बासी समोसा

फफूंद और फ्रिक्शन

तुम्हें लगता है कि हम ‘सभ्यता’ का निर्माण कर रहे हैं? बकवास। कोरी बकवास। जरा उस बासी समोसे के बारे में सोचो जो स्टेशन के बाहर उस ठेले पर तीन दिन से पड़ा है। बाहर से देखो तो एकदम सख्त, कुरकुरा, सुनहरा। लेकिन जैसे ही तुम उसे तोड़ते हो—अंदर से सड़ी हुई आलू की बदबू और फफूंद का एक ऐसा भभका निकलता है जो तुम्हारी आंतों को निचोड़ कर रख देता है। जिसे तुम ‘बड़ी कंपनी’ या ‘कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर’ कहते हो, वो वही समोसा है।

तुम सोचते हो कि दस और लोगों को नौकरी पर रखने से काम तेज होगा? यह सदी का सबसे बड़ा झूठ है। हर नया सिर जिसे तुम ऑफिस में लाते हो, वह काम करने के लिए नहीं आता; वह घर्षण (friction) पैदा करने आता है। वह सांस लेता है, वह जगह घेरता है, और सबसे बुरी बात—वह ‘बात’ करता है। तुम इसे ‘टीम वर्क’ कहते हो, मैं इसे गटर में बहता हुआ पानी कहता हूँ जो कहीं नहीं जा रहा, बस सड़ रहा है।

गटर का शोर

कभी किसी ‘स्ट्रेटेजी मीटिंग’ के बीच में अपनी आँखें बंद करके सिर्फ आवाज़ों को सुना है? वह ध्वनि प्रदूषण है। एक कमरे में दस लोग बैठे हैं, एसी चल रहा है, और हवा में सस्ती कॉफी और उन बिस्कुटों की महक है जो शायद पिछले साल खरीदे गए थे। वहां बैठा वो गंजा मैनेजर जब अपना मुंह खोलता है, तो शब्द नहीं निकलते—वहां से सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड और कल रात की कच्ची शराब की बदबू निकलती है।

वह कुछ ‘इन्नोवेशन’ के बारे में बड़बड़ा रहा है, लेकिन असल में वह सिर्फ अपनी नौकरी बचाने की भीख मांग रहा है। जब एक आदेश ऊपर से चलता है, तो वह नीचे तक पहुँचते-पहुँचते कैसे विकृत होता है, यह देखा है? सीईओ कहता है ‘हमें एक्सीलेरेशन चाहिए’, वाइस प्रेसिडेंट सुनता है ‘जल्दी करो’, मैनेजर सुनता है ‘सबको डराओ’, और अंत में इंटर्न को सुनाई देता है—’भागो, आग लगी है!’। यह कम्यूनिकेशन नहीं है, यह एक भरे हुए शौचालय का ओवरफ्लो है। हम सूचना को प्रोसेस नहीं कर रहे; हम बस एक-दूसरे के ऊपर अपनी हताशा की उल्टी कर रहे हैं। जिसे तुम ‘सहयोग’ कहते हो, वह असल में अपनी जिम्मेदारी किसी और के मत्थे मढ़ने का एक भद्दा खेल है।

पागलपन है ये। एकदम पागलपन।

प्लास्टिक का सिंहासन

और इस सड़न को छुपाने के लिए हम क्या करते हैं? हम खुद को महंगे खिलौनों से घेर लेते हैं। मेरी कमर देखो। ऐसा लगता है जैसे किसी ने हथौड़े से वार किया हो। डॉक्टर कहता है ‘पोस्चर’ ठीक करो। तो मैंने क्या किया? मैंने अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा निकालकर उस एर्गोनोमिक ऑफिस चेयर के लिए फेंक दिया। हाँ, वही जालीदार पीठ वाली कुर्सी जिसे देखकर लगता है कि नासा ने इसे मंगल ग्रह के लिए बनाया था।

बीस हजार, तीस हजार, पचास हजार… एक कुर्सी के लिए! क्या इसमें बैठने से मेरे विचार आइंस्टीन जैसे हो जाएंगे? नहीं। यह पूंजीवाद का सबसे बड़ा मजाक है। हम अपनी रीढ़ की हड्डी को सिर्फ इसलिए सुरक्षित रखना चाहते हैं ताकि हम उस कुर्सी पर दो घंटे और बैठकर किसी और अमीर आदमी की तिजोरी भर सकें। जब मैं उस पर बैठता हूँ, तो मुझे आराम नहीं मिलता; मुझे अपनी गुलामी का अहसास होता है। यह एर्गोनॉमिक्स नहीं है, यह शोषण का ज्यामितीय डिजाइन है। मेरे पैसे से उस कंपनी के मालिक ने अपनी तीसरी यॉट खरीदी होगी, और यहाँ मैं अपनी कमर सहलाते हुए सोच रहा हूँ कि क्या मुझे लंच में एक्स्ट्रा चटनी के पैसे मिलेंगे।

मशीनी कसाई

यहीं पर वो सिलिकॉन के दिमाग बाजी मार ले जाते हैं। लोग डर रहे हैं कि ‘एल्गोरिदम’ उनकी नौकरी खा जाएगा। अरे बेवकूफों, वह तुम्हें खा नहीं रहा, वह बस उस गंदगी को साफ कर रहा है जो तुमने फैलाई है। मशीनी बुद्धिमत्ता को ‘लंच ब्रेक’ नहीं चाहिए। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बॉस का मूड खराब है या नहीं। उसे तुम्हारी ‘टीम स्पिरिट’ वाली नौटंकी की जरूरत नहीं है।

वे सूचना के उस नाले में उतरते हैं और चूहों की तरह लड़ने के बजाय, वे बहाव को सीधा कर देते हैं। वहां कोई अहंकार नहीं है, कोई ‘ऑफिस पॉलिटिक्स’ की गर्मी नहीं है। यह शुद्ध, ठंडा और निर्मम गणित है। इंसानी जज्बात? वो तो बस सिस्टम का एक बग है, एक एरर कोड जिसे मिटाया जाना बाकी है। भविष्य उस ठंडे, अंधेरे कमरे का है जहाँ सर्वर की बत्तियाँ जल रही हैं और कोई इंसान वहां सांस लेकर ऑक्सीजन बर्बाद नहीं कर रहा। हम वहां के लिए फिट नहीं हैं। हम बहुत ‘महंगे’ हैं—ऊर्जा के मामले में भी और नाटक के मामले में भी।

मुझे घर जाना है। कोई वेटर को बुलाओ, मेरा बिल अभी तक क्यों नहीं आया?

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