व्यवस्था का भ्रम

स्थिरता: एक सुंदर आत्महत्या

पिछली बार जब हम ‘स्थिरता’ और ‘सुरक्षा’ के खोखलेपन पर चर्चा कर रहे थे, तो मुझे याद आया कि कैसे हमारे कॉर्पोरेट जगत के शूरवीर अपनी महोगनी की मेजों पर बैठकर ‘स्थिर विकास’ का सपना देखते हैं। असल में, यह स्थिरता ही उनकी कब्र की पहली ईंट है। जिसे वे ‘मैनेजमेंट’ कहते हैं, वह असल में सड़ते हुए मांस पर महँगा इत्र छिड़कने जैसा है ताकि उस अपरिहार्य पतन को छुपाया जा सके, जिसे भौतिकी की निष्ठुर भाषा में ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) कहा जाता है। वे संतुलन की तलाश में हैं, यह जाने बिना कि ब्रह्मांड में संतुलन का अर्थ केवल एक ही है—राख।

मेरे हाथ में यह ठंडी बियर और सड़क किनारे मिलने वाले उस तैलीय, बासी समोसे के बीच जो समानता है, वही एक बहुराष्ट्रीय कंपनी और एक जीवित कोशिका के बीच है। दोनों ही ‘विघटनकारी संरचनाएं’ (Dissipative Structures) हैं। इल्या प्रोगोगिन (Ilya Prigogine) ने जब गैर-साम्यावस्था ऊष्मप्रवैगिकी (Non-equilibrium Thermodynamics) की नींव रखी, तो शायद उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनके सूत्र भविष्य के सीईओ (CEO) के लिए मौत का फरमान साबित होंगे। कोई भी संगठन एक भूखे शिकारी जानवर की तरह होता है; उसे जीवित रहने के लिए बाहरी दुनिया से कच्चा मांस (पूंजी, सूचना और मानव संसाधन) नोचना पड़ता है और उसे कचरे में बदलना पड़ता है। यदि वह अपनी चयापचय दर (Metabolism) को संतुलित नहीं कर पाता, तो वह अपने ही भीतर पैदा होने वाली गर्मी से जलकर भस्म हो जाएगा। यह एक अंतहीन भूख है, जिसे कोई भी चमकदार ‘विजन स्टेटमेंट’ शांत नहीं कर सकता।

ऊर्जा का नग्न नृत्य

ब्रह्मांड का दूसरा नियम स्पष्ट है और किसी की सिफारिश नहीं सुनता: अव्यवस्था ही परम सत्य है। एक कंपनी जो खुद को बाहरी दुनिया से बंद कर लेती है और अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को ‘परफेक्ट’ बनाने में जुट जाती है, वह असल में अपनी ‘हीट डेथ’ (Heat Death) की तैयारी कर रही होती है। इसे ऐसे समझिए जैसे आपके सस्ते स्मार्टफोन की बैटरी, जो दोपहर होते-होते दम तोड़ देती है। आप उसे कितना भी सहेज कर रखें, स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करें या ऐप्स बंद करें, चार्जिंग और डिस्चार्जिंग का हर चक्र उसे रासायनिक मौत के करीब ले जाता है। संगठन भी ऐसे ही हैं। वे ‘साम्यावस्था’ (Equilibrium) की तलाश करते हैं, जबकि साम्यावस्था का असली मतलब ‘मृत्यु’ है। एक मृत शरीर पूरी तरह साम्यावस्था में होता है—न कोई हलचल, न कोई तनाव, न कोई भविष्य, और न ही कोई शिकायत।

क्या बकवास है ये सब।

नवाचार और महंगा कचरा

लोग ‘इनोवेशन’ को एक पवित्र मानवीय गुण मानते हैं। “ओह, हमें रचनात्मक होना चाहिए!”—यह एक न्यूरोलॉजिकल भ्रम है। विज्ञान की दृष्टि से, नवाचार केवल एक ‘फेज ट्रांजिशन’ (Phase Transition) है, ठीक वैसे ही जैसे खौलते हुए गंदे पानी से भाप का निकलना। इसके लिए सिस्टम में ‘शोर’ (Noise) और ‘अस्थिरता’ की आवश्यकता होती है। शांत पानी में कभी तूफान नहीं आते।

अक्सर मुझे घृणा और दया का मिश्रित अनुभव होता है जब मैं किसी ‘सी-सुइट’ (C-Suite) एग्जीक्यूटिव को अपनी जेब से एक लक्जरी फाउंटेन पेन निकालकर गर्व से उसे चमकाते हुए देखता हूँ। क्या विडंबना है! एक लाख रुपये का पेन, जो काले रेजिन और सोने की परत से बना है, सिर्फ इसलिए ताकि एक दिवालिया होती कंपनी के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए जा सकें? यह उस आदमी की हताशा है जो बिखरती हुई दुनिया में एक छोटी सी, ठोस ‘स्थिरता’ को पकड़कर बैठना चाहता है। वह महंगा पेन कागज़ पर जो स्याही छोड़ता है, वह भी अंततः एन्ट्रॉपी का ही हिस्सा बन जाती है, जो समय के साथ धुंधली होकर मिट जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे उस कंपनी का शेयर मूल्य। यह विलासिता नहीं, यह भय का प्रदर्शन है।

पसीने की बदबू और टीम वर्क

कॉर्पोरेट जगत की ‘टीम बॉन्डिंग’ और ‘वर्कशॉप्स’ दरअसल एन्ट्रॉपी को छिपाने के महंगे और उबाऊ तरीके हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली की 48 डिग्री वाली भीषण गर्मी में एक ऐसी पुरानी एम्बेसडर कार का एसी चलाने की कोशिश करना जिसका इंजन पहले ही सीज हो चुका हो। भीतर बैठे लोग पसीने से तर-बतर होकर एक-दूसरे को देख रहे हैं, सिंथेटिक कपड़ों की दुर्गंध कार में भर गई है, शोर इतना है कि बात सुनाई नहीं देती, लेकिन कोई यह मानने को तैयार नहीं कि गाड़ी खड़ी है और हम कहीं नहीं जा रहे। ये वर्कशॉप्स केवल सामूहिक आत्म-मोह (Collective Narcissism) हैं। असली नवाचार तब नहीं होता जब लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर ‘कुंभया’ गाते हैं; यह तब होता है जब सिस्टम इतना अस्थिर हो जाता है कि उसके पास खुद को तबाह करके फिर से खड़ा होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

क्या हमें सच में लगता है कि हम इन भौतिक नियमों से ऊपर हैं?

मानवीय भावनाएं, जिन्हें हम ‘जुनून’ या ‘दृढ़ता’ कहते हैं, वास्तव में केवल न्यूरो-केमिकल फीडबैक लूप्स हैं जो हमें ऊर्जा के नुकसान को सहने में मदद करते हैं। हम ब्रह्मांड के उस विशाल इंजन के छोटे से पुर्जे हैं जो केवल एक ही काम कर रहा है: उपयोगी ऊर्जा को बेकार ऊष्मा में बदलना। और इस प्रक्रिया में, यदि कोई कंपनी थोड़ा पैसा कमा लेती है या कोई नया गैजेट बना लेती है, तो वह केवल एक गंदा ‘बाय-प्रोडक्ट’ है।

घर जाने का मन कर रहा है।

इस पूरे खेल में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम जितना अधिक नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं, उतनी ही तेजी से चीजें बिखरती हैं। एक अत्यधिक विनियमित (Regulated) संगठन उस प्रेशर कुकर की तरह है जिसकी सीटी जाम कर दी गई हो। वह फटेगा, और जब फटेगा, तो कोई भी ‘मैनेजमेंट गुरु’ उसके टुकड़ों को नहीं जोड़ पाएगा। असली बुद्धिमानी किनारे पर खड़े होकर उस बिखरती हुई व्यवस्था का आनंद लेने में है, यह जानते हुए कि इस विनाश के गर्भ से ही अगली व्यवस्था जन्म लेगी। पदानुक्रम, त्रैमासिक रिपोर्ट, और रणनीतिक योजनाएँ—ये सब केवल वयस्कों के लिए खिलौने हैं ताकि उन्हें यह भ्रम रहे कि वे पतवार थामे हुए हैं। जबकि हकीकत में, वे लहरों की मर्जी पर नाच रहे परमाणुओं का एक समूह मात्र हैं।

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