श्रम की राख

श्रम की राख

सुबह नौ बजे की लोकल ट्रेन या खचाखच भरी बस में, जो पसीने, बासी मुँह और सस्ते हेयर ऑयल की मिली-जुली बदबू नथुनों से टकराती है, वही असल में तुम्हारी ‘अर्थव्यवस्था’ की असली गंध है। जिसे तुम ‘करियर’ या ‘जीवन का उद्देश्य’ कहते हो, वह भौतिक विज्ञान की नजर में सिर्फ एक जैविक भट्टी का धुआँ है। हम सब एक विशालकाय, अदृश्य पेट के अंदर कुलबुलाते हुए कीड़े हैं, जो अपनी ही जीवन ऊर्जा को जलाकर ‘जीडीपी’ नामक अपशिष्ट पदार्थ पैदा कर रहे हैं। यहाँ कोई महान निर्माण नहीं हो रहा; यहाँ सिर्फ एक धीमी, थकाऊ और बदसूरत ‘चयापचय’ (Metabolism) की प्रक्रिया चल रही है।

जलता हुआ पेट

कॉर्पोरेट दफ्तर, जिसे तुम कांच और स्टील का महल समझते हो, असल में एक उच्च तकनीक वाला कसाईखाना है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ खून नहीं, बल्कि समय और चेतना बहती है। एक संगठन का मूल उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना नहीं, बल्कि ‘अव्यवस्था’ (Chaos) के खिलाफ एक हारी हुई लड़ाई लड़ना है। तुम जो फाइलें इधर से उधर करते हो, वह केवल इस सड़ते हुए तंत्र को बिखरने से रोकने की एक नाकाम कोशिश है।

तुम्हारी यह गलतफहमी है कि तुम्हारी मेहनत का कोई मोल है। तुम बस अपनी जवानी को कोयले की तरह भट्टी में झोंक रहे हो ताकि सिस्टम का इंजन गर्म रह सके। और इस बर्बादी का हिसाब रखने के लिए तुम क्या करते हो? तुम बाजार से डेढ़ लाख रुपये का मोंटब्लैंक ऑर्गनाइजर खरीदते हो। उस बछड़े की खाल से बनी डायरी के पन्नों पर, तुम अपनी गुलामी के घंटों को ऐसे दर्ज करते हो जैसे कि तुम किसी साम्राज्य का इतिहास लिख रहे हो। उस चमड़े की भीनी-भीनी खुशबू असल में तुम्हारी अपनी महत्वाकांक्षाओं की सड़न को छिपाने वाला परफ्यूम है। तुम उसे ‘स्टेटस सिंबल’ कहते हो, मैं उसे ‘कफ़न’ कहता हूँ।

व्यवस्था का गटर

जिसे तुम ‘टीम वर्क’ या ‘कल्चर’ कहते हो, वह असल में घर्षण (Friction) है। जब गटर जाम होने लगता है, तो उसमें से जो बुलबुले उठते हैं, वही तुम्हारी मीटिंग्स हैं। इंसान जब समूह में काम करता है, तो वह दक्षता नहीं, बल्कि गर्मी पैदा करता है—गुस्से की गर्मी, ईर्ष्या की गर्मी, और हताशा की गर्मी। यह सब ‘थर्मल वेस्ट’ है।

तुम्हें लगता है कि दफ्तर में एयर कंडीशनर तुम्हारे आराम के लिए लगाया गया है? नहीं, मूर्ख। वह उस सर्वर रूम को ठंडा रखने के लिए है जो तुम्हारी जगह लेने की तैयारी कर रहा है। तुम तो बस उस ठंडक के साइड-इफेक्ट का आनंद ले रहे हो। और अपनी टूटी हुई कमर को सहारा देने के लिए तुम हर्मन मिलर की एर्गोनोमिक कुर्सी खरीदते हो। दो लाख रुपये की जालीदार कुर्सी, ताकि तुम एक मशीन के पुर्जे की तरह थोड़े और साल तक बिना चरमराए काम कर सको। यह कुर्सी तुम्हें इंसान नहीं, बल्कि एक ‘टिकाऊ संसाधन’ बनाती है। जिस दिन तुम्हारी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह जवाब दे देगी, उस दिन यह कुर्सी किसी और के पिछवाड़े को सहारा दे रही होगी।

शीतल जल्लाद

अब उस साये की बात करते हैं जो तुम्हारे पीछे खड़ा है। तुम उसे नई तकनीक कहते हो, मैं उसे ‘शीतल जल्लाद’ कहता हूँ। वह सिलिकॉन का बना हुआ दानव, जिसे न भूख लगती है, न जिसे बीस साल के लोन की चिंता है, और न ही जिसे ‘सोमवार की उदासी’ होती है। वह शुद्ध, निर्मम तर्क (Logic) है।

तुम अपनी भावनाओं, अपनी रचनात्मकता और अपने ‘पैशन’ का रोना रोते रहो। उस स्वचालित गणना-यंत्र के लिए तुम्हारा यह सब नाटक केवल ‘शोर’ (Noise) है। वह उस एन्ट्रापी को, जिसे तुम सँभालते-सँभालते बूढ़े हो गए, नैनो-सेकेंड्स में सुलझा देगा। जहाँ तुम पसीना बहाते थे, वह बस बिजली खाएगा और खामोशी उगलेगा। यह कोई बदलाव नहीं है, यह ‘सफाई’ है। जब वह पूरी तरह से कार्यभार संभाल लेगा, तो दफ्तरों से शोर गायब हो जाएगा। न मीटिंग्स होंगी, न गॉसिप, न ही महंगी कलमों से किए गए झूठे हस्ताक्षर।

बचेगा तो सिर्फ सन्नाटा। और उस सन्नाटे में, तुम अपने घर के कोने में बैठे, एक बेकार हो चुके पुर्जे की तरह, बस अपनी अगली सांस का इंतजार करोगे। यह मत सोचो कि भविष्य उज्ज्वल है। भविष्य बस ‘कुशल’ (Efficient) है, और कुशलता में इंसान की कोई जगह नहीं होती। अब अपना लैपटॉप बंद करो और जाकर सो जाओ, अगर खाली पेट नींद आए तो।

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