सांख्यिकीय कसाईखाना

पिछली बार जब हम ‘समय की नीलामी’ पर चर्चा कर रहे थे, तो कोने में बैठे किसी नौसिखिए ने ‘विशेषज्ञता’ के पवित्र आश्रय के बारे में बुदबुदाया था। सुनकर हंसी भी नहीं आई, बस दया आई। आप लोग जिसे अपना ‘कौशल’ या ‘हुनर’ मानकर छाती से लगाए बैठे हैं, वह असल में बार के काउंटर पर पड़ी उस बासी मूंगफली की तरह है जिसे कोई खाना नहीं चाहता, बस कड़वी शराब के साथ निगल लिया जाता है।

समाजशास्त्री इसे ‘करियर निर्माण’ या ‘आत्म-साक्षात्कार’ जैसे सुनहरे शब्दों के रैपर में लपेटकर बेचते हैं। लेकिन अगर आप उस चमकदार पन्नी को फाड़कर देखें, तो अंदर केवल सड़ा हुआ मांस है। श्रम (Labor) का यह पूरा खेल किसी उच्च आदर्श के बारे में नहीं है; यह एक निर्मम सांख्यिकीय कसाईखाना है जहाँ यह तय होता है कि आप सिस्टम के लिए कितनी देर तक और कितना सस्ता ईंधन बन सकते हैं।

भूख की ज्यामिति और बाज़ार का पाखंड

‘बाज़ार अनुकूलता’ (Market Fit) जैसा भारी-भरकम शब्द असल में एक कसाई की छुरी है। यह तय करता है कि आज आपकी मांस-मज्जा का भाव क्या है। आपके पास चाहे कितनी भी परिष्कृत डिग्रियाँ हों, अगर वे बाज़ार की भूख नहीं मिटा सकतीं, तो वे रद्दी हैं।

आप सोचते हैं कि आप कोड लिख रहे हैं या डिज़ाइन बना रहे हैं? गलत। आप केवल बाज़ार के उस सेठ की सोने की कलम के लिए स्याही जुटा रहे हैं, जो आपके साल भर की कमाई एक हस्ताक्षर में उड़ा देता है। बाज़ार को आपकी ‘आत्मा’ या ‘रचनात्मकता’ में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं है। उसे सिर्फ यह देखना है कि आप सिस्टम के घर्षण (Friction) को कितना कम कर सकते हैं। आप एक लुब्रिकेंट हैं, कलाकार नहीं।

जब आप अपनी डेस्क पर बैठकर, कमर दर्द से कराहते हुए, यह सोचते हैं कि आपकी मेहनत रंग लाएगी, तो असल में आप केवल एन्ट्रापी के खिलाफ एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे होते हैं। उस दर्द को भुलाने के लिए, आप शायद डेढ़ लाख रुपये की उस एर्गोनोमिक कुर्सी का सपना देखते हैं। आपको लगता है कि वह जालीदार नायलॉन आपकी टूटी हुई रीढ़ और उससे भी ज्यादा टूटे हुए स्वाभिमान को सहारा देगा। कितनी बड़ी मूर्खता है। वह कुर्सी केवल आपको उस जगह पर ज्यादा देर तक टिकाए रखने का यंत्र है जहाँ आपकी धीरे-धीरे हत्या की जा रही है।

सूचना का सड़ता हुआ मलबा

सीखना और कौशल हासिल करना, जिसे आप ‘विकास’ कहते हैं, वह असल में दिमाग में कचरा जमा करने की प्रक्रिया है। थर्मोडायनामिक्स का नियम यहाँ भी लागू होता है: सूचना की एन्ट्रापी हमेशा बढ़ती है। आज आप जिसे ‘अत्याधुनिक तकनीक’ मानकर रट रहे हैं, वह कल सुबह तक बासी कढ़ी बन जाएगी।

याद है वे लोग जो टाइपराइटर ठीक किया करते थे? आज वे कहाँ हैं? आपकी तथाकथित ‘तकनीकी दक्षता’ का हश्र भी वही होने वाला है। बाज़ार में ‘स्वचालित कचरा’ (जिसे लोग आजकल बुद्धिमत्ता की सस्ती नकल कहते हैं) इतनी तेजी से फैल रहा है कि आपके ज्ञान की एक्सपायरी डेट, दूध के पैकेट से भी पहले आ जाती है। यह एक ऐसी दौड़ है जहाँ आप दौड़ते तो पूरी ताकत से हैं, लेकिन ज़मीन आपके पैरों के नीचे से पीछे की ओर खिसक रही है।

यह कौशल का ‘मैनिफोल्ड’ (Manifold) नहीं, बल्कि एक फिसलन भरा ढलान है। जो आज शिखर पर है, कल वह खाई में होगा। और उस खाई में गिरते हुए, आप शायद अपनी कलाई पर हीरों से जड़ी उस स्विस घड़ी को देखेंगे जिसे आपने अपनी सफलता का प्रतीक मानकर खरीदा था। वह घड़ी आपको समय तो सही दिखाएगी, लेकिन यह नहीं बताएगी कि आपका समय कब का खत्म हो चुका है।

ऊष्मागतिक पतन

अंततः, जिसे आप ‘बर्नआउट’ कहते हैं, वह कोई मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं है। वह एक शुद्ध रूप से ‘ऊष्मागतिक विफलता’ (Thermodynamic Failure) है। जब बाज़ार की मांग की गति आपके सीखने और अनुकूलन की क्षमता से तेज़ हो जाती है, तो आपका सिस्टम क्रैश कर जाता है। आप एक पुरानी बैटरी हैं जो चार्ज नहीं हो रही, बस गर्म हो रही है।

हम सब इस विशाल मशीन में केवल ‘एरर मार्जिन’ (Error Margin) हैं। हम सांख्यिकीय त्रुटियां हैं जिन्हें सिस्टम लगातार ठीक करने या हटाने की कोशिश कर रहा है। आप पचास हज़ार की रेशमी टाई पहनकर खुद को चाहे जितना भी ‘प्रोफेशनल’ महसूस कर लें, कसाई की नज़र में आप सिर्फ एक और जानवर हैं जिसका वजन तौला जा रहा है।

यहाँ कोई मुक्ति नहीं है। कोई ‘अगला बड़ा अवसर’ नहीं है। सिर्फ आप हैं, आपकी थकान है, और आपके बॉस की वह घिनौनी हंसी है।

अब जाओ, अपना काम करो। यहाँ बैठकर फलसफा झाड़ने से न तो दुनिया बदलेगी और न ही तुम्हारी तनख्वाह।

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