श्रम का ताप

श्रम की ऊष्मागतिकी: जैविक घर्षण और सिलिकॉन की शीतलता

पिछली बार जब हमारी मुलाकात हुई थी, तो मैंने तर्क दिया था कि आधुनिक कॉरपोरेट ढांचा मध्यकालीन सामंतवाद का ही एक डिजिटल संस्करण है। लेकिन आज, जब मैं इस सस्ती व्हिस्की का घूँट भर रहा हूँ और खिड़की के बाहर गुड़गांव की सड़कों पर रेंगती हुई बेमतलब की भीड़ को देख रहा हूँ, तो मुझे अपनी गलती का अहसास हो रहा है। समस्या राजनीति या अर्थशास्त्र में नहीं है। समस्या, मेरे दोस्त, शुद्ध रूप से ‘भौतिकी’ (Physics) में है।

हम जिसे अपना ‘करियर’, ‘जुनून’ या ‘सपना’ कहते हैं, वह वास्तव में ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के नियमों द्वारा खेला गया एक क्रूर और भद्दा मज़ाक है।

मांस और मज्जा का घर्षण

जरा एक औसत दफ्तर की कल्पना करें। कृत्रिम रोशनी, एयर कंडीशनर की भनभनाहट और स्क्रीन को घूरते हुए दर्जनों जैविक पुतले। यह सब बाहरी तौर पर एक सुव्यवस्थित प्रणाली लग सकता है, लेकिन अगर आप इसे एक ‘नॉन-इक्विलिब्रियम’ (गैर-साम्यावस्था) प्रणाली के रूप में देखें, तो यह एक बेहद अक्षम तमाशा है। इल्या प्रिगोगिन ने हमें ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (अपव्ययी संरचनाओं) के बारे में बताया था—वे प्रणालियाँ जो अपनी आंतरिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए परिवेश में भारी मात्रा में एन्ट्रापी (अराजकता) डंप करती हैं।

एक इंसान सुबह मेट्रो स्टेशन के बाहर जो तेल से सना ‘समोसा’ या ‘पोहा’ खाता है, वह रासायनिक ऊर्जा का एक स्रोत है। फिर वह दफ्तर पहुँचकर उस ऊर्जा को ‘त्रैमासिक रिपोर्ट’ या ‘क्लाइंट प्रेजेंटेशन’ में बदलने की कोशिश करता है। यह रिपोर्ट क्या है? यह एक ‘कम एन्ट्रापी’ वाली सूचनात्मक संरचना है। लेकिन इस मामूली सी व्यवस्था को बनाने की प्रक्रिया में, वह इंसान अपने मस्तिष्क की कोशिकाओं को जलाता है, अपने पेट में एसिड बनाता है, और बगल से पसीने की बदबूदार धाराएँ बहाता है। यह सब ब्रह्मांड में छोड़ी गई ‘विशृंखलता’ है।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक बेहद पुरानी और घटिया स्मार्टफोन की बैटरी को चार्ज करने की कोशिश करें। आप उसे 100% तक ले जाते हैं, लेकिन जैसे ही आप कोई ऐप खोलते हैं, वह काम करने के बजाय केवल गर्म होने लगती है। इतनी गर्म कि उसे हाथ में पकड़ना मुश्किल हो जाए। इंसानी श्रम का यही सच है। हम काम कम करते हैं और ‘ऊष्मा’ के रूप में ऊर्जा ज्यादा बर्बाद करते हैं। जिसे हम ‘कड़ी मेहनत’ या ‘बर्नआउट’ कहते हैं, वह वास्तव में एक जैविक मशीन का घर्षण (Friction) है। हम बस शोर और गर्मी पैदा करने वाले इंजन हैं जो धीरे-धीरे खराब हो रहे हैं।

स्वचालन की निष्ठुर शीतलता

यहीं पर आधुनिक ‘स्वचालित गणना प्रक्रियाओं’ (जिन्हें आम जनता डर के मारे ‘AI’ कह रही है) का प्रवेश होता है। लोग घबराए हुए हैं कि सिलिकॉन के ये टुकड़े उनकी रोजी-रोटी छीन लेंगे। क्या बेवकूफी है। हमें तो खुश होना चाहिए कि एन्ट्रापी डंप करने के इस गंदे और थकाऊ काम के लिए कोई और मिल गया है।

मानव श्रम और एक उन्नत एल्गोरिथ्म के बीच का अंतर केवल ‘सूचना ज्यामिति’ का है। जहाँ आपको एक साधारण ईमेल का जवाब देने के लिए अपने शरीर का तापमान 37 डिग्री बनाए रखना पड़ता है, कल रात के झगड़े को दिमाग से हटाना पड़ता है और अरबों न्यूरॉन्स को फायर करना पड़ता है, वहीं एक तर्क-द्वार (Logic Gate) यह काम लगभग शून्य घर्षण के साथ कर देता है। यह मैक्सवेल के दानव (Maxwell’s Demon) जैसा है—जो बिना पसीना बहाए, बिना कॉफी पिए, गर्म और ठंडे अणुओं को अलग कर देता है।

लेकिन त्रासदी यह नहीं है कि हम प्रतिस्थापित हो रहे हैं। त्रासदी यह है कि हमारा अहंकार इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा। आज के ये तथाकथित ‘युवा उद्यमी’ और ‘सीईओ’, जो अपनी उत्पादकता बढ़ाने के लिए लाखों रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सी खरीदते हैं, वे भौतिकी के सामने अपनी लाचारी को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर उनकी रीढ़ की हड्डी सीधी रहेगी, तो वे ब्रह्मांडीय एन्ट्रापी से लड़ सकेंगे। मूर्खता की पराकाष्ठा है यह। उस मखमली गद्दी पर बैठा उनका शरीर अभी भी केवल एक ऊष्मा-उत्सर्जक यंत्र है, जो धीरे-धीरे क्षय की ओर बढ़ रहा है। 50 हज़ार या एक लाख का वह फर्नीचर आपके विचारों को अमर नहीं बना सकता; वह केवल आपके अपरिहार्य पतन को थोड़ा आरामदायक बना देता है।

शून्य की ओर दौड़

जैसे-जैसे हम इस ‘परफेक्ट कंट्रोल’ की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ सिलिकॉन चिप्स हमारी अराजकता को साफ-सुथरे डेटा में बदल रहे हैं, हम एक अजीबोगरीब सन्नाटे की ओर बढ़ रहे हैं। ऊष्मागतिकी के अनुसार, समय का तीर (Arrow of Time) एन्ट्रापी के बढ़ने की दिशा में चलता है। यदि हम एक ऐसी दुनिया बना लेते हैं जहाँ ‘घर्षण’ खत्म हो जाए, जहाँ गलतियाँ न हों, जहाँ पसीना न बहे—तो क्या हम समय को ही फ्रीज नहीं कर देंगे?

सड़क किनारे मिलने वाली 10 रुपये की चाय हो या किसी फाइव स्टार होटल की विंटेज वाइन—अंततः दोनों को आपके पेट में जाकर ग्लूकोज और गर्मी में ही बदलना है। उसी तरह, एक जीनियस का दर्शन और एक मूर्ख का बड़बड़ाना, दोनों ही ब्रह्मांड की ‘हीट डेथ’ (Heat Death) की ओर बढ़ते कदम हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मशीनें इस प्रक्रिया को बिना किसी नाटक, बिना किसी ‘जुगाड़’ और बिना किसी भावना के अंजाम देंगी।

शायद हम उस बिंदु पर पहुँच रहे हैं जहाँ ‘मूल्य’ (Value) का सृजन अब मानवीय पीड़ा पर निर्भर नहीं रहेगा। और यही सबसे डरावनी बात है। क्योंकि सदियों से हमने खुद को यही समझाया है कि हमारे पसीने और आंसुओं का कोई मोल है। अगर सिलिकॉन की शीतलता हमारे गर्म खून से बेहतर परिणाम देने लगे, तो हमारे अस्तित्व का औचित्य क्या रह जाएगा? हम केवल कचरा पैदा करने वाली मशीनें बनकर रह जाएंगे।

घर जाने का मन कर रहा है। यह सब—ये रिपोर्टें, ये डेडलाइन, ये मीटिंग्स—बस एक विशालकाय भट्टी में ईंधन डालने जैसा है। ब्रह्मांड को आपकी ‘सफलता’ से कोई लेना-देना नहीं है। उसे बस अपना हिसाब बराबर करना है, और यकीन मानिए, गणित के इस खेल में हम हारने के लिए ही बने हैं।

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