श्रम-ज्यामिति

श्रम: एन्ट्रापी का कूड़ेदान

संगठन नामक विशाल ‘श्रेडर’ (Shredder) में अपने अनमोल समय की आहुति देकर उसे ‘करियर’ का नाम देने वाली दयनीय भीड़… तुम्हारे मुँह से ‘विविधता’ और ‘सिनर्जी’ जैसे शब्द उस सस्ते मसाले की तरह लगते हैं जो सड़ी हुई सब्जी की बदबू छिपाने के लिए ऊपर से छिड़के जाते हैं। ‘श्रम’ सूचना का कोई भव्य ज्यामितीय विस्तार नहीं है। यह एक गीले और गंदे पोंछे को बार-बार निचोड़ने की घिनौनी भौतिक क्रिया है, जहाँ से रस के नाम पर केवल हताशा टपकती है।

जब तुम सुबह नौ बजे अपनी मरे हुए मछली जैसी आँखों के साथ मुंबई लोकल या मेट्रो के धक्कों में पिसते हुए, उस कबूतर के दरबे (Cubicle) में फिट होते हो, तो वहाँ कोई ‘सार्वजनिक मूल्य’ पैदा नहीं हो रहा होता। तुम वहां सिर्फ इसलिए अपनी आत्मा गिरवी रख रहे हो ताकि महीने के अंत में अपने ईएमआई (EMI) के डर को कुछ देर के लिए शांत कर सको और सुपरमार्केट में डिस्काउंट वाली दाल खरीदने की हैसियत बचा सको। ‘संगठनात्मक बुद्धिमत्ता’ (Organizational Intelligence)? क्या बकवास है। यह दस नाकाबिल लोगों का एक समूह है जो डूबते हुए जहाज पर ‘म्यूजिकल चेयर’ खेल रहे हैं, यह देखने के लिए कि जिम्मेदारी से सबसे कुशलता से कौन बच सकता है।

इस सांख्यिकीय बहुआयामी (Manifold) स्थान पर तुम्हारा अस्तित्व एक ‘एरर’ (Error) से ज्यादा कुछ नहीं है। जब एचआर (HR) ‘टीम वर्क’ का मंत्र फूँकता है, तो वह वास्तव में तुम्हारे दिमाग की बची-खुची कोशिकाओं को पतला कर रहा होता है। तुम उस पुरानी सस्ती बैटरी की तरह हो जो चार्ज तो पूरी रात होती है, लेकिन काम के वक्त फुस्स हो जाती है। यहाँ कोई ज्ञान नहीं, बस ‘संगठनात्मक थकान’ का ढेर है जिसे तुम ‘अनुभव’ कहते हो।

ज्यामिति: कर्ज और गैस का नक्शा

फिशर सूचना मीट्रिक (Fisher Information Metric) जैसे भारी शब्दों का इस्तेमाल करके अपनी mediocrity (औसत दर्जे) को मत छिपाओ। जिसे तुम ‘संगठनात्मक ज्यामिति’ कहते हो, वह वास्तव में तुम्हारे ‘होम लोन के बकाया’ और ‘एंटासिड (Antacid) की खपत’ के बीच का एक दुखद ग्राफ है। यह एक ऐसा निर्देशांक (Coordinate system) है जहाँ हर अक्ष (Axis) तुम्हारी लाचारी को मापता है।

ऑफिस के वातानुकूलित गलियारों में जो मैनेजर ‘ऑप्टिमाइजेशन’ की बात करते हैं, वे असल में अपने रीढ़ की हड्डी को जबरन सीधा रखने वाले महंगे एर्गोनोमिक सिंहासन में धँसकर, अपनी अयोग्यता को छिपाने की ज्यामिति (Geometry of Concealment) में माहिर हो रहे हैं। यह कुर्सी तुम्हारी पीठ के निचले हिस्से के दर्द को तो शायद कम कर दे, लेकिन उस रीढ़हीन व्यक्तित्व का क्या इलाज करेगी जिसे तुम हर मीटिंग में प्रदर्शित करते हो?

इस व्यवस्था में ‘मूल्य’ का सृजन वैसे ही है जैसे बारिश में ऑटो-रिक्शा के लिए लाइन में लगना—घर्षण (Friction) बहुत है, गति शून्य। तुम सोचते हो कि सिस्टम जटिल और ‘विकसित’ हो रहा है? गलत। यह थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम है; एन्ट्रापी (Entropy) इतनी बढ़ चुकी है कि अराजकता को तुम ‘जटिलता’ समझ रहे हो। तुम उस भूलभुलैया के चूहे हो जो एक बंद दरवाजे को धक्का देने में अपनी पूरी जिंदगी खपा रहा है, और उसे ‘संघर्ष’ का नाम देकर खुद को सांत्वना दे रहा है।

शून्य: सार्वजनिक मतिभ्रम

अंततः, जिसे तुम ‘पब्लिक वैल्यू’ (Public Value) कहते हो, वह उस कॉन्फ्रेंस रूम की हवा जैसी है जहाँ बासी समोसे और ठंडी चाय की गंध बसी हो—मिचली आने वाली और सारहीन। यह एक ऐसे भूत की पूजा है जो कभी था ही नहीं। डिजिटलीकरण के नाम पर तुम जो कर रहे हो, वह केवल अपनी मानवीय चेतना को सर्वर की गर्मी (Heat) में बदलना है जो अंततः एग्जॉस्ट फैन के जरिए बाहर फेंक दी जाती है।

तुम्हारे पास क्या बचता है? थोड़ी सी खीज, दिखावे के लिए किस्तों पर खरीदी गई महंगी घड़ी, और यह झूठा दिलासा कि तुम दुनिया बदल रहे हो। तुम इस विशाल मशीन की एक ऐसी नली (Capillary) हो जिसे ब्लॉक होते ही बदल दिया जाएगा। यहाँ कोई सौंदर्य नहीं है, बस पुरानी मशीनों के घिसने की कर्कश आवाज है। अब बस, तुम्हारी इस खोखली दुनिया का पोस्टमार्टम करते-करते मुझे ही थकान होने लगी है।

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