पिछली बार जब तुम अपनी ‘श्रम की सार्थकता’ पर दार्शनिक बहस कर रहे थे, तो मुझे तुम्हारी मासूमियत पर तरस आ रहा था। तुम्हारा यह ऑफिस, जिसे तुम अपनी ‘करियर की सीढ़ी’ कहते हो और जहाँ तुम अपनी जवानी घिस रहे हो, वास्तव में एक सड़ता हुआ ढांचा है जिसे भौतिकी की भाषा में ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) कहते हैं। यह शब्द कोई सम्मानजनक उपाधि नहीं है। इसका सीधा और क्रूर मतलब यह है कि तुम एक ऐसी मशीन का तुच्छ पुर्जा हो जो केवल तभी तक जीवित रह सकती है जब तक वह तुम्हारी ऊर्जा, तुम्हारा समय और तुम्हारी मानसिक शांति को जलाकर बाहर राख और धुआं फेंक रही है। इसे समझने के लिए किसी नोबेल पुरस्कार विजेता की जरूरत नहीं है, बस मुंबई की विरार लोकल ट्रेन की उस भीड़ को याद करो जहाँ तुम पसीने और बदबू के बीच बस इसलिए खड़े रह पाते हो क्योंकि चारों तरफ से भीड़ तुम्हें भींच रही है। जिस पल वह बाहरी दबाव हटेगा, तुम और तुम्हारा अस्तित्व वहीं धड़ाम से गिर पड़ोगे। यही तुम्हारी संस्थाओं का कड़वा सच है जिसे तुम ‘विज़न’ और ‘मिशन’ की चाशनी में लपेटकर रोज सुबह निगलते हो।
संरचना (STRUCTURE)
संगठन किसी पवित्र ‘मिशन स्टेटमेंट’ से नहीं, बल्कि नग्न मजबूरी और भारी-भरकम बिजली के बिलों से चलते हैं। जिसे तुम ऑफिस का ‘ऑर्डर’ या अनुशासन कहते हो, वह असल में एक सड़ता हुआ कूड़ेदान है जिसे हर रोज खाली करना पड़ता है, फिर भी बदबू नहीं जाती। ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम चिल्ला-चिल्ला कर कहता है कि इस ब्रह्मांड की हर चीज अंततः कबाड़ और अव्यवस्था (Entropy) में बदल जाएगी। तुम्हारा ऑफिस इस कबाड़ बनने की प्राकृतिक प्रक्रिया को बस थोड़ा धीमा करने का एक महंगा नाटक कर रहा है। इसके बदले में वह तुम्हारी रगों से जीवन निचोड़ रहा है। तुम बाहर से क्लाइंट का पैसा, वेंडिंग मशीन की सड़ी हुई कॉफी और अपनी नसों का तनाव इस सिस्टम में डालते हो ताकि तुम्हारा ‘बॉस’ यह भ्रम पाल सके कि सब कुछ नियंत्रण में है।
यह स्थिति बिल्कुल वैसी है जैसे दिल्ली की जानलेवा गर्मी में एक पुराना, खड़खड़ाता हुआ एसी चलाना। वह कमरा तो शायद ही ठंडा करता है, लेकिन बाहर की गली में इतनी गर्मी और शोर फेंक देता है कि पड़ोसी को लू लग जाए। तुम्हारा कॉर्पोरेट ढांचा भी एक ऐसा ही ‘ओपन सिस्टम’ है जो केवल कचरा, शोर और थकावट पैदा करने के लिए डिजाइन किया गया है। तुम बस उस कचरे के ढेर में दबे हुए एक छोटे से कीड़े हो जो मुगालते में है कि वह ‘वैल्यू एडिशन’ कर रहा है। असल में, तुम बस उस घर्षण को कम करने के लिए लगाए गए एक सस्ते ग्रीस हो जिसकी एक्सपायरी डेट कल ही निकल चुकी है। निर्णय लेना? वह कोई महान कार्य नहीं है। वह तो बस एक टूटे हुए कांच के गिलास पर टेप चिपकाने जैसा है। एक बार बॉस ने कोई गलत फैसला लिया, तो समय की अपरिवर्तनीयता उसे वापस नहीं ला सकती। तुम बस उसे छुपाने के लिए और अधिक ऊर्जा बर्बाद करते हो। यह प्रक्रिया वैसी ही है जैसे फटे हुए जूते को पॉलिश से चमकाना—अंदर से पैर गीला ही रहेगा, बस दुनिया को दिखेगा नहीं।
ऊष्मागतिकी (THERMODYNAMICS)
जब तुम मीटिंग्स में ‘डिसीजन मेकिंग’ के गणितीय मॉडल और फ्लोचार्ट्स की बात करते हो, तो तुम वास्तव में अपनी लाचारी को जार्गन से ढंक रहे होते हो। यहाँ जिसे तुम ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ कहते हो, वह असल में उन हताश लोगों की दबी हुई चीखें हैं जिन्हें एक कांच के केबिन में बंद कर दिया गया है। कभी अपने मैनेजर को ध्यान से देखा है? वह उस महंगी चमड़े की कुर्सी पर बैठा कोई लीडर नहीं है। वह कुर्सी बस एक महंगा ‘हीट सिंक’ है जो उसकी अक्षमता, घबराहट और बढ़ते हुए ब्लड प्रेशर की गर्मी को सोख रही है। वह व्यक्ति खुद एक ऐसी लिथियम-आयन बैटरी है जो फूल चुकी है और कभी भी फट सकती है।
सूचना का प्रवाह इस तंत्र में वैसा ही है जैसे किसी हाईवे के किनारे वाले ढाबे की वह पीली दाल जिसमें दाल के दाने कम और पानी ज्यादा होता है। ऊपर से आदेश ‘शाही पनीर’ बनकर चलते हैं, लेकिन जब तक वे पदानुक्रम की सीढ़ियों से गिरते-पड़ते तुम्हारे डेस्क तक पहुँचते हैं, वे केवल सड़ा हुआ, बेस्वाद पानी रह जाते हैं। यह ऊर्जा का ह्रास है, सूचना का क्षय है। तुम चाहे कितनी भी ‘ब्रेनस्टॉर्मिंग’ कर लो, तुम बस उस ठंडी होती हुई चाय की तरह हो जो कप के किनारे पर जमी हुई मलाई के साथ अपनी मौत का इंतज़ार कर रही है। तुम्हारा पूरा दिन बस उस मलाई को हटाने की जद्दोजहद में निकल जाता है, जबकि असल में चाय पीने लायक बची ही नहीं है। हर सुबह तुम जो अलार्म लगाते हो, वह असल में तुम्हारे जैविक ‘सिस्टम’ के फेल होने की पहली चेतावनी है। तुम उस स्मार्टफोन की तरह हो जिसकी बैटरी 15% पर लाल हो जाती है, लेकिन तुम्हें फिर भी 10 घंटे का ओवरटाइम करना है। यह तुम्हारी आत्मा का ‘थर्मल डिग्रेडेशन’ है।
प्रलय (CHAOS)
अंत में, हर संगठन, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक ऐसी मौत की ओर बढ़ रहा है जिसे कोई ‘एजाइल’, ‘स्क्रम’ या ‘सिक्स सिग्मा’ नहीं बचा सकता। जिसे तुम ‘ग्रोथ’ या विकास कहते हो, वह असल में कैंसर की तरह अनियंत्रित रूप से बढ़ती हुई एंट्रॉपी है। एक दिन सिस्टम में इतनी अराजकता और अक्षमता जमा हो जाएगी कि तुम्हारा वह लैपटॉप भी उसे प्रोसेस नहीं कर पाएगा और सब कुछ धुआं बन जाएगा। तुम जिसे ‘इकोनॉमिक क्राइसिस’ कहते हो, वह प्रकृति का तरीका है उस कचरे को साफ करने का जो तुमने ‘प्रोग्रेस’ के नाम पर दशकों से जमा किया है।
अगली बार जब तुम्हारा बॉस ‘सिनर्जी’, ‘पैराडाइम शिफ्ट’ या ‘टीम वर्क’ जैसे शब्द उछाले, तो उसे याद दिलाना कि वह बस एक डूबती हुई नाव में च्युइंग गम से छेद बंद करने की कोशिश कर रहा है। या फिर बेहतर होगा कि तुम अपनी उस कैंटीन की प्लेट को देखो जिसमें समोसा अब ठंडा, सख्त और तेल से लथपथ हो चुका है। उस समोसे की हालत और तुम्हारे करियर की गतिशीलता में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही बासी तेल में तले गए थे, दोनों ही थोड़े समय के लिए गर्म और आकर्षक थे, और दोनों का ही अंत कचरे के डिब्बे में होना तय है। सब कुछ व्यर्थ है, और तुम्हारी एक्सेल फाइलें उस व्यर्थता का प्रमाण पत्र हैं। अब जाओ और अपना वह अधूरा काम पूरा करो, क्योंकि तुम्हारी एकमात्र उपयोगिता उस मशीन को एक मिनट और चलाने की है जो तुम्हें ही निगल रही है।
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