पिछली बार हमने उस व्यक्तिगत ‘बर्नआउट’ की बात की थी जो इंसान को एक खाली बैटरी की तरह नाकारा छोड़ देता है, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि जब पाँच ‘स्मार्ट’ लोग एक कॉन्फ्रेंस रूम में मिलते हैं, तो उनकी सामूहिक बुद्धि बढ़ने के बजाय परिणाम अक्सर किसी नाली में गिरे हुए सड़े समोसे जैसा क्यों निकलता है? लोग इसे ‘मैनेजमेंट की विफलता’ कहते हैं, पर मैं इसे शुद्ध और क्रूर भौतिकी कहता हूँ।
व्यापारिक संगठन वास्तव में जीवित तंत्र नहीं, बल्कि ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम के बंधक हैं। एडिंगटन ने कहा था कि अगर आपका सिद्धांत एन्ट्रोपी के खिलाफ जाता है, तो उसकी कोई उम्मीद नहीं है। संगठनों में भी यही होता है—व्यवस्था (Order) के निर्माण के लिए जितनी ऊर्जा लगाई जाती है, उससे कहीं अधिक ऊर्जा ‘अव्यवस्था’ के रूप में बाहर निकल जाती है। जिसे आप ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ कहते हैं, वह असल में कुछ नहीं बल्कि सिस्टम से निकलने वाली बेकार की गर्मी और भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन के पसीने की बदबू है।
सड़ांध और विशृंखलता
जब कोई स्टार्टअप शुरू होता है, तो वह एक सादे डोसे की तरह कुरकुरा होता है। स्पष्ट और सटीक। लेकिन जैसे ही आप उसमें ‘मैनेजर’, ‘वीपी’ और ‘स्ट्रेटजी कंसल्टेंट्स’ के सड़े हुए आलू भरना शुरू करते हैं, वह एक गीली, घिनौनी ‘खिचड़ी’ बन जाता है। यहाँ एन्ट्रोपी का असली नर्क शुरू होता है। भौतिकी की भाषा में, एन्ट्रोपी का मतलब है—ऊर्जा का वह हिस्सा जो काम करने के लिए उपलब्ध नहीं है।
एक ऑफिस में होने वाली 90% मीटिंग्स इसी एन्ट्रोपी का उत्सर्जन हैं। लोग वहां जानकारी साझा करने नहीं, बल्कि अपनी असुरक्षाओं और घटिया जोक्स को ‘थर्मल नॉइज़’ के रूप में फैलाने आते हैं, ठीक वैसे ही जैसे गर्मी के दिनों में एक बंद लिफ्ट में ढेर सारे लोग एक-दूसरे की बासी साँसों से हवा को जहरीला कर देते हैं। जिस तरह एक सस्ता चीनी स्मार्टफोन दो महीने बाद चार्जिंग छोड़ देता है क्योंकि उसके अंदर के केमिकल बॉन्ड्स दम तोड़ चुके होते हैं, वैसे ही बड़े संगठन अपनी ही जटिलता के बोझ तले दबकर खत्म हो जाते हैं। यह कोई मानवीय विफलता नहीं है, यह ब्रह्मांड का स्वभाव है कि हर सुंदर चीज़ अंत में कचरे के ढेर में बदल जाएगी। यह संगठन नहीं, एक धीरे-धीरे सुलगता हुआ कूड़ेदान है।
क्या बकवास है ये सब।
सूचना का काला सुराख
सूचना सिद्धांत (Information Theory) की बातें करना आसान है, लेकिन असलियत में जानकारी का संचार किसी फटे हुए लाउडस्पीकर से निकलने वाली आवाज़ जैसा है। एक सीईओ जब अपना ‘विजन’ देता है, तो वह निचले स्तर तक पहुँचते-पहुँचते उस ‘चाइनीज व्हिस्पर’ जैसा हो जाता है जिसमें ‘बाजार जीतना है’ का मतलब ‘मुफ्त की कॉफी खत्म करनी है’ में बदल जाता है। हर ईमेल, हर स्लैक मैसेज उस फोटोकॉपी की तरह है जिसकी सौवीं कॉपी में सिर्फ काले धब्बे रह जाते हैं। जानकारी का यह क्षय अपरिहार्य है। आप चाहे कितना भी चिल्ला लें, संदेश का आधा हिस्सा हमेशा रास्ते की धूल में मिल जाता है।
अजीब बात देखिए, इस सूचना के बिखराव को रोकने के लिए लोग क्या-क्या बेवकूफियां नहीं करते। अब इस लाख रुपये की महोगनी डेस्क को ही देख लीजिए। कोई अहंकारी बॉस ही होगा जो अपनी फालतू की ईगो को सहलाने के लिए इतनी महंगी लकड़ी पर बैठेगा, जैसे कि इस लकड़ी की कठोरता उसके दिमाग के ढीलेपन को ढक लेगी। यह तो वही बात हुई कि आप अपनी पुरानी खटारा गाड़ी पर सोने का पेंट करवा दें और उम्मीद करें कि वह गड्ढों में नहीं फंसेगी।
और फिर वे इस बेशर्मी से महंगे मॉन्टब्लैंक पेन से उन कागजों पर साइन करते हैं जिन्हें कल कोई रद्दी वाला ले जाएगा। क्या उन्हें लगता है कि महंगी स्याही से उनके खोखले आदेशों में वजन आ जाएगा? इंसानी भावनाएं इस पूरी प्रक्रिया में एक ‘गंदे बग’ की तरह काम करती हैं। हम जिसे ‘टीम बॉन्डिंग’ कहते हैं, वह असल में डेटा के प्रवाह में लगने वाला एक रेजिस्टेंस (Resistance) है। सहानुभूति और भावनाएं जानकारी के संचरण को वैसे ही धीमा कर देती हैं जैसे सर्दियों में इंजन का तेल जम जाता है। अगर आपको एक आदर्श संगठन चाहिए, तो आपको इंसानों की नहीं, निर्जीव पत्थरों की जरूरत होगी।
ढांचागत विफलता की ज्यामिति
तो क्या इस तबाही को रोका जा सकता है? बिल्कुल नहीं। इसे केवल कुछ समय के लिए ‘टाल’ दिया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक कैंसर रोगी को सस्ती पेनकिलर दी जाती है। सूचना की ज्यामिति हमें बताती है कि अगर हम संगठन की संरचना को एक तंग ऑटो-रिक्शा की तरह बना दें, जहाँ हिलने की भी जगह न हो, तो शायद बिखराव कम हो। लेकिन हम इंसान हैं, हमें ढीलापन पसंद है। हमें ‘जुगाड़’ पसंद है। और ‘जुगाड़’ ही एन्ट्रोपी का सबसे बड़ा और गंदा स्रोत है। यह उस फटे हुए टायर पर टेप चिपकाने जैसा है जो कभी भी फट सकता है।
एक तथाकथित ‘कुशल’ संरचना वह नहीं है जो बहुत सारी जानकारी साझा करे, बल्कि वह है जो यह तय करे कि किस कचरे को रोकना है। इसे ‘नेगेटिव एन्ट्रोपी’ कहना एक शैक्षणिक मजाक है। असल में यह सिर्फ एक छननी है जो बड़े कचरे को रोकती है जबकि बारीक धूल अभी भी अंदर जा रही होती है। लोग नए सॉफ्टवेयर खरीदते हैं, नए ऐप इंस्टॉल करते हैं, जो सिस्टम में और अधिक जटिलता जोड़ते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे फोन की मेमोरी भरने पर उसे साफ करने के लिए एक ‘क्लीनर’ ऐप डालना, जो खुद ही आधी मेमोरी खा जाता है और बैकग्राउंड में आपका डेटा चुराता है।
घर जाने का मन कर रहा है।
संगठन की इस सड़न को रोकने का जो ‘पेशेवर’ नाटक है, वह किसी ठंडे, निर्दयी कसाई के चाकुओं जैसा होना चाहिए। लोग इसे ‘अमानवीय’ कहते हैं, मैं इसे सिर्फ ‘धीमी मौत’ कहता हूँ। अंत में, आपका बिजनेस प्लान हो या आपकी सुबह की चाय, दोनों ही ठंडे और बेस्वाद होने के लिए बने हैं। आप बस इतना कर सकते हैं कि उस ठंडी होती प्याली को देखते रहें और महसूस करें कि कैसे आपकी मेहनत की कमाई और आपकी जिंदगी का समय, दोनों ही इस ब्रह्मांड की अंतहीन शून्यता में धीरे-धीरे विलीन हो रहे हैं। घटियापन की भी एक सीमा होती है, पर कॉर्पोरेट जगत ने उसे भी पार कर लिया है।
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