ज्यामितीय नरक

उस कॉन्फ्रेंस रूम की घुटन भरी हवा में तैरती ठंडी, बासी कॉफी की महक और बगल में बैठे सहकर्मी के मुंह की दुर्गंध—यह आधुनिक कॉर्पोरेट अस्तित्व का ‘इत्र’ है। हम यहाँ जिस प्रक्रिया को ‘रणनीतिक निर्णय’ (Strategic Decisions) जैसे भारी-भरकम शब्दों से नवाजते हैं, वह वास्तव में जिम्मेदारी से बचने का एक भद्दा खेल है, ठीक वैसे ही जैसे ताश के पत्तों में ‘पत्ता फेंकने’ (Passing the buck) का खेल होता है। आप उस कुर्सी पर समाज या कंपनी के भले के लिए नहीं बैठे हैं; आप वहां केवल एक मूक पशु की तरह बैठे हैं जो वेतन रूपी चारे का इंतजार कर रहा है।

इंसान अपनी कायरता को छुपाने के लिए इस दलदल को ‘सहमति’ या ‘सहानुभूति’ जैसे मीठे शब्दों से रंगने की कोशिश करता है। लेकिन अगर आप सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के निर्मम लेंस से इस कमरे को देखें, तो आपको कोई सुंदर संवाद नहीं दिखेगा। वहां केवल एक विकृत सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) दिखाई देगा, जहाँ अलग-अलग राय रखने वाले सांख्यिकीय मॉडल एक-दूसरे की आंतें चबा रहे हैं। यह कोई बौद्धिक मिलन नहीं, बल्कि एक ज्यामितीय नरसंहार है।

घिसती हुई वक्रता: भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन का दर्द

लोकतंत्र या सामूहिक निर्णय लेना इसलिए विफल नहीं होता कि हमारे पास आदर्शों की कमी है। यह इसलिए विफल होता है क्योंकि उस स्थान की ‘वक्रता’ (Curvature) हमारी सहनशक्ति की सीमा से परे मुड़ चुकी है। विचारों का टकराव कोई दार्शनिक बहस नहीं है। यह ठीक वैसा ही अनुभव है जैसे बारिश के दिन खचाखच भरी मुंबई की लोकल ट्रेन में, किसी अजनबी का गीला, गंदा छाता आपकी पतलून से रगड़ खाता है। वह चिपचिपाहट, वह शारीरिक घृणा—वही असली ‘असहमति’ है।

गणित की भाषा में कहें तो, जैसे ही अलग-अलग राय वाले लोग एक कमरे में जमा होते हैं, सामाजिक विकल्पों के मैनिफोल्ड पर ‘मीट्रिक टेंसर’ (Metric Tensor) सूज जाता है और ‘फिशर सूचना’ (Fisher Information) का घनत्व विस्फोटक हो जाता है। यह एक सस्ते स्मार्टफोन की बैटरी की तरह है जो ओवरहीटिंग के कारण किसी भी पल फटने वाली है। जरा उस बॉस को देखिए जो ‘टीम स्प्रिट’ की दुहाई दे रहा है। उसकी चिकनी, पसीने से लथपथ कोहनी उस इतालवी हैंडमेड लेदर डेस्क पैड पर चिपकी हुई है। क्या आपको लगता है कि वह चमड़ा किसी प्रीमियम अनुभव के लिए है? नहीं, वह महज़ उस संगठन की अक्षमता और उस व्यक्ति के खोखले अहंकार को सोखने वाला एक महंगा स्पंज है। इस कमरे की ज्यामिति को सीधा करने के लिए तर्क की नहीं, बल्कि किसी के विनाश की आवश्यकता है।

सांख्यिकीय शोर का शोरबा

‘सहमति’ सभ्यता द्वारा रचा गया सबसे बड़ा धोखा है। तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) के अनुसार, यह केवल आपके मस्तिष्क द्वारा ‘भविष्यवाणी त्रुटि’ (Prediction Error) को कम करने का एक आलसी तरीका है। जब हम कहते हैं कि हम सहमत हैं, तो इसका मतलब है कि हमने सोचना बंद कर दिया है। यह उस बासी, उबले हुए शोरबे (Stew) की तरह है जहाँ सब्जियां, मांस और मसाले इतना गल चुके हैं कि अब उनका कोई अपना अस्तित्व नहीं बचा। सब कुछ एक गाढ़े, भूरे, बेस्वाद कीचड़ में बदल चुका है।

इस अराजक शोरबे में व्यक्तिगत इच्छाशक्ति ‘परस्पर एन्ट्रापी’ (Mutual Entropy) के बढ़ने के साथ ही दम तोड़ देती है। यदि आप इस निर्णय प्रक्रिया के भारी बोझ तले अपनी इंसानियत को थोड़ा भी महसूस करना चाहते हैं, तो शायद आप उस ₹80,000 की फाउंटेन पेन को अपनी कांपती उंगलियों से भींच सकते हैं। जब उस सोने की निब से व्यर्थ के दस्तावेजों पर स्याही बहेगी, तो शायद आपको लगेगा कि आप अभी भी जीवित हैं। लेकिन याद रहे, वह महंगा पेन आपकी शक्ति का प्रतीक नहीं है; वह आपकी नपुंसकता को सजाने का एक खिलौना मात्र है।

अंततः, हमारे दिमाग का हार्डवेयर ही दोषपूर्ण है जो डेटा को भावनाओं के रूप में प्रोसेस करता है। जब कोई CEO मंच पर ‘विज़न’ की बात करता है, तो वह वास्तव में आपके कानों में शोर-रद्द करने वाला (Noise-cancelling) हेडफोन लगा रहा होता है ताकि आप उस सांख्यिकीय विसंगति को न सुन सकें। रीमैनियन ज्यामिति (Riemannian Geometry) में सबसे छोटा रास्ता ढूंढना इस कीचड़ भरे मैनिफोल्ड में असंभव है। बैठक खत्म होने के बाद आपके पास जो बचता है, वह कोई समाधान नहीं, बल्कि 1% बैटरी पर टिमटिमाते फोन जैसी हताशा है। अगली बार जब कोई ‘रचनात्मक चर्चा’ की मांग करे, तो उसे फिशर सूचना मैट्रिक्स की उस क्रूरता का अहसास कराइए जो न तो माफ करती है और न ही भूलती है। अंधेरा ही एकमात्र स्थिरांक है।

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