विकृत ज्यामिति

विकृत ज्यामिति: मवेशी प्रबंधन और सांख्यिकीय आत्महत्या

एक सस्ते बार के चिपचिपे टेबल पर बैठकर, ठंडे हो चुके कबाब की जमती हुई चर्बी को घूरते हुए, मुझे अक्सर यह खयाल आता है कि दुनिया जिसे ‘सहमति निर्माण’ या ‘सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्गठन’ कहती है, वह असल में केवल कचरे के डिब्बों की जगह बदलने की कवायद भर है। विशेष रूप से वे लोग, जो समाज में उस ‘स्वचालित मवेशी प्रबंधन प्रणाली’ (जिसे वे गर्व से तकनीक कहते हैं) को लागू करने पर तुले हैं, उनकी बातें सुनकर ऐसा लगता है जैसे कोई टूटे हुए पंखे की घरघराहट में संगीत ढूँढ रहा हो। वे सोचते हैं कि वे कोपर्निकस की तरह कोई नई दुनिया खोज रहे हैं, लेकिन हकीकत में वे केवल एक पुराने, जंग लगे तिपहिया वाहन को हाईवे पर दौड़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

हम जिसे ‘संवाद’ कहते हैं, वह सूचना के बंद पिंजरों में अपनी ही प्रतिध्वनि सुनने जैसा है। यह ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ कोई समतल मैदान नहीं है जहाँ विचार आज़ादी से विचरण करें; यह एक ऐसी विकृत ज्यामिति है जहाँ फेंका गया हर तर्क बूमरैंग की तरह लौटकर फेंकने वाले के ही माथे पर लगता है। वक्रता (Curvature) इतनी अधिक है कि सीधी बात करना भी गणितीय रूप से असंभव हो गया है।

कीचड़ का तर्कशास्त्र

इंसानी दिमाग की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह शुद्ध ‘डेटा’ के ढेर में ‘अर्थ’ खोजने की बीमारी से ग्रस्त है। शासन व्यवस्था की कुर्सियों पर बैठे लोग, जो खुद को समाज का ठेकेदार समझते हैं, वे केवल सांख्यिकीय वितरण (Statistical Distribution) के ग्राफ पर ‘औसत’ को बचाने की जुगत में लगे हैं। जिसे वे ‘सहमति’ कहते हैं, वह दो पक्षों के बीच की समझदारी नहीं है; वह तो बस सरकारी दफ्तर की खिड़की पर लंच-टाइम के बाद अपनी बारी का इंतजार करते-करते पैदा हुई वह हताशा है, जहाँ इंसान थककर ‘हाँ’ कह देता है।

और ‘जनमत’? कृपया मुझे हँसाइए मत। जनमत उस स्टेशन के पास वाले गंदे नाले के पानी पर तैरती तेल की परत जैसा है। सूरज की रोशनी में वह एक पल के लिए चमकता जरूर है, इंद्रधनुषी रंग दिखाता है, लेकिन उसके नीचे केवल सड़ांध और गाद है। हम उस गाद को चम्मच से हिलाते हैं और दावा करते हैं कि हम अमृत मंथन कर रहे हैं। यह पाखंड इतना गहरा है कि अब इस पर गुस्सा भी नहीं आता, केवल एक थकी हुई हँसी आती है।

टेढ़ी रीढ़ और महंगी गद्दी

यहीं पर सूचना ज्यामिति (Information Geometry) अपना क्रूर खेल दिखाती है। जब तथाकथित ‘स्मार्ट’ सिस्टम समाज पर थोपे जाते हैं, तो वे हमारे सोचने के स्पेस को ही मोड़ देते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण जैसा है, जो भारी द्रव्यमान के चारों ओर जगह को झुका देता है। सत्ता में बैठे लोग अक्सर लाखों रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सी खरीद लेते हैं, यह सोचकर कि इससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ेगी। विडंबना देखिए—वह कुर्सी शायद उनकी लंबर-स्पाइन (Lumber Spine) को तो सीधा रख सकती है, लेकिन उस गद्दी पर बैठकर जो फैसले लिए जाते हैं, उनकी नैतिक रीढ़ की हड्डी स्कोलियोसिस (Scoliosis) की मरीज होती है।

आप कितनी भी महंगी गद्दी पर बैठ लें, आपके नीचे का सिस्टम वही है—भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन में किसी अजनबी की पसीने से तर कोहनी जो आपकी पसलियों में धंस रही है। हम जिस ‘स्वतंत्र इच्छा’ (Free Will) का दम भरते हैं, वह उस सस्ते स्मार्टफोन की बैटरी जैसी है, जो 100% चार्ज दिखाने के बावजूद एक कॉल करते ही स्विच ऑफ हो जाती है। हम सब बस पहले से तय किए गए पैरामीटर्स के भीतर फड़फड़ाते हुए रैंडम नंबर जेनरेटर हैं, जिन्हें यह भ्रम है कि वे अपनी किस्मत खुद लिख रहे हैं।

शून्य में विसर्जन

अक्सर मेरे पास कुछ आदर्शवादी छात्र आते हैं, आँखों में चमक लिए, पूछते हैं कि इस अराजकता का समाधान क्या है। मैं उनसे कहता हूँ, “बेटा, जाओ, ठंडी हो चुकी चाय पियो और इस गलतफहमी को नाली में बहा दो कि तुम्हारी राय का ब्रह्मांड के एन्ट्रापी पर कोई असर पड़ता है।” समाज एक ऐसा इंजन है जो अपनी ही गर्मी से पिघल रहा है, और हम उस पर ‘पॉलिसी’ नाम का गीला कपड़ा डालकर उसे ठंडा करने का नाटक कर रहे हैं।

यह सब एक सांख्यिकीय मजाक है। हम केवल डेटा पॉइंट्स हैं जो एक-दूसरे के वेरिएंस (Variance) को कम करने के लिए चिल्ला रहे हैं। अंत में, सब कुछ एक नीरस सन्नाटे में घुल जाएगा, बिल्कुल उस आइस-क्यूब की तरह जो मेरी व्हिस्की में पिघलकर अपना अस्तित्व खो चुका है।

बस, बहुत हो गया प्रवचन। ए बैरे! यहाँ एक और ड्रिंक लाओ, और इस बार बर्फ मत डालना। मुझे कड़वाहट पसंद है।

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