सार्वजनिक उपक्रमों का सड़ता हुआ गणित: शून्यता और वक्रता
सड़क के किनारे किसी बदबूदार ढाबे पर बैठकर, जब आप उस कड़क चाय की चुस्की लेते हैं जिसमें चीनी की मात्रा आपके अग्न्याशय (Pancreas) के लिए किसी आतंकी हमले जैसी है, तब ‘लोकहित’ और ‘सरकारी तंत्र’ जैसे शब्द किसी भद्दे मजाक की तरह लगते हैं। सार्वजनिक उपक्रमों (Public Enterprises) में निर्णय लेने की प्रक्रिया कोई प्रबंधन का अध्याय नहीं है; यह एक त्रासदी है जिसे हम ‘लोकतंत्र’ का नाम देकर खुद को सांत्वना देते हैं। वास्तव में, यह सामूहिक आलस, व्यक्तिगत असुरक्षा और ज्यामितीय विकृतियों का एक ऐसा जटिल जाल है, जहाँ तर्क दम तोड़ देता है।
पागलपन है ये सब।
विकृत स्थान की वक्रता (Curvature of Distortion)
जब दस नौकरशाह एक सागौन की मेज के चारों ओर बैठते हैं, तो आपको लगता है कि वे देश की समस्याओं पर विचार कर रहे हैं। गलत। वे वास्तव में एक ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) पर अपनी जिम्मेदारी के निर्देशांक (Coordinates) छिपाने की कोशिश कर रहे होते हैं। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की दृष्टि से, सरकारी सहमति कोई समतल मैदान नहीं है। यह एक ऊबड़-खाबड़ और विकृत सतह है, जिसका निर्माण उन बुजुर्गों की आहों से हुआ है जो अपनी पेंशन के लिए कतारों में खड़े-खड़े मर गए।
इस स्थान में ‘फिशर इंफॉर्मेशन मेट्रिक’ (Fisher Information Metric) यह नहीं मापता कि सत्य क्या है; यह मापता है कि किस झूठ में सबसे कम प्रतिरोध है। यहाँ ‘सहमति’ का अर्थ यह नहीं है कि सबसे श्रेष्ठ विचार जीत गया। इसका अर्थ केवल इतना है कि हमने ‘कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler Divergence) को इतना कम कर दिया है कि अब किसी एक व्यक्ति पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली के ट्रैफिक में फंसे दस वाहन—सब अलग दिशा में जाना चाहते हैं, लेकिन भौतिकी और भीड़ की जड़ता उन्हें एक ही दिशा में रेंगने पर मजबूर कर देती है।
इस प्रक्रिया में, यदि आप तर्कसंगत बात करते हैं, तो आप एक ‘आउटलायर’ हैं जिसे सिस्टम तुरंत खारिज कर देगा। आपकी फाइल, चाहे वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, अंततः एक Montblanc Meisterstück फाउंटेन पेन की नोक से निकले उस आदेश के नीचे दब जाएगी, जिसकी कीमत उस क्लर्क की सालाना कमाई से अधिक है जो उस फाइल को ढो रहा है। उस पेन की काली स्याही और फैसले की शून्यता में एक गहरा संबंध है—दोनों ही जनता के पैसे को चूसकर अपनी चमक बिखेरते हैं।
लालच का अनुकूलन (Optimization of Greed)
हमें बताया जाता है कि सिस्टम को ‘ऑप्टिमाइज़’ किया जा रहा है। लेकिन किस चर (Variable) के लिए? सार्वजनिक क्षेत्र में अनुकूलन का उद्देश्य ‘ग्लोबल मिनिमा’ (Global Minima) तक पहुँचना नहीं है, जहाँ समस्या का समाधान हो सके। इसका उद्देश्य उस ‘सैडल पॉइंट’ (Saddle Point) को खोजना है जहाँ काम करने का नाटक भी हो जाए और पसीना भी न बहे।
यहाँ मानवीय संवेदनाएँ, जैसे करुणा या नैतिकता, केवल सिस्टम के ‘बग्स’ हैं। एक युवा अधिकारी की ऊर्जा, जो शायद वास्तव में कुछ बदलना चाहता है, इस विशाल नौकरशाही के ‘थर्मल बाथ’ (Thermal Bath) में डूब जाती है। ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम यहाँ क्रूरता से लागू होता है: उत्साह का क्षय अनिवार्य है, और अंत में केवल ‘उदासीनता’ (Apathy) का एन्ट्रॉपी ही शेष बचता है।
यह निर्णय प्रक्रिया उस पुराने स्मार्टफोन की बैटरी जैसी है जो अब चार्ज नहीं होती। स्क्रीन जल रही है, आइकन दिख रहे हैं, ‘प्रोसेसिंग’ का गोला घूम रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर ऊर्जा का स्रोत सूख चुका है। यह केवल गर्मी पैदा कर रहा है—बेकार, अनुत्पादक गर्मी—जबकि असली काम रुका हुआ है।
क्या बकवास है।
सरकारी बैठकों में होने वाली चर्चाएँ भूखे कुत्तों द्वारा एक सूखी हड्डी को नोचने जैसा दृश्य प्रस्तुत करती हैं। उस हड्डी पर मांस (जनहित) का एक रेशा भी नहीं बचा है, फिर भी लड़ाई इस बात की है कि उस हड्डी को चबाने का ‘प्रशासनिक अधिकार’ किसके पास है। यह उत्तरजीविता का गणित है, जहाँ चर और अचर केवल अहंकार हैं।
अनंत शून्यता (The Void)
सूचना ज्यामिति हमें एक और कड़वा सच बताती है: यदि किसी मैनिफोल्ड की वक्रता (Curvature) बहुत अधिक हो, तो समानांतर रेखाएँ कभी नहीं मिलतीं। सरकार और जनता दो ऐसी ही रेखाएँ हैं। हम जिसे ‘पब्लिक पॉलिसी’ कहते हैं, वह उच्च-आयामी स्पेस (High-dimensional space) में किया गया एक ऐसा प्रोजेक्शन है जिसका धरातल की वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं है।
यह किसी फाइव-स्टार होटल में परोसे गए उस ‘फ्यूजन समोसे’ की तरह है, जो दिखने में तो आधुनिक और आकर्षक है, लेकिन जिसका स्वाद उस असली भूख को मिटाने में असमर्थ है जो फुटपाथ पर पसरी है। संगठन कोई जीवित इकाई नहीं हैं; वे ठंडे, निर्जीव एल्गोरिदम हैं जो मानवीय अक्षमताओं को छिपाने और यथास्थिति को बनाए रखने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
जब आप अगली बार किसी सरकारी कार्यालय की धूल भरी खिड़की से बाहर देखें, तो याद रखिएगा कि आप किसी व्यक्ति से नहीं लड़ रहे। आप एक ऐसी ज्यामिति से लड़ रहे हैं जिसे गणित ने भी त्याग दिया है।
दिमाग सुन्न हो रहा है। वेटर, एक और पैग लाओ।
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