संगठित अपव्यय

पिछली बार हमने चर्चा की थी कि कैसे तकनीक हमारे एकांत को निगल रही है, लेकिन असली तमाशा तो वहाँ शुरू होता है जहाँ ‘हम’ खत्म होते हैं और ‘संगठन’ नामक राक्षस शुरू होता है। लोग अक्सर ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ और ‘टीम वर्क’ जैसी मीठी-मीठी बातें करते हैं, जैसे कि यह कोई आध्यात्मिक सत्संग हो जहाँ आत्माओं का मिलन हो रहा है। बकवास। अगर आप इसे एक निर्मम भौतिक विज्ञानी की नज़र से देखें, तो किसी भी मल्टी-नेशनल कंपनी का दफ्तर और कुछ नहीं, बल्कि एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है। इल्या प्रिगोगिन ने यह सिद्धांत रसायनों के लिए दिया था, लेकिन यह आपके एचआर विभाग पर ज्यादा सटीक बैठता है।

यह एक ऐसी व्यवस्था है जो बाहर से उच्च गुणवत्ता वाली ऊर्जा—यानी आपकी जवानी, आपकी रचनात्मकता और आपके सपनों का खून—खींचती है ताकि अंदर थोड़ा बहुत अनुशासन बना रहे। और बदले में यह पर्यावरण में क्या उगलती है? भारी मात्रा में एन्ट्रापी, कचरा, तनाव, और अंतहीन ज़ूम कॉल्स की व्यर्थ गर्मी। यह सब बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली की 45 डिग्री वाली दोपहर में किसी खटारा बस की खराब बैटरी। आप उसे बार-बार धक्का मारकर चार्ज करते हैं, वह खौलती है, तेजाब जैसा धुआं छोड़ती है, और अंत में बस आपको बीच सड़क पर छोड़ देती है। आपकी तथाकथित ‘करियर ग्रोथ’ भी वही तेजाब है जो धीरे-धीरे आपकी रीढ़ की हड्डी को गला रहा है।

जाल और बदहजमी

जब आप सुबह नौ बजे अपनी डेस्क पर बैठते हैं, तो आप कोई ‘मूल्य निर्माण’ (Value Creation) नहीं कर रहे होते। आप बस ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम से लड़ रहे होते हैं। ब्रह्मांड चाहता है कि सब कुछ बिखर जाए, अराजकता फैल जाए, लेकिन आपकी कंपनी चाहती है कि आप उस कॉस्मिक अराजकता को एक्सेल शीट के छोटे-छोटे खानों में कैद कर दें। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप गंभीर कब्ज होने पर जबरदस्ती पेट साफ करने की कोशिश करें—मेहनत बहुत लगती है, चेहरे पर पसीना आता है, लेकिन नतीजा कुछ खास नहीं निकलता। अंत में हाथ लगती है तो सिर्फ थकान।

यह ‘जगाड़’ की वह संस्कृति है जहाँ हम टूटे हुए मानसिक स्वास्थ्य और बिखरे हुए परिवारों पर ‘प्रोफेशनल वर्क एथिक्स’ का सस्ता टेप चिपका कर उसे ‘सफलता’ कह देते हैं। जिसे आप ‘प्रेरणा’ कहते हैं, वह न्यूरोलॉजिकल स्तर पर बस एक तरह की रासायनिक गड़बड़ी है, बिल्कुल वैसी गुड़गुड़ाहट जो सड़क किनारे का बासी समोसा खाने के बाद पेट में होती है। आप बस उस बेचैनी को शांत करने के लिए काम करते रहते हैं। कभी उस Herman Miller Aeron Chair की अश्लील कीमत पर गौर किया है? लोग इसे ऐसे खरीदते हैं जैसे यह उन्हें कॉरपोरेट नर्क की आग से बचा लेगी। यह कुर्सी नहीं, बल्कि एक हताश स्वीकारोक्ति है—यह मान लेना कि आपकी रीढ़ की हड्डी अब इस सड़े हुए सिस्टम का बोझ उठाने के काबिल नहीं रही। लाखों रुपये सिर्फ इसलिए खर्च करना ताकि जब आप अपनी अर्थहीन नौकरी के लिए मरें, तो कम से कम आपकी पीठ में ‘अरगोनॉमिक’ दर्द हो? यह उस बेबसी का सबसे महंगा स्मारक है जिसे हम रोज सुबह पहन कर दफ्तर जाते हैं।

सिलिकॉन की सड़ांध

अब यहाँ उस ‘स्वचालित नौकरशाही’ का प्रवेश होता है जिसे बाजारू भाषा में एआई कहा जाता है। यह कोई जादुई चिराग नहीं है, यह सिलिकॉन का बना एक परजीवी है। मैक्सवेल का दानव (Maxwell’s Demon) जो अब कोड के रूप में जिंदा हो गया है। यह उन अणुओं को अलग करता है जो आपके किसी काम के नहीं, लेकिन ऊर्जा तो खाता ही है। जहाँ इंसान थक कर हार मान लेता है, वहां यह बिना थके आपकी हर सांस, हर की-स्ट्रोक को डेटा में बदलता रहता है। लेकिन क्या इससे काम कम होगा? कभी नहीं। यह जेवन्स का विरोधाभास (Jevons Paradox) है: जब आप किसी संसाधन का उपयोग अधिक कुशलता से करते हैं, तो आप उसकी खपत कम नहीं करते, बल्कि बढ़ा देते हैं।

यह वैसा ही है जैसे आप अपने क्रेडिट कार्ड का भारी-भरकम कर्ज उतारने के लिए दूसरा और बड़ा लोन ले लें। जब आप श्रम को मशीनों के भरोसे छोड़ते हैं, तो आप केवल और अधिक कचरा पैदा करने की क्षमता बढ़ा लेते हैं। जिसे ‘डिजिटल क्रांति’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में केवल आपकी नसों में दौड़ते हुए उस कोर्टिसोल का विस्तार है जिसे अब कंप्यूटर स्क्रीन पर भी रियल-टाइम में देखा जा सकता है। यह वैसा ही है जैसे आप अपने पुराने स्मार्टफोन की बैटरी बचाने के लिए ‘लो पावर मोड’ ऑन करते हैं, लेकिन फिर उसी धुंधली स्क्रीन पर अपनी आंखें फोड़ते हुए पूरी रात रील्स स्क्रॉल करते हैं। ऊर्जा तो बर्बाद होनी ही है, बस अब आप उसे थोड़ा और धीरे-धीरे, किस्तों में मरते हुए देखते हैं।

शून्य का शोर

सार्वजनिक मूल्य (Public Value) का विचार भी एक ऐसा ही सड़ा हुआ फल है जिसे हम जबरदस्ती चबा रहे हैं। हम सोचते हैं कि हम समाज के लिए कुछ बना रहे हैं। हकीकत में, हम केवल उस डिजिटल नाले की सफाई कर रहे हैं जो कभी साफ नहीं होगा। तकनीक और संगठित श्रम का यह अपवित्र गठबंधन हमें एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रहा है जहाँ ‘इंसान’ की हैसियत दफ्तर के कोने में रखे उस पुराने प्रिंटर जैसी होगी जो कभी-कभी काम करता है और ज्यादातर समय बस अजीब सी आवाज़ें निकालता है। जब एल्गोरिदम ही तय करेंगे कि किसे कितना मिलना चाहिए, तब मनुष्य उस सिस्टम में केवल एक ‘बग’ बनकर रह जाएगा। एक ऐसी त्रुटि जिसे सुधारने की भी जरूरत नहीं समझी जाएगी, बस उसे ‘इग्नोर’ कर दिया जाएगा। हम उस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ काम की कोई जरूरत नहीं होगी, लेकिन जीवित रहने के लिए हमें उस सिस्टम की गुलामी फिर भी करनी होगी। यह सब देखकर मन करता है कि किसी गंदे रेलवे स्टेशन के बाहर खड़े होकर वह धूल भरी चाय पियूँ जो कम से कम आपको बीमार करने का वादा तो ईमानदारी से पूरा करती है। यह कॉर्पोरेट दुनिया तो आपको बीमार भी करती है और बिल भी आपके नाम फाड़ती है।

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