सांख्यिकीय गुलामी

पिछले हफ्ते हम चर्चा कर रहे थे कि कैसे एक ‘ब्रांड’ अपनी मृत्यु की घोषणा स्वयं करता है, लेकिन आज ज़रा उस से भी घृणित चीज़ पर नज़र डालते हैं—’सार्वजनिक हित’ (Public Interest) या जिसे आप अपनी कारपोरेट भाषा में ‘टीम वर्क’ कहते हैं। किसी भी आधुनिक दफ्तर में चले जाइए, जहाँ की हवा में सस्ते ‘एयर फ्रेशनर’ और हताश कर्मचारियों के बासी पसीने की गंध मिली होती है। वहाँ ‘लोक-कल्याण’ और ‘सर्वसम्मति’ की बातें ऐसे की जाती हैं जैसे कोई सड़क किनारे का ढाबा अपनी तीन दिन पुरानी दाल-मखनी में ‘शुद्ध देशी घी’ का तड़का लगाने का दावा कर रहा हो। हकीकत में, वह घी नहीं, तुम्हारी नसों में दौड़ता हुआ जानलेवा कोलेस्ट्रॉल है।

जब हम किसी संस्था में बैठकर ‘आम सहमति’ बनाने का नाटक करते हैं, तो हम असल में क्या कर रहे होते हैं? हम बस अपनी जेब खाली होने के डर, ईएमआई के बोझ और बॉस के सामने दुम हिलाने की मजबूरी के बीच एक ऐसा समझौता ढूंढ रहे होते हैं जिसे समाज की सड़ी हुई नैतिकता स्वीकार कर सके। लोग इसे ‘लोकतंत्र’ या ‘कॉर्पोरेट संस्कृति’ कहते हैं, लेकिन अगर आप अपनी बौद्धिक दरिद्रता को उतारकर गणितीय नज़रिए से देखें, तो यह विशुद्ध रूप से सूचना ज्यामिति (Information Geometry) का एक क्रूर खेल है।

क्या बकवास है। मुझे इस पाखंड से घिन आती है।

भ्रम का गणित और फिशर की चाबुक

सार्वजनिकता (Publicity) कोई नैतिक गुण नहीं है। यह केवल एक रीमानियन मैनिफोल्ड (Riemannian Manifold) पर बिखरे हुए उन ‘संभाव्यता वितरणों’ (Probability Distributions) का एक समूह है, जो अपनी पहचान खो चुके हैं। जब तुम्हारा मैनेजर उस लाख रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठकर—जिस पर शायद टैक्स भरने वालों का पैसा या किसी निवेशक की मूर्खता लगी है—कहता है कि “हमें एक ही पन्ने पर होना चाहिए,” तो वह अनजाने में तुम्हें एक सांख्यिकीय सांचे (Statistical Model) में ढाल रहा होता है।

यहाँ फिशर सूचना (Fisher Information) का प्रवेश होता है। यह कोई महान वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि यह मापने का एक पैमाना है कि तुम्हारा व्यक्तित्व कितना खोखला है। फिशर सूचना यह मापती है कि किसी मॉडल के पैरामीटर्स (यानी तुम्हारे विचार) में ज़रा सा बदलाव करने पर पूरे सिस्टम में कितनी हलचल होती है। एक घिसे-पिटे संगठन में, जहाँ हर कोई एक-दूसरे की चापलूसी में लगा है, वहाँ फिशर सूचना शून्य के करीब होती है। तुम्हारी राय की कीमत उस फटी हुई जेब जैसी है जिसमें से सिक्के पहले ही गिर चुके हैं। वह संगठन एक ऐसे तकनीकी मलबे की तरह है जो केवल शोर करता है, काम नहीं।

इंसानी भावनाओं को तुम ‘अंतरात्मा’ कहते हो, लेकिन विज्ञान की ठंडी नज़र में वह केवल एक ‘न्यूरल नॉइज़’ है, एक ऐसी आवाज़ जो सिर्फ तब निकलती है जब तुम्हारे पास अगले महीने का किराया देने के पैसे नहीं होते। जब तुम मीटिंग में घंटों बैठकर बहस करते हो, तो तुम असल में कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस (Kullback-Leibler Divergence) को कम करने की कोशिश कर रहे होते हो। सरल शब्दों में: तुम अपने अहंकार को इतना छोटा और चपटा कर रहे होते हो कि वह सिस्टम के छेद में बिना किसी घर्षण के फिट हो सके।

जियोडेसिक: नरक का सबसे छोटा रास्ता

रीमानियन मैनिफोल्ड पर दो विचारों के बीच का सबसे छोटा रास्ता ‘सीधी रेखा’ नहीं होता, उसे जियोडेसिक (Geodesic) कहा जाता है। दफ्तरों में यह रास्ता अक्सर चापलूसी या किसी विदेशी चमड़े के लैपटॉप बैग की चमक के पीछे छिपकर निकलता है। लोग सोचते हैं कि वे तर्कों से दूसरों को मना रहे हैं, जबकि वे केवल अपनी ऊर्जा बचाने के लिए सूचना की ढलान (Information Gradient) पर फिसल रहे होते हैं जहाँ सबसे कम विरोध हो।

यह वैसा ही है जैसे तुम भूख से तड़पते हुए किसी ऐसी दुकान से समोसा खरीद लेते हो जहाँ मक्खियाँ भिनभिना रही हों, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह पास है और तुम और चलने की ताकत नहीं रखते। सहमति बनाना कोई महान कार्य नहीं है, यह तुम्हारी मानसिक थकान की निशानी है। सोचो, तुम एक भीड़भाड़ वाली बस में खड़े हो और हर कोई एक-दूसरे को कोहनियाँ मार रहा है। वहाँ जो ‘सहमति’ बनती है कि कौन कहाँ खड़ा होगा, वह कोई नैतिक समझौता नहीं है, बल्कि वह शारीरिक दर्द को कम करने की एक सांख्यिकीय मजबूरी है।

यही हाल ‘पब्लिक पॉलिसी’ का है। जब सरकारें कहती हैं कि वे ‘जनता की आवाज़’ सुन रही हैं, तो वे केवल उस सांख्यिकीय शोर को फिल्टर कर रही होती हैं जो उनके पहले से तैयार ‘मैनिफोल्ड’ की ज्यामिति में फिट बैठता है। यह वैसा ही है जैसे तुम किसी टूटी हुई सड़क के जानलेवा गड्ढों को भरने के बजाय वहाँ एक महंगा डिजिटल साइनबोर्ड लगा दो जिस पर ‘स्मार्ट सिटी’ लिखा हो। लोग उस बोर्ड की रोशनी देखकर खुश हो जाते हैं, जबकि नीचे की ज़मीन धंस रही होती है।

संवेदी कचरा और चांदी की कलम

इंसानी दिमाग की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह अर्थ (Meaning) ढूंढने के लिए प्रोग्राम किया गया है, भले ही वहाँ सिर्फ अराजकता (Entropy) हो। हम ‘टीम स्पिरिट’ जैसे शब्दों में दिव्यता ढूंढते हैं, जैसे कोई गधा दो लाख रुपये की कीमती फाउंटेन पेन से रद्दी कागज़ पर दस्तखत करते समय खुद को शेक्सपियर समझने लगता है। कितनी घिनौनी बात है कि जिस पेन की कीमत एक गरीब परिवार के पूरे साल के राशन के बराबर है, उससे लिखे जाने वाले शब्द अक्सर उतने ही खोखले होते हैं जितना कि वह ‘कॉर्पोरेट विजन’ जिसे वह साकार करने का दावा करता है।

सहमति, सहयोग और लोक-कल्याण—ये सब ऊर्जा की बचत (Energy Minimization) के बहाने हैं। अगर हम सब अलग-अलग दिशा में भागेंगे, तो ‘थर्मोडायनामिक्स’ के दूसरे नियम के अनुसार सिस्टम जल्दी नष्ट हो जाएगा। इसलिए, हम ‘सहयोग’ का मुखौटा पहनते हैं ताकि हम कम से कम प्रयास में जीवित रह सकें। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि किसी ‘मैरिज हॉल’ में मिलने वाला मुफ्त का खाना—स्वाद में भले ही वह कचरा हो, लेकिन मुफ़्त है, इसलिए हर कोई लाइन में लगकर अपनी थाली भरता है और एक-दूसरे को झूठी मुस्कान देता है।

अंततः, संगठन की निर्णय प्रक्रिया किसी दिव्य प्रेरणा से नहीं, बल्कि सांख्यिकीय बाधाओं (Constraints) से संचालित होती है। तुम केवल एक डेटा पॉइंट हो जो एक विशाल, ठंडे और निर्दयी मैनिफोल्ड पर रेंग रहे हो। जिसे तुम ‘लीडरशिप’ कहते हो, वह केवल फिशर मैट्रिक्स का एक खास ‘आइगन-वेक्टर’ (Eigenvector) है जो शोर के बीच दूसरों की तुलना में थोड़ा ज़्यादा तेज़ी से चमकता है और फिर बुझ जाता है। अगली बार जब तुम्हारा बॉस ‘लोकतांत्रिक निर्णय’ की बात करे, तो समझ जाना कि वह तुम्हारी गर्दन पर सांख्यिकीय चाकू चलाने की तैयारी कर रहा है ताकि तुम उसके मॉडल में फिट हो सको।

वापस अपने काम पर लग जाओ। यह दुनिया तुम्हारी भावनाओं के लिए नहीं, बल्कि डेटा की सफाई के लिए बनी है। सांख्यिकीय कचरा खुद साफ नहीं होगा।

क्या मूर्खता है।

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