कॉर्पोरेट कड़ाही

यह जो तुम सुबह-सुबह अपनी रीढ़ की हड्डी को टेढ़ा करके, गले में पट्टा (टाई) बांधकर किसी ‘कॉर्पोरेट विजन’ की जुगाली करने निकलते हो, असल में तुम बस अपनी अंतड़ियों के सड़ने की प्रक्रिया को एक नया नाम दे रहे हो। जिसे तुम ‘करियर’ कहते हो, वो दरअसल एक ऐसी मशीन है जो तुम्हारी जवानी को चूसती है और बदले में तुम्हें एक ऐसा ‘समोसा’ थमा देती है जो उसी तेल में सौ बार तला गया है जिसमें कल की गंदगी तैर रही थी। ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम कोई विज्ञान की किताब का पन्ना नहीं है, बल्कि तुम्हारे उस बॉस की मुस्कुराहट है जो जानता है कि तुम धीरे-धीरे राख हो रहे हो। ब्रह्मांड का परम सत्य ‘एंट्रॉपी’ है—यानी अव्यवस्था की ओर बढ़ना—और तुम्हारी कंपनी बस उस अव्यवस्था को थोड़ी देर के लिए टालने का एक महंगा और भद्दा नाटक है।

सड़ांध का गणित और दफ्तर की घुटन

जिसे तुम ‘ऑफिस कल्चर’ कहते हो, वो कुछ नहीं बस एक बंद कमरे में जमा हुई पचास लोगों की पसीने वाली बदबू, सस्ते रूम फ्रेशनर और घटिया इंस्टेंट कॉफी का एक जहरीला मिश्रण है। एक व्यावसायिक संगठन कोई ‘ओपन सिस्टम’ नहीं, बल्कि वो पुराना नाला है जिसमें तुम जितना भी साफ पानी (निवेशक का पैसा) डालो, निकलेगा कीचड़ ही। तुम्हारी ‘सिनर्जी’ असल में वो घर्षण है जो तब पैदा होता है जब दो बेकार लोग एक-दूसरे से टकराकर अपनी नाकामियों को छुपाने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में जो ‘हीट’ पैदा होती है, उसे तुम ‘वर्क प्रेशर’ कहते हो।

हकीकत तो ये है कि तुम्हारा पूरा अस्तित्व उस हर्मन मिलर की कुर्सी (Herman Miller Aeron) की जाली में फंसा हुआ है। तुमने इसे अपनी ईगो शांत करने के लिए दो लाख में खरीदा था, यह सोचकर कि यह तुम्हारे ‘लम्बर सपोर्ट’ को बचाएगी, पर असल में यह तुम्हारी रीढ़ की हड्डी को नहीं, बल्कि तुम्हारी औकात को दर्शाती है। तुम उस कुर्सी पर बैठकर खुद को ‘सीईओ’ जैसा महसूस करते हो, जबकि तुम बस एंथ्रोपी की भट्टी में जलने वाला एक और कोयला हो। क्या बकवास है।

घर जाने की जल्दी में तुम रेड लाइट पर खड़े होकर उस फटेहाल रिक्शे वाले को देखते हो और तुम्हें लगता है कि तुम उससे बेहतर हो, जबकि तुम दोनों ही उसी ऊष्मीय बर्बादी (Thermal Waste) के शिकार हो। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और तुमने अपनी आत्मा एक मोंटब्लैंक पेन (Montblanc Meisterstück) की निब में गिरवी रख दी है। वही पेन जिससे तुम उन फाइलों पर दस्तखत करते हो जिनका कोई अर्थ नहीं है, सिवाय इसके कि वो रद्दी वाले के तराजू का वजन बढ़ा सकें।

बासी समोसा और मेटाबॉलिज्म का ढोंग

सोचो, उस कड़ाही के बारे में जिसमें तेल काला पड़ चुका है। वो तेल ‘इवोल्यूशन’ नहीं कर रहा, वो बस जल रहा है और कार्सिनोजेनिक (cancer-causing) हो रहा है। तुम्हारा स्टार्टअप भी वही कड़ाही है। तुम उसमें नए ‘टैलेंट’ का बेसन डालते हो, उसे ‘इन्नोवेशन’ की आंच पर सेंकते हो, और अंत में जो निकलता है वो एक बदहजमी पैदा करने वाला प्रॉडक्ट होता है जिसे बाजार ‘क्रांतिकारी’ कहता है। ये ‘मिनिमम एंथ्रोपी प्रोडक्शन’ का नाटक बंद करो। इल्या प्रिगोजिन ने जिसे ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ कहा था, वो तुम्हारी कंपनी है—जो जिंदा रहने के लिए समाज की ऊर्जा खाती है और बदले में तनाव और कचरा बाहर फेंकती है।

संगठन का विकास सिर्फ इस बात पर निर्भर करता है कि तुम कितनी सफाई से अपनी गंदगी पड़ोस वाली कंपनी या ग्राहकों के मत्थे मढ़ सकते हो। तुम्हारी ‘क्रिएटिविटी’ बस डोपामाइन की वो आखिरी बूंद है जो तब टपकती है जब महीने की तीस तारीख को मोबाइल पर ‘सैलरी क्रेडिट’ का मैसेज आता है। उस पैसे से तुम फिर वही ज़हर खरीदते हो—महंगी शराब, वीकेंड गेटअवे, और वो झूठा सुकून जो तुम्हें अगले महीने फिर से उसी मशीन में कूदने के लिए तैयार करता है।

पागलपन है ये।

ये कोई विकास नहीं है, ये बस एक धीमी मौत है जिसे तुमने ‘ग्रोथ हैकिंग’ का नाम दे रखा है। पागलपन की हद तो ये है कि तुम्हें लगता है कि तुम कुछ ‘बिल्ड’ कर रहे हो। तुम बस ब्रह्मांड के उस कचरे के ढेर में अपना हिस्सा जोड़ रहे हो जो एक दिन सब कुछ निगल जाएगा। जैसे हलवाई बासी समोसे को दोबारा तल कर नया बताता है, वैसे ही तुम पुरानी स्प्रेडशीट में रंग भरकर उसे ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ कहते हो।

व्यवस्था का पाखंड और अंतिम राख

हर ऑर्गनाइजेशन का अंत वही है—खामोशी और धूल। तुम चाहे कितनी भी ‘लीन मैनेजमेंट’ की बातें कर लो, तुम्हारी फाइलें एक दिन दीमकों का भोजन बनेंगी। ये जो तुम ‘लीडरशिप’ के नाम पर गला फाड़ते हो, ये उस मरते हुए जानवर की चीख जैसा है जिसे पता है कि उसका समय समाप्त हो चुका है। तुम बस उस ऊर्जा को इधर-उधर फेंक रहे हो जिसे तुम संभाल नहीं सकते। ये पूरा ढांचा, ये पूरी सभ्यता, बस एक ऐसी कोशिश है कि किसी तरह उस अंधेरे को टाला जा सके जो खिड़की के बाहर खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा है।

जिसे तुम ‘प्रक्रिया सुधार’ (Process Improvement) कहते हो, वो टाइटैनिक पर कुर्सियाँ जमाने जैसा है। जहाज डूब रहा है, बर्फ का पहाड़ (एंट्रॉपी) सामने है, और तुम बहस कर रहे हो कि कुर्सी का मुंह किस तरफ होना चाहिए। अगली बार जब तुम उस शानदार दिखने वाले फाउंटेन पेन से अपनी अटेंडेंस रजिस्टर या किसी डील पर साइन करो, तो याद रखना कि तुम अपनी मौत के वारंट पर दस्तखत कर रहे हो। संगठन विकसित नहीं होते, वे बस सड़ने के नए और अधिक जटिल तरीके ढूंढते हैं। और तुम? तुम उस सड़न की प्रक्रिया में सबसे छोटे और सबसे नगण्य कीड़े हो। चलो, अब अपना लैपटॉप बंद करो और उस अंधेरी सड़क पर निकल जाओ जहाँ तुम्हारी ‘वैल्यू’ एक धूल के कण से ज्यादा कुछ नहीं है। बकवास बंद करो।

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