श्रम का अपव्यय: संगठनात्मक एन्ट्रॉपी और सार्वजनिक शून्यता
जिस ‘करियर’ को तुम अपनी पहचान मानते हो, वह वास्तव में ब्रह्मांड के सबसे क्रूर मजाक—ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम—के खिलाफ एक हताश और बेवकूफी भरी लड़ाई है। तुम्हें लगता है कि तुम समाज का निर्माण कर रहे हो? बकवास। भौतिकी की ठंडी और निर्दयी नजर से देखो तो तुम केवल एक जैविक इंजन हो जो भोजन को ‘व्यर्थ की गर्मी’ (Waste Heat) में बदल रहा है।
ऑफ़िस की वह क्यूबिकल, जिसे तुम अपनी दुनिया समझते हो, इल्या प्रोगोगिन की ‘विघटनकारी संरचना’ (Dissipative Structure) का एक सड़ा हुआ उदाहरण है। एक सरकारी दफ्तर को ही ले लो। वह व्यवस्था बनाए रखने के लिए करोड़ों का टैक्स, बिजली और तुम्हारी जवानी निगलता है, और बदले में बाहर क्या फेंकता है? फाइलें, तनाव, और वातानुकूलित हवा में तैरती हुई बासी समोसे की गंध। यह ‘काम’ नहीं है; यह ब्रह्मांडीय अव्यवस्था को बढ़ाने का एक महंगा नाटक है।
घर्षण और धूल
श्रम (Labor) की परिभाषा को दोबारा लिखो। यह जूल या कैलोरी का खेल नहीं है; यह ‘घर्षण’ की कहानी है। जब एक ‘बाबू’ किसी फाइल को टेबल के एक कोने से दूसरे कोने तक खिसकाता है, तो उस प्रक्रिया में जो ऊर्जा नष्ट होती है, वह किसी ब्लैक होल में गिरने जैसी है। ‘स्मार्ट सिटी’ जैसी परियोजनाएँ और कुछ नहीं, बल्कि एन्ट्रॉपी के खिलाफ एक महंगा विद्रोह हैं। सड़कों को खोदना, धूल उड़ाना और फिर उसे भरना—यह विकास नहीं, यह केवल मिट्टी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का ‘थर्मल वेस्ट’ है।
सिस्टम का हर वह ईमेल जिसे कोई नहीं पढ़ता, हर वह मीटिंग जिसका कोई एजेंडा नहीं होता, वह सब ब्रह्मांड की कुल अव्यवस्था (Entropy) में योगदान दे रहा है। तुम सोचते हो कि तुम ‘वैल्यू ऐड’ कर रहे हो? नहीं, तुम केवल शोर पैदा कर रहे हो। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक पुरानी एंबेसडर कार को हैंडब्रेक लगाकर चलाने की कोशिश करना—इंजन चीख रहा है, धुआं निकल रहा है, टायर जल रहे हैं, लेकिन गाड़ी इंच भर भी नहीं खिसक रही। और इस धुएं को तुम ‘प्रगति’ कहते हो।
वातानुकूलित श्मशान
अब उस तमाशे को देखो जिसे आधुनिक कॉर्पोरेट संस्कृति कहते हैं। यहाँ मनुष्य की भूमिका एक ‘हीट सिंक’ (Heat sink) तक सिमट कर रह गई है। जो काम गणितीय मॉडल और सिलिकॉन चिप्स बिना पसीना बहाए कर सकते हैं, उसके लिए तुम्हें वहां बैठाया गया है ताकि तुम ‘व्यस्त’ दिख सको।
विडंबना देखो, तुम अपनी इस निरर्थक उपस्थिति को जायज ठहराने के लिए क्या-क्या नहीं करते। लोग दो लाख रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सियों पर अपनी पीठ टिकाते हैं, यह सोचकर कि शायद लम्बर सपोर्ट (Lumbar Support) उनकी आत्मा के खालीपन को भर देगा। रीढ़ की हड्डी सीधी रहे या टेढ़ी, क्या फर्क पड़ता है जब दिमाग ही स्प्रेडशीट के उस सेल में कैद है जिसका कोई अर्थ नहीं? यह कुर्सी आराम के लिए नहीं है; यह एक महंगा पिंजरा है जो तुम्हें यह भ्रम देने के लिए बनाया गया है कि तुम्हारी पीड़ा ‘प्रीमियम’ है।
जब एक एल्गोरिदम ट्रैफिक को नियंत्रित करता है, तो वह केवल कारों को नहीं हिलाता, वह शहरी जीवन की थर्मल एन्ट्रॉपी को कम कर रहा होता है। वहां तुम्हारी ‘ड्राइविंग की भावना’ एक बग (Bug) है। सिस्टम को तुम्हारी जरूरत नहीं है, उसे केवल तुम्हारी ऊर्जा चाहिए ताकि वह खुद को ठंडा रख सके। तुम बैटरी हो, और तुम लीक कर रहे हो।
शून्यता का हस्ताक्षर
अंततः, यह सब शून्यता (Void) की ओर जाता है। सार्वजनिक और निजी का भेद मिट चुका है; दोनों ही अब केवल डेटा के विशाल महासागर में उठने वाले बुलबुले हैं। तुम अपनी उपलब्धियों को सहेजने का कितना भी प्रयास कर लो, सब बेकार है।
मूर्ख लोग महंगी चमड़े की डायरियों में अपने ‘विचार’ और ‘लक्ष्य’ लिखते हैं, जिनका दाम किसी गरीब की महीने भर की राशन से ज्यादा है। तुम्हें लगता है कि उस चिकने कागज पर स्याही फेर देने से तुम्हारे विचार अमर हो जाएंगे? वह चमड़ा एक मरे हुए जानवर की खाल है, और तुम्हारे शब्द मरे हुए समय की राख। सौ साल बाद, न तो वह डायरी बचेगी और न ही उस सिस्टम का कोई निशान जिसे तुम आज ‘जीवन’ कहते हो।
हम एक ऐसे बिंदु पर पहुँच रहे हैं जहाँ मानव श्रम केवल एक ‘सिस्टम एरर’ माना जाएगा। हम उस प्रेशर कुकर की सीटी की तरह हैं जो बज तो रही है, लेकिन नीचे आग बुझ चुकी है और अंदर दाल है ही नहीं। बस शोर। बस भाप। बस गर्मी।
अरे भाई! यह व्हिस्की इतनी कड़वी क्यों है? या शायद यह मेरी जुबान का स्वाद है। एक और लाओ, बिना बर्फ के। कम से कम यह नशा तो असली है।
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