ज्यामितीय पाखंड

पिछली बार जब मैं ‘श्रम की निरर्थकता’ पर अपना एकालाप दे रहा था, तो मैंने कहा था कि पसीना बहाना केवल ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) का एक अपरिहार्य उपोत्पाद है। मुझे याद है कि आप लोगों ने उस समय अपनी नज़रें फेर ली थीं। तो आज, चलिए उस ढोंग की परतें छीलते हैं जिसे ये सूट-बूट वाले ‘सार्वजनिक हित’ या ‘पब्लिक गुड’ कहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि यह वास्तव में क्या है? यह एक सांख्यिकीय झूठ है, जिसे ‘नैतिकता’ के सस्ते रैपर में लपेटा गया है।

असल में, जिसे हम ‘संगठन’ कहते हैं, वह कुछ और नहीं बल्कि एक बिना खिड़की वाला, पसीने की बदबू से भरा कमरा है जहाँ हर कोई यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि उनकी अज्ञानता दूसरों की तुलना में अधिक ‘रणनीतिक’ है। हम इसे ‘सिस्टम’ कहते हैं, लेकिन यह अराजकता का एक महंगा संस्करण है।

भ्रम का बाज़ार

जब कोई सीईओ मंच पर खड़ा होकर ‘सामाजिक मूल्य’ की बात करता है, तो मुझे पुराने दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर बिकने वाले उस ठंडे, बासी समोसे की याद आती है। आप जानते हैं न? वह समोसा जिसे कब तला गया था, यह इतिहासकार भी नहीं बता सकते। ऊपर से सुनहरा, लेकिन अंदर केवल हवा और सड़ा हुआ आलू। हम जिसे ‘लोकतंत्र’ या ‘कॉर्पोरेट गवर्नेंस’ कहते हैं, वह सूचना विज्ञान (Information Science) की दृष्टि से केवल एक व्यवस्थित ‘शोर’ (Noise) है।

इंसानी भावनाएं, जिन्हें हम ‘सहानुभूति’ या ‘नैतिकता’ कहते हैं और जिनका हम इतना गुणगान करते हैं, वास्तव में हमारे जैविक न्यूरल नेटवर्क के पुराने पड़ चुके कोड में मौजूद कुछ ‘बग्स’ हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आपके सस्ते स्मार्टफोन की बैटरी कड़कड़ाती ठंड में 20% पर पहुँचते ही बिना किसी तर्क के अचानक दम तोड़ देती है। हम जिसे ‘न्याय’ कहते हैं, वह केवल सूचना के वितरण में आई एक अस्थायी और भ्रामक स्थिरता है—सड़ांध शुरू होने से ठीक पहले का सन्नाटा। कितना हास्यास्पद है कि हम इस बग को ‘मानवता’ कहते हैं।

ज्यामितीय क्रूरता

अब थोड़ा गंभीरता का नाटक करते हैं, क्योंकि बिना भारी शब्दों के मेरी व्हिस्की हजम नहीं होती। यदि हम इस ‘सार्वजनिकता’ के तमाशे को ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के चश्मे से देखें, तो किसी भी संगठन का ‘मूल्य’ उसके मापदंडों के स्थान (Parameter Space) में एक विकृत ‘मेट्रिक टेन्सर’ (Metric Tensor) के रूप में दिखाई देता है। यहाँ ‘फिशर सूचना’ (Fisher Information) ही वह क्रूर पैमाना है जो तय करता है कि ‘नागरिक’ नामक डेटा पॉइंट से कितनी कुशलता से संसाधन निचोड़े जा सकते हैं।

कल्पना कीजिए कि एक ‘डिसीजन मैनिफोल्ड’ (Decision Manifold) है—एक बहुआयामी, दलदली सतह जिस पर किसी संगठन की नीतियां रेंगती हैं। हम सोचते हैं कि हम स्वतंत्र इच्छा से निर्णय ले रहे हैं, लेकिन हम केवल उस सतह के ढलान (Gradient) का अनुसरण कर रहे होते हैं। एक आम कर्मचारी के लिए, यह मैनिफोल्ड बारिश के बाद दिल्ली की उन संकरी गलियों जैसा है, जहाँ हर कदम पर कीचड़ उछलता है। हम बस ‘सबसे कम प्रतिरोध’ वाले रास्ते पर फिसल रहे हैं, जिसे हम गलती से ‘प्रगति’ समझ लेते हैं।

इस शोर और गंदगी से बचने के लिए, कुलीन वर्ग के लोग सेनहाइज़र के अल्ट्रा-प्रीमियम हेडफ़ोन जैसा कुछ कानों में ठूंस लेते हैं। इसकी कीमत एक औसत क्लर्क के तीन महीने के वेतन से अधिक है, और यह केवल इसलिए खरीदा जाता है ताकि वे बाहर सड़क पर मची चीख-पुकार को ‘म्यूट’ कर सकें और एसी कमरे में बैठकर ‘शांति’ का अनुभव कर सकें। विडंबना देखिए—सच्चाई को न सुनने के लिए आपको पूंजीवाद की सबसे ऊँची कीमत चुकानी पड़ती है।

फिर वे एक पेलिकन का गोल्ड-प्लेटेड फाउंटेन पेन निकालते हैं—जो इतना महंगा है कि उससे स्याही नहीं, बल्कि अहंकार बहता है—और उससे एक मेमो पर हस्ताक्षर करते हैं जो अंततः कूड़ेदान में ही जाएगा। यह सब एक ज्यामितीय तमाशा है।

मशीनी तानाशाही

और अब, उस ‘स्वचालित नौकरशाह’ (Automated Bureaucrat) की बात करते हैं जिसे लोग आजकल भविष्य का देवता मान रहे हैं। जब हम शासन को एल्गोरिदम को सौंपते हैं, तो हम किसी उच्च बुद्धिमत्ता को आमंत्रित नहीं कर रहे हैं। हम बस अपनी खुद की मूर्खता को ‘स्केल’ कर रहे हैं। ये मशीनें, जिन्हें आप पूजते हैं, केवल एक ‘लॉस फंक्शन’ (Loss Function) को कम करने की कोशिश कर रही भूखी जानवर हैं।

इन मशीनों के लिए, मानवीय ‘विविधता’ केवल एक गणितीय ‘वेक्टर’ है जिसे सामान्य किया जाना है। जिसे हम ‘समावेशिता’ कहते हैं, वह गणितीय रूप से केवल एक ‘कोवेरिएंट डेरिवेटिव’ (Covariant Derivative) है जो यह सुनिश्चित करता है कि सिस्टम का ढांचा पूरी तरह से ढह न जाए और मुनाफे का प्रवाह बना रहे। हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ नीतियां ‘भावनाओं’ से नहीं, बल्कि ‘ज्यामितीय स्थिरता’ से तय होंगी।

वहाँ न तो कोई ‘लोकहित’ होगा और न ही कोई ‘अन्याय’—सिर्फ एक ठंडा, निर्जीव और अत्यधिक कुशल डेटा पॉइंट होगा। यह वैसा ही अनुभव होगा जैसे किसी फाइव-स्टार होटल में आपने कड़क चाय मांगी हो, और बदले में आपको एक कप गर्म पानी थमा दिया जाए जिसमें रंग तो है, लेकिन चाय की पत्ती का नामोनिशान नहीं। तकनीक हमें सुविधा तो देती है, लेकिन जीवन का ‘स्वाद’ छीन लेती है। सब कुछ फीका, सब कुछ मानकीकृत।

छोड़ो, यह व्हिस्की भी अब पानी जैसी लग रही है। अगली बार जब आप किसी ‘लीडर’ को सार्वजनिक भलाई के बारे में चिल्लाते हुए सुनें, तो बस मुस्कुराइए। याद रखिए कि वह केवल एक संभाव्यता वितरण (Probability Distribution) के मापदंडों को बदलने की कोशिश कर रहा है ताकि उसकी खुद की एन्ट्रापी कम बनी रहे। आप और मैं केवल सांख्यिकीय अवशेष हैं। अब मुझे घर जाने दो, इससे पहले कि मैं इस बार के बिल का ज्यामितीय विश्लेषण शुरू कर दूँ।

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