मृत है। एक व्यापार को जिंदा रहने के लिए ‘गैर-रेखीय’ (Non-linear) होना ही पड़ता है क्योंकि बाजार कभी संतुलन में नहीं होता; वह एक ऐसे जुआखाने की तरह है जहाँ हर कोई एक-दूसरे की जेब काटने की ताक में है, और घर हमेशा जीतता है। यहाँ भारतीय ‘जुगाड़’ कोई महान दर्शन नहीं है, बल्कि एक अपराधी की वह चालाकी है जो पकड़े जाने से ठीक पहले अपना रास्ता बदल लेता है। गणितीय रूप से, यह एक ऐसी प्रणाली है जो न्यूनतम प्रयास में अधिकतम जटिलता का दिखावा करती है ताकि असली खोखलापन दुनिया की नजरों से छिपा रहे।
लेकिन इंसान की मूर्खता और दंभ की कोई सीमा नहीं है। अपनी मानसिक दरिद्रता और बिखरे हुए नाकाम विचारों को ‘व्यवस्थित’ करने के भ्रम में लोग न जाने क्या-क्या प्रपंच रचते हैं। वे बाजार में जाकर महँगे प्रीमियम लेदर जर्नल खरीदते हैं, इस उम्मीद में कि 25,000 रुपये के मरे हुए जानवर की खाल पर अपनी घटिया योजनाएं लिखने से उनके दिमाग की ‘एंट्रॉपी’ कम हो जाएगी। यह कितना घिनौना मजाक है कि तुम अपनी बौद्धिक कंगाली को ढंकने के लिए उस चमड़े का सहारा ले रहे हो, जिसने तुमसे कहीं अधिक गरिमा और उद्देश्य के साथ अपना जीवन जिया था। वह डायरी अब सिर्फ तुम्हारी उन महत्वाकांक्षाओं का कब्रिस्तान है जो कभी हकीकत का सूरज नहीं देख पाएंगी। तुम शब्दों को कैद कर सकते हो, लेकिन अराजकता को नहीं।
अनिवार्य विसर्जन
सच्चाई यह है कि हर संगठन, चाहे वह कितना भी विशाल या शक्तिशाली क्यों न हो, अपने खुद के अहंकार के भार तले दबने के लिए ही अभिशप्त है। जैसे-जैसे एक कंपनी का आकार बढ़ता है, उसकी ‘सूचनात्मक एंट्रॉपी’ (Informational Entropy) एक लाइलाज कैंसर की तरह फैलती है। फैसले लेने की ताकत खत्म हो जाती है, नौकरशाही की परतें जम जाती हैं, और पूरी प्रणाली इतनी अधिक आंतरिक ‘ऊष्मा’ पैदा करने लगती है कि वह भीतर से ही जलकर राख हो जाती है। जिसे तुम ‘मार्केट डिसरप्शन’ कहकर उत्सव मनाते हो, वह वास्तव में एक ‘फेज ट्रांजिशन’ (Phase Transition) है—एक ऐसी स्थिति जहाँ पुरानी, सड़ी-गली संरचना अब ऊर्जा के प्रवाह को संभालने में सक्षम नहीं रहती और ताश के पत्तों के महल की तरह भरभरा कर गिर पड़ती है।
तुम्हारी ‘सस्टेनेबल ग्रोथ’ (Sustainable Growth) की बातें उतनी ही खोखली और नकली हैं जितनी कि वह कड़क चाय जो इस बार का वेटर मुझे पिछले आधे घंटे से पिलाने की कोशिश कर रहा है, यह जानते हुए भी कि इसमें सिर्फ शक्कर, पानी और धोखा है। इस ब्रह्मांड में कुछ भी स्थायी नहीं है, न तुम्हारा मुनाफा, न तुम्हारी विरासत। सब कुछ बिखरने, टूटने, सड़ने और अंततः मिट जाने के लिए बना है। हम बस उस विनाश की प्रक्रिया को थोड़ा धीमा करने का नाटक करते हैं, जिसे तुम जैसे सूट-बूट पहनने वाले मूर्ख बड़े गर्व से ‘मैनेजमेंट’ कहते हैं।
मेरी ग्लास अब पूरी तरह खाली हो चुकी है, और बर्फ का आखिरी टुकड़ा भी उस गंदे पानी में विलीन हो चुका है। इसके साथ ही इस बातचीत की ऊर्जा भी खत्म हो गई है। बाहर सड़क पर वही ट्रैफिक, वही शोर और वही अंतहीन अफरातफरी मेरा इंतजार कर रही है—एक ऐसी दुनिया जहाँ हर कोई अपनी ही एंट्रॉपी में डूब रहा है, और किसी को खबर तक नहीं है।
नर्क में जाओ तुम और तुम्हारा यह छलावा।
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