क्रूर ज्यामिति

पसीने और तेल की ज्यामिति: सार्वजनिक लूट और मशीनी गुलामी का अनुकूलन

जिस पल आप सुबह की लोकल ट्रेन या खचाखच भरी मेट्रो में कदम रखते हैं, वहां हवा में तैरती सड़े हुए पसीने, गीले जूतों और सस्ते तंबाकू की मिली-जुली बदबू—यही वह असली ‘डेटा’ है जिसे कोई भी सांख्यिकीय मॉडल (Statistical Model) पकड़ने की हिम्मत नहीं करता। हम जिसे ‘लोक कल्याण’ या ‘पब्लिक सेक्टर’ कहते हैं, वह असल में कागजों पर चल रही एक ज्यामितीय धोखाधड़ी है। एक सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) पर, आपकी यह रोजमर्रा की जद्दोजहद सिर्फ एक ‘शोर’ (Noise) है, जिसे एक कुशल एल्गोरिदम जल्द ही फिल्टर करके बाहर फेंक देगा।

दिमाग का दही हो गया है यह सोचकर कि हम इसे ‘विकास’ कहते हैं।

मजदूरी का मायाजाल और एंट्रॉपी का खेल

श्रम के मूल्य को लेकर हम भावुक हो जाते हैं। हमें लगता है कि दफ्तर की फाइलों में सिर खपाना और ‘बाबू’ बनकर रीढ़ की हड्डी टेढ़ी करना राष्ट्र निर्माण है। बकवास। यह ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) का सबसे भद्दा मजाक है। एक सरकारी दफ्तर असल में एक ‘एंट्रॉपी मशीन’ है, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाली मानव ऊर्जा (Human Energy) को निम्न गुणवत्ता वाली रद्दी—यानी फाइलों और मेमो—में बदला जाता है। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के नजरिए से देखें, तो एक क्लर्क का पूरा जीवन उस ‘डायवर्जेंस’ को कम करने में बीत जाता है जो वास्तविकता और सरकारी आंकड़ों के बीच है।

बाजार में समोसे तलने वाले उस हलवाई को देखिए, जिसकी कड़ाही का तेल पिछले हफ्ते से नहीं बदला गया है। उसकी वह काली, चिपचिपाती कड़ाही हमारे आर्थिक ढांचे का सबसे सटीक रूपक है। हम सब उसी तेल में तल रहे हैं, बस तापमान अलग-अलग है। आपकी मेहनत उस पुराने रिक्शे की बैटरी जैसी है जिसे रात भर चार्ज करने के बाद भी वह केवल दो किलोमीटर चल पाती है और फिर दम तोड़ देती है। क्या यह पागलपन नहीं है?

फिशर सूचना मैट्रिक्स: नया सूदखोर

अब जरा उस गणितीय क्रूरता पर नजर डालें जो इस तमाशे को चला रही है। विज्ञान में जिसे ‘फिशर सूचना मैट्रिक्स’ (Fisher Information Matrix) कहा जाता है, उसे मैं आधुनिक युग का सबसे निर्मम सूदखोर मानता हूँ। यह मैट्रिक्स किसी लाला के बही-खाते की तरह है, जिसे आपकी बेटी की शादी या आपके पिता की बीमारी से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल यह मापता है कि आपके ‘डेटा’ से कितनी सटीक जानकारी—यानी मुनाफा—निचोड़ा जा सकता है।

जब नीतियां बनती हैं, तो वे इसी ज्यामिति का पालन करती हैं। यह व्यवस्था यह नहीं देखती कि आप भूखे हैं; वह यह देखती है कि भुखमरी का सांख्यिकीय विचलन (Statistical Deviation) स्वीकार्य सीमा के भीतर है या नहीं। और इस विचलन को मैनेज करने वाले लोग कौन हैं? वे वही लोग हैं जो करदाताओं के खून-पसीने की कमाई से खरीदी गई, तीन लाख रुपये की उस एर्गोनोमिक हरमन मिलर कुर्सी पर अपना वजन टिकाए बैठे हैं। मजे की बात यह है कि यह कुर्सी उनकी उस रीढ़ को सहारा देने का दावा करती है, जो नैतिक रूप से कब की टूट चुकी है। वे उस पर झूलते हुए ‘गरीबी उन्मूलन’ की फाइलें आगे बढ़ाते हैं, जैसे कि कुशन की नरमी से भुखमरी की कठोरता कम हो जाएगी।

सब ढोंग है।

स्वचालन का ठंडा तर्क

अब हम उस दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ फैसले इंसानों के हाथ से निकलकर उन ठंडे, भावहीन ‘स्वत: निष्पादन आदेशों’ (Automated execution orders) के पास जा रहे हैं। आप इसे तकनीक की क्रांति कहते हैं, मैं इसे कसाईखाने का आधुनिकीकरण कहता हूँ। जब एक मशीन शासन करती है, तो वह ‘करुणा’ को एक अकुशल चर (Inefficient Variable) मानकर समीकरण से हटा देती है।

भविष्य का प्रशासक कोई नेता नहीं, बल्कि एक उच्च-आयामी (High-dimensional) स्पेस में तैरता हुआ ‘लॉस फंक्शन’ (Loss Function) होगा। उसका काम न्याय देना नहीं, बल्कि सिस्टम के ‘ग्रेडिएंट डिसेंट’ (Gradient Descent) को अनुकूलित करना है। यानी, कम से कम ऊर्जा खर्च करके आपको कतार में खड़ा रखना। और इस कतार में खड़े होकर आप जिस कागज पर अपनी शिकायत लिखते हैं, उसकी औकात रद्दी से ज्यादा नहीं है।

लेकिन हां, उस रद्दी पर हस्ताक्षर करने के लिए साहब को एक शानदार मॉन्टब्लैंक की कलम जरूर चाहिए। वह काली स्याही, जो उस कलम से बहती है, असल में उस व्यवस्था का गाढ़ा, जमा हुआ रक्त है जिसे वे ‘प्रशासन’ कहते हैं। वह कलम इतनी चिकनी चलती है कि भ्रष्टाचार भी ‘सुलेख’ (Calligraphy) जैसा दिखने लगता है।

अंततः, यह पूरा ढांचा—यह श्रम, यह ज्यामिति, यह शासन—ताश के पत्तों का एक ऐसा महल है जिसे गणित की एक ठंडी हवा कभी भी ज़मींदोज़ कर सकती है। हम बस अपनी-अपनी कुर्सियों पर चिपके हुए उस हवा का इंतजार कर रहे हैं। मेरी चाय ठंडी हो चुकी है और उसमें तैरती मलाई अब मुझे उस ‘ब्यूरोक्रेसी’ की याद दिला रही है जो हर चीज के ऊपर जम जाती है और नीचे की गर्मी को बाहर नहीं आने देती।

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