व्यवस्था का भ्रम

ऊष्मागतिकी का नरक: कॉरपोरेट पिंजरे और एंट्रॉपी का जुआ

जब मैं सुबह की लोकल ट्रेन या मेट्रो की उस भीड़भाड़ वाली बोगी में, जिसे हम गलती से ‘सभ्य यातायात’ कहते हैं, किसी अजनबी की पसीने से लथपथ शर्ट से अपनी नाक बचाने की कोशिश करता हूँ, तो मुझे वहां इंसान नहीं, बल्कि ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम से जूझते हुए लाचार कण दिखाई देते हैं। जिसे आप ‘करियर’ या ‘बिजनेस’ कहते हैं, वह असल में ब्रह्मांड की बढ़ती हुई अराजकता यानी एंट्रॉपी (Entropy) के खिलाफ लड़ी जा रही एक बेहद महंगी और हारने वाली जंग है। हम कांच की इमारतों में बैठकर यह भ्रम पालते हैं कि हम दुनिया चला रहे हैं, जबकि हकीकत में हम बस अपनी जैविक ऊर्जा को एक्सेल शीट्स और पीपीटी में बदलकर ब्रह्मांड का तापमान बढ़ा रहे हैं।

अराजकता का विज्ञान

एक व्यावसायिक संगठन क्या है? शुद्ध भौतिकी की दृष्टि से, यह एक ‘ओपन सिस्टम’ है जो ‘व्यवस्था’ (Order) बनाए रखने के लिए संघर्षरत है। लेकिन इल्या प्रिगोगिन (Ilya Prigogine) का ‘नॉन-इक्विलिब्रियम’ सिद्धांत हमें बताता है कि एक जगह सफाई करने के लिए आपको दूसरी जगह दोगुना कचरा फेंकना ही पड़ेगा। जब आपका मैनेजर ‘क्वार्टरली टारगेट्स’ के नाम पर चिल्लाता है, या जब एचआर विभाग ‘टीम बॉन्डिंग’ का नाटक रचता है, तो वे असल में संस्था की ‘लोकल एंट्रॉपी’ को कम करने की कोशिश कर रहे होते हैं।

लेकिन इस प्रक्रिया की कीमत क्या है? वह ‘हीट’ (Heat) जो आपके दिमाग और शरीर से निकलती है। तनाव, एसिडिटी, और वह अजीब सा खालीपन जो रविवार की शाम को महसूस होता है—यह सब और कुछ नहीं, बस सिस्टम द्वारा बाहर फेंका गया कचरा है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे सड़क किनारे के किसी ढाबे पर ‘जुगाड़’ से चलती हुई वह पुरानी केतली, जिसे फटने से बचाने के लिए छोटू उस पर बार-बार गंदा कपड़ा मारता रहता है। कॉरपोरेट जगत बस उस ढाबे का एक वातानुकूलित संस्करण है।

स्वचालन का मृगतृष्णा

अब इस जलती हुई भट्टी में प्रवेश होता है उन ‘स्वचालित गणना इंजनों’ (Automated Calculation Engines) का, जिन्हें भोली दुनिया भविष्य का मसीहा मानती है। हम सोचते हैं कि ये अदृश्य एल्गोरिदम हमारे काम को आसान बना देंगे। क्या मूर्खतापूर्ण ख्याल है। ये गणितीय मॉडल ‘मैक्सवेल के डेविल’ (Maxwell’s Demon) की तरह काम करते हैं—ये श्रम के उन सूक्ष्म अंतरालों को भी खत्म कर देते हैं जहाँ इंसान पहले सांस ले सकता था।

पुराने जमाने का मुनीम बही-खाता लिखते समय चाय की चुस्की लेता था, खिड़की से बाहर ताकता था। वह ‘दक्ष’ नहीं था, इसीलिए वह ‘जीवित’ था। आज का ऑप्टिमाइज्ड सिस्टम आपकी पलक झपकने की देरी को भी ‘इनएफिशिएंसी’ (Inefficiency) मानकर डेटा में दर्ज कर लेता है। यह श्रम का अंत नहीं, बल्कि श्रम का ‘लेजर-फोकस्ड’ विक्षेपण है। हम अब उस मशीन के ऑपरेटर नहीं हैं; हम उस मशीन के गियर-बॉक्स में फंसे हुए वे लुब्रिकेंट हैं जो खुद को घिसकर सिस्टम को ठंडा रखने की कोशिश कर रहे हैं।

विडंबना देखिए, इस घिसावट से बचने के लिए हम बाजार की शरण में जाते हैं। हम अपनी कमर को बचाने के लिए [दो लाख रुपये की वह एर्गोनोमिक कुर्सी](https://example.com/absurdly-priced-chair) खरीदते हैं, जिसमें ‘लम्बर सपोर्ट’ और ‘इटालियन मेश’ लगा होता है। हम यह सोचते हैं कि यह कुर्सी हमारी रीढ़ की हड्डी को बचा लेगी। हमें कौन समझाए कि हमारी रीढ़ कुर्सी की बनावट से नहीं, बल्कि उस सिस्टम के अदृश्य दबाव से टूट रही है जो हमें निचोड़कर मुनाफा कमाना चाहता है। वह कुर्सी आपकी सेहत का रक्षक नहीं, बल्कि आपकी गुलामी का एक आरामदायक सिंहासन है।

सूचना का कब्रिस्तान

सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के नजरिए से देखें तो एक ‘सफल’ कंपनी और एक मरते हुए सितारे में बहुत कम अंतर है। दोनों ही अपने केंद्र में अत्यधिक घनत्व और दबाव पैदा करते हैं। जितना अधिक हम ‘डेटा-ड्रिवन’ होने का दावा करते हैं, हम उतना ही खुद को अनिश्चितता के गर्त में धकेलते हैं। आप जितनी शिद्दत से व्यवस्था बनाने की कोशिश करेंगे, आपके जीवन में अराजकता उतनी ही विद्रोही होकर उभरेगी।

जिसे हम ‘प्रगति’ कहते हैं, वह दरअसल एक ढलान पर दौड़ते हुए यह सोचने का भ्रम है कि हम उड़ रहे हैं। अंततः, यह पूरी अर्थव्यवस्था केवल एक विशाल उष्मीय इंजन (Heat Engine) है, और हम सब इसका ईंधन। हम जल रहे हैं ताकि किसी बैलेंस शीट के कोने में एक संख्या हरी रह सके। और जब हमारी रासायनिक ऊर्जा खत्म हो जाएगी, तो हमें एक पुराने, खराब हो चुके प्रिंटर की तरह कबाड़ में फेंक दिया जाएगा।

घर जाना चाहता हूँ, पर घर भी तो अब एक और दफ्तर बन चुका है। क्या तमाशा है।

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