पिछली बार जब हम उस ‘कॉर्पोरेट वफादारी’ नामक बीमारी पर हंस रहे थे, तो वह किसी पुराने, बदबूदार मोज़े की तरह लग रही थी—जिसमें छेद हो चुके हैं लेकिन फेंकने में एक अजीब सा मोह महसूस होता है। आज, जब शराब का नशा थोड़ा गहरा है, तो आओ इस तमाशे को भौतिकी की क्रूर और ठंडी निगाहों से देखते हैं। जिसे तुम और तुम्हारे जैसे लाखों ‘प्रोफेशनल्स’ सुबह नौ से पांच तक ‘मूल्य निर्माण’ कहते हो, वह असल में क्या है? वह ब्रह्मांड के कैनवास पर केवल ऊर्जा की बर्बादी का एक भद्दा धब्बा है।
व्यर्थता का ऊष्मायन
सच्चाई कड़वी है, पर सुन लो। जिसे तुम अपनी ‘कड़ी मेहनत’ और ‘समर्पण’ कहते हो, वह ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) की दृष्टि से केवल ‘हीट लॉस’ या ऊष्मा का रिसाव है। एन्ट्रापी का नियम किसी दयालु ईश्वर का बनाया हुआ नहीं है; वह एक जल्लाद है। तुम वातानुकूलित ऑफिसों में बैठकर जो सैकड़ों पावरपॉइंट स्लाइड्स बनाते हो, वे ब्रह्मांड की व्यवस्था को रत्ती भर भी नहीं सुधारते। वे केवल तुम्हारे मस्तिष्क की बहुमूल्य ग्लूकोज ऊर्जा को व्यर्थ की गर्मी में बदल रहे हैं और उसे वातावरण में उगल रहे हैं।
यह दृश्य बिल्कुल वैसा ही है, जैसे मुंबई की लोकल ट्रेन में भीड़ से पिचका हुआ कोई पसीने से लथपथ आदमी, अपने स्मार्टफोन की आखिरी 2% बैटरी को किसी बेतुके गेम पर खर्च कर रहा हो। स्क्रीन की रोशनी और फोन का गर्म होना—बस यही हासिल है। बाद में सब अंधेरा। हम जिसे ‘संगठनात्मक संस्कृति’ (Organizational Culture) का नाम देते हैं, वह एन्ट्रापी के उस तूफ़ान के खिलाफ खड़ा होने वाला एक कमज़ोर तंबू है। यह सड़क किनारे मिलने वाले उस ‘स्पेशल समोसे’ जैसा है, जिसे उसी काले पड़ चुके तेल में दसवीं बार तला गया है। ऊपर से गर्म और कुरकुरा, लेकिन अंदर केवल बासीपन और बीमारी। जिसे तुम काम का ‘जुनून’ कहते हो, वह दरअसल सिस्टम के क्रैश होने से ठीक पहले निकलने वाली चिंगारी है—एक ‘बग’, जिसे तुम अपनी आत्मा समझ बैठे हो।
बिखराव का सौंदर्यशास्त्र
इन दिनों हर कोई ‘विकेंद्रीकृत’ (Decentralized) व्यवस्थाओं और सिलिकॉन की तर्क-शक्ति (Silicon Logic) का गुणगान कर रहा है। मूर्ख समझते हैं कि ये गणितीय प्रेत (Calculated Ghosts) हमें मानवीय त्रुटियों से बचा लेंगे। लेकिन अगर इल्या प्रिगोगिन के ‘विघटनकारी संरचनाओं’ (Dissipative Structures) के सिद्धांत को थोड़ा भी समझा होता, तो जानते कि कोई भी जटिल प्रणाली जीवित रहने के लिए अपने अंदर के कचरे—एन्ट्रापी—को बाहर फेंकने के लिए मजबूर है।
इन आधुनिक, स्वचालित संगठनों में निर्णय अब मानवीय विवेक से नहीं, बल्कि ‘सांख्यिकीय प्रतिरोध’ के आधार पर लिए जाते हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी चाट के ठेले पर लगी भीड़। किसी को स्वाद का पता नहीं, लेकिन चूंकि दस लोग लाइन में हैं, तो ग्यारहवां भी वहीं खड़ा होगा। ‘सत्य’ अब वह नहीं है जो सही है, बल्कि वह है जो डेटा के समुद्र में सबसे आसानी से तैर सके। हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ ‘सार्वजनिक हित’ केवल एक एल्गोरिदम का ठंडा आउटपुट होगा। हम सब एक विशाल मशीन के बदले जा सकने वाले पुर्जे हैं, जो घिसने का इंतजार कर रहे हैं।
इस अस्तित्ववादी शून्यता के बीच, विडंबना देखो। कुछ लोग अपनी खोखली ‘विशिष्टता’ को बचाने के लिए बीस हजार रुपये की यह चमड़े की नोटबुक खरीदते हैं। घर का किराया भरने के लाले पड़े हैं, लेकिन इनके तुच्छ और रद्दी विचारों को कागज पर उतारने के लिए इटालियन लेदर चाहिए। डिजिटल दासता में जकड़े हुए लोग मरे हुए जानवर की खाल में अपनी मुक्ति खोज रहे हैं। क्या ही उच्च कोटि का मजाक है यह।
यांत्रिक शून्यवाद
इन सिलिकॉन परिपथों का उदय मनुष्य की चेतना का विस्तार नहीं, बल्कि उसके ‘शोर’ (Noise) का दमन है। भौतिकी की नजर में तुम्हारा गुस्सा, तुम्हारा प्रेम, या महीने के आखिर में होने वाली वह घबराहट—सब केवल ‘थर्मल नॉइज़’ है। ये मशीनें इस शोर को छान देती हैं। परिणाम? एक ऐसी दुनिया जो उस हाई-टेक शॉपिंग मॉल की तरह है जहाँ एसी इतना तेज है कि हड्डियों में ठंडक बैठ जाए। सब कुछ व्यवस्थित, सब कुछ चमकदार, लेकिन हवा में जीवन की गंध नहीं, केवल बासी सैनिटाइजर की महक है। यह प्लास्टिक में लिपटे उस सैंडविच जैसा है जो दिखता ताज़ा है, पर जिसका स्वाद महीनों पहले मर चुका है।
उफ्फ, थक गया हूँ मैं इन भारी शब्दों से।
अंत में बात सिर्फ इतनी है: श्रम का कोई आंतरिक मूल्य नहीं है। यह मृत्यु नामक परम संतुलन (Equilibrium) तक पहुँचने से पहले, समय की हत्या करने का एक सजीला तरीका है। ब्रह्मांड को तुम्हारी उत्पादकता या तुम्हारे एक्सेल शीट्स से कोई लेना-देना नहीं है; उसे केवल तुम्हारी जैविक गर्मी चाहिए ताकि वह अपनी एन्ट्रापी बढ़ा सके। हम सब धीरे-धीरे ठंडे हो रहे हैं।
गिलास खाली हो गया है। अब मुझे घर जाने दो।
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