एन्ट्रॉपी का कसाईखाना

सड़न, पसीना और थर्मोडायनामिक्स

पिछली बार जब हम इस बदबूदार ढाबे की टूटी हुई बेंच पर बैठे थे, तो तुम अपनी ‘तिमाही-समीक्षा’ (Quarterly Review) और ‘करियर-पाथ’ को लेकर बहुत उत्साहित थे। तुम्हारी आंखों में वह चमक थी जो आमतौर पर उन मुर्गों की आंखों में होती है जिन्हें पता नहीं होता कि कसाई छुरी तेज कर रहा है। आज, जब तुम्हारे चेहरे पर थकान की वह कालिख पुती हुई है, तो शायद तुम मेरी बात सुनने के लिए तैयार हो। जिसे तुम ‘कॉर्पोरेट जगत’ कहते हो, वह न तो कोई परिवार है और न ही कोई मंदिर। वह भौतिकी (Physics) का एक क्रूर प्रयोग है। तुम्हारा ऑफिस, वह कांच की इमारत, असल में एक विशालकाय ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है—एक ऐसी मशीन जो केवल इसलिए खड़ी है क्योंकि वह लगातार ऊर्जा निगल रही है और बदले में अव्यवस्था (Entropy) उगल रही है।

इल्या प्रिगोजिन को नोबेल पुरस्कार मिला था यह समझाने के लिए कि अराजकता में व्यवस्था कैसे बनी रहती है, लेकिन अगर वे तुम्हारे ऑफिस की एक भी ‘All-Hands Meeting’ देख लेते, तो शायद अपना मेडल वापस कर देते। एक संगठन खुद को जिंदा रखने के लिए बाहर से ‘लो-एन्ट्रॉपी’ ऊर्जा (तुम्हारी जवानी, तुम्हारी नींद, तुम्हारा मानसिक स्वास्थ्य) खींचता है और उसे प्रोसेस करके ‘हाई-एन्ट्रॉपी’ कचरे (पीपीटी स्लाइड, बेमतलब के ईमेल, और अंतहीन ज़ूम कॉल्स) में बदल देता है। तुम काम नहीं कर रहे हो दोस्त; तुम बस उस सिस्टम के रेडिएटर हो जो गर्म होकर भाप छोड़ रहा है ताकि सीईओ का केबिन ठंडा रह सके।

डर का गणित और महंगी स्याही

अब जरा उस ‘फ्री एनर्जी प्रिंसिपल’ (Free Energy Principle) पर बात करते हैं जिसे न्यूरोसाइंटिस्ट कार्ल फ्रिस्टन ने दुनिया को दिया। यह सिद्धांत कहता है कि हर जैविक प्रणाली—चाहे वह तुम्हारा दिमाग हो या तुम्हारी कंपनी—अपने अस्तित्व को बचाने के लिए ‘आश्चर्य’ (Surprise) को कम करना चाहती है। जिसे तुम ‘मैनेजमेंट’ कहते हो, वह वास्तव में भविष्य की अनिश्चितता से बचने का एक महंगा नाटक है। तुम्हारे बॉस को इनोवेशन नहीं चाहिए, उसे ‘प्रेडिक्शन एरर’ (Prediction Error) का जीरो होना चाहिए। वह तुमसे दस बार एक ही रिपोर्ट इसलिए नहीं मांगता कि उसे डेटा चाहिए, बल्कि इसलिए मांगता है क्योंकि उसकी अपनी न्यूरोलॉजिकल चिंता उसे चैन से बैठने नहीं देती।

यह सब कितना हास्यास्पद है। तुम अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखकर एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा बनते हो जो तुम्हें केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा मानता है। और इस आत्म-सम्मान की हत्या पर हस्ताक्षर करने के लिए तुम क्या इस्तेमाल करते हो? शायद एक बेहद महंगा मोंटब्लैंक फाउंटेन पेन, जिसकी कीमत तुम्हारी एक महीने की ईएमआई से भी ज्यादा है। तुम्हें लगता है कि उस भारी, काली रेज़िन और सोने की निब से किए गए दस्तखत तुम्हारी गुलामी को कुछ ‘वज़न’ देंगे। लेकिन सच यह है कि वह पेन सिर्फ एक औजार है, जिससे तुम अपनी ही रिहाई की याचिका खारिज करते हो। स्याही नहीं, उसमें तुम्हारा समय बह रहा है।

झुंड की मानसिकता और रीढ़ का दर्द

तुम जिसे ‘टीम वर्क’ या ‘कल्चर’ कहते हो, वह भी थर्मोडायनामिक्स का एक भद्दा मजाक है। लोग एक साथ इसलिए काम नहीं करते क्योंकि वे एक-दूसरे को पसंद करते हैं, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि ‘अकेलेपन का सरप्राइज’ बहुत डरावना होता है। यह भेड़ों का झुंड है जो एक-दूसरे से सटकर खड़ा है, ताकि जब भेड़िया (ले-ऑफ) आए, तो शायद पड़ोसी पहले खाया जाए। इसे हम न्यूरोसाइंस में ‘प्रिसिजन वेटिंग’ (Precision Weighting) का खेल कहते हैं—भीड़ में रहकर हम अपनी सुरक्षा के भ्रम को ज्यादा वजन देते हैं।

और इस भ्रम को बनाए रखने की शारीरिक कीमत क्या है? L4-L5 डिस्क का खिसकना। सर्वाइकल का दर्द। तुम दिन के 12 घंटे एक अप्राकृतिक मुद्रा में बैठे रहते हो, स्क्रीन को घूरते हुए, अपनी ही कोशिकाओं को धीरे-धीरे मारते हुए। और इसका समाधान क्या निकालते हो? तुम बाजार जाते हो और अपने लिए एक आलीशान एर्गोनोमिक लेदर चेयर खरीदते हो। तुम्हें लगता है कि इटैलियन चमड़ा और मेमोरी फोम तुम्हारे जीवन के गलत निर्णयों को सोख लेगा। कितनी दयनीय स्थिति है—तुम उस पिंजरे को मखमली बना रहे हो जिसमें तुम्हें कैद किया गया है। वह कुर्सी तुम्हें आराम नहीं देती, वह तुम्हें उस जगह पर जमे रहने में मदद करती है जहाँ तुम अंदर से सड़ रहे हो।

कचरे का सौंदर्यशास्त्र

आखिरकार, यह सब ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम (Second Law of Thermodynamics) के सामने घुटने टेक देगा। जिसे तुम ‘वैल्यू क्रिएशन’ कहते हो, वह ब्रह्मांडीय स्तर पर केवल गर्मी का फैलाव है। तुम चाय की टपरी पर मिलने वाली उस खौलती हुई चाय और किसी फाइव-स्टार होटल की कॉफी में फर्क समझते हो? दोनों सिर्फ कैफीन और पानी हैं। लेकिन होटल तुमसे उस ‘व्यवस्था’ (Order) के पैसे वसूलता है जो उसने वहां बनाई है—सन्नाटा, एसी, और नकली मुस्कान। तुम कॉफी नहीं पी रहे, तुम अपने जीवन के शोर (एन्ट्रॉपी) को कुछ पल के लिए म्यूट करने की फीस भर रहे हो।

कितनी थकान होती है यह सब समझाते हुए। घर जाओ। अपने लैपटॉप को खोलो और उस स्प्रेडशीट को पूरा करो जिसका इस ब्रह्मांड के भविष्य पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ने वाला। हम सब अंत में ‘हीट डेथ’ (Heat Death) का ही शिकार होंगे, जहाँ न कोई बॉस होगा, न कोई डेडलाइन, और न ही कोई बोनस। तब तक, अपने उस महंगे पेन और आरामदायक कुर्सी के साथ इस सड़े हुए नाटक का आनंद लो। और हाँ, बिल चुका देना।

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