कसाईखाने का गणित
अक्सर जब लोग ‘सार्वजनिक हित’, ‘सिनर्जी’ या ‘संगठनात्मक संस्कृति’ जैसे भारी-भरकम शब्दों की उल्टी करते हैं, तो मुझे उस सड़क किनारे वाले हलवाई की याद आती है जिसकी कड़ाही का तेल इतना पुराना और काला हो चुका है कि वह अब रसायन विज्ञान का एक घातक प्रयोग बन गया है, लेकिन वह उसे ‘पारंपरिक स्वाद’ का लेबल लगाकर बेच रहा है। हम जिसे ‘सामूहिक बुद्धिमत्ता’ (Collective Intelligence) कहकर पूजते हैं, वह असल में और कुछ नहीं बल्कि एक ही गटर की ओर दौड़ते हुए अंधों का एक सांख्यिकीय संरेखण (Statistical Alignment) है। लोग सोचते हैं कि वे मिलकर इतिहास रच रहे हैं, जबकि असलियत में वे केवल अपनी सुबह की फीकी चाय और शाम की ठंडी रोटी के बीच के अस्तित्वगत खालीपन को भरने के लिए शोर मचा रहे हैं।
यह कोई महान विचार नहीं है, यह केवल एक ‘संभाव्यता वितरण’ (Probability Distribution) है जहाँ हर कोई अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है कि कब उसे सिस्टम को, या एक-दूसरे को लूटने का मौका मिले। जिसे तुम ‘पब्लिकनेस’ कहते हो, वह बस दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर पीक ऑवर में लगने वाली वह भीड़ है जहाँ हर कोई एक-दूसरे की जेब काटने, या कम से कम अपनी कोहनी दूसरे की पसलियों में घुसाने की फिराक में रहता है ताकि उसे एक इंच जगह मिल सके। यह सब एक बहुत ही घटिया और थकाऊ खेल है। अगर हम इसे ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के निर्मम चश्मे से देखें, तो तुम्हारी सारी नैतिकता और ‘टीम भावना’ केवल उस वक्रता (curvature) की तरह है जो एक जलेबी बनाने वाले के हाथ की सफाई में होती है—दिखने में जटिल, पर अंततः केवल चीनी और मैदे का एक चिपचिपा जाल।
भीड़ का सड़ांध और खाली जेबें
किसी भी कॉर्पोरेट मीटिंग में बैठिए, जहाँ एयर कंडीशनर की ठंडी हवा के पीछे छिपी हुई सस्ते डियोडरेंट, पसीने और नौकरी जाने के डर की गंध साफ महसूस की जा सकती है। वहां ‘लोकतंत्र’ और ‘सर्वसम्मति’ का तमाशा मनाया जाता है, लेकिन गणितीय रूप से, वह केवल तुम्हारी असुरक्षाओं का एक डेटा पॉइंट है। जब सौ लोग एक कॉन्फ्रेंस रूम में बैठकर बकवास करते हैं, तो वे किसी सत्य तक नहीं पहुँच रहे होते; वे केवल अपने सामूहिक अज्ञानता की गंदगी को एक कोने से दूसरे कोने में धकेल रहे होते हैं। यह ‘एंट्रॉपी’ कम करना नहीं है, यह केवल उस कूड़े को व्यवस्थित करना है जो कल फिर से फैलने वाला है।
तुम जिसे ‘आधुनिक संगठन’ कहते हो, वह असल में एक बेहद महंगी और फिजूलखर्ची वाली एर्गोनोमिक कुर्सी की तरह है—दिखने में बहुत वैज्ञानिक और ‘स्टेटस सिंबल’, लेकिन अंततः वह तुम्हारी रीढ़ की हड्डी को उसी गुलामी के लिए तैयार करती है जो तुम्हें अगले तीस सालों तक झेलनी है। उस कुर्सी की कीमत तुम्हारी दो साल की बचत के बराबर हो सकती है, और तुम उसे किश्तों पर खरीदकर खुद को ‘सफल’ मान सकते हो, लेकिन वह तुम्हें वह सुकून कभी नहीं देगी जो एक दिहाड़ी मजदूर को दोपहर में पार्क की बेंच पर सोकर मिलता है। यह सब केवल एक ‘रीमानियन मैनिफोल्ड’ (Riemannian Manifold) है, जहाँ रास्ता सीधा नहीं बल्कि टेढ़ा-मेढ़ा है, ठीक उसी तरह जैसे तुम्हारे बॉस की वह कृत्रिम मुस्कान जब वह तुम्हें बिना इंक्रीमेंट के और ज्यादा काम थमाने वाला होता है। तुम इस टेढ़े स्थान (curved space) में सीधी रेखा में चलने का भ्रम पालते हो, पर तुम बस गोल-गोल घूम रहे हो।
सूचना की भूख और दलाली
यहाँ ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) का मतलब यह नहीं है कि तुम कितने ज्ञानी हो या तुम्हारे पास कितना डेटा है। इस बाजार में, इसका सीधा और क्रूर मतलब यह है कि तुम्हारी जेब से, तुम्हारे दिमाग से और तुम्हारे समय से कितना ‘जूस’—यानी पैसा—निचोड़ा जा सकता है। जब कोई कंपनी ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ या ‘ऑर्गनाइज़ेशन रिस्ट्रक्चरिंग’ की बात करती है, तो वह असल में अपने दलालों और शेयरधारकों के लिए नया रास्ता बना रही होती है। तुम्हारी भावनाएं, तुम्हारा गुस्सा, तुम्हारी वह खोखली ‘टीम स्पिरिट’—यह सब केवल उस गणितीय मशीन के लिए ईंधन है जो तुम्हारी मेहनत को किसी और के मुनाफे में बदल देती है।
तुम सोचते हो कि तुम ‘इनोवेशन’ कर रहे हो, लेकिन तुम केवल उस सांख्यिकीय मैनिफोल्ड पर रेंग रहे हो जहाँ ढलान सबसे ज्यादा (steepest descent) है। यह किसी पहाड़ी रास्ते पर ब्रेक फेल हुई खटारा बस की तरह है; तुम चाहे जितनी भी कोशिश कर लो, स्टीयरिंग घुमा लो या भगवान को याद कर लो, गिरना वहीं है जहाँ गुरुत्वाकर्षण और बाजार का गणित तुम्हें ले जाएगा। लोग अपनी हैसियत दिखाने के लिए चमचमाती पीपीटी (PPT), भारी-भरकम शब्द और महंगे गैजेट्स का इस्तेमाल करते हैं, मानो वे दुनिया बदल देंगे। लेकिन हकीकत यह है कि तुम्हारी हैसियत उस ‘नॉइज़’ (Noise) से ज्यादा कुछ नहीं है जिसे सिस्टम एक झटके में ‘आउटलायर’ मानकर डिलीट कर देता है। तुम्हारी हर मीटिंग, हर ईमेल, और हर वह फेक हंसी जो तुम अपने क्लाइंट को देते हो, वह केवल उस सांख्यिकीय मॉडल को पुख्ता करती है जो तुम्हें एक संसाधन से ज्यादा कुछ नहीं समझता।
नियंत्रण की वह अदृश्य लाठी
आज के दौर में, शासन अब किसी राजा की तलवार या संसद के कानून से नहीं, बल्कि उस अदृश्य हिसाब-किताब से चलता है जो तुम्हारे फोन, तुम्हारे बायोमेट्रिक्स और तुम्हारे ब्राउज़िंग हिस्ट्री के पीछे बैठा है। यह कोई ‘डिजिटल क्रांति’ नहीं है, यह केवल एक ऐसी तानाशाही है जहाँ तुम्हें पता भी नहीं चलता कि तुम कब अपनी मानसिक आजादी बेच चुके हो। यह ‘एल्गोरिथमिक गवर्नेंस’ यह तय नहीं करता कि क्या नैतिक है या क्या सही है; वह केवल यह तय करता है कि क्या ‘सस्ता’ है और क्या ‘ऑप्टिमल’ है। जब कोई नीति लागू होती है, तो वह तुम्हारे भले के लिए नहीं, बल्कि उस ‘जियोडेसिक’ (geodesic) पथ को खोजने के लिए होती है जहाँ पूंजी का प्रवाह बिना किसी मानवीय बाधा के हो सके।
मानव मन को लगता है कि वह स्वतंत्र है, कि उसके पास ‘फ्री विल’ है, लेकिन हम केवल उस गणितीय पिंजरे में बंद सफेद चूहे हैं जो पहिए पर दौड़ रहा है। हमें लगता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि पसीना निकल रहा है, लेकिन पहिया वहीं का वहीं है और प्रयोग करने वाला वैज्ञानिक ऊपर से हंस रहा है। यह सब देखकर सिर्फ सरदर्द और पेट में जलन होती है। यह प्रगति नहीं है, यह केवल एक बहुत ही व्यवस्थित तरीके से, बहुत ही महंगे उपकरणों के साथ की जा रही आत्महत्या है। सामूहिक बुद्धिमत्ता असल में सामूहिक मूर्खता का वह चरम बिंदु है जहाँ हम खुद अपनी बर्बादी के लिए तालियां बजाते हैं और सोचते हैं कि हम बहुत ‘एडवांस्ड’ हो गए हैं। कोई नया युग नहीं आ रहा, बस तुम्हारी गुलामी का गणित थोड़ा और सटीक, थोड़ा और धारदार होता जा रहा है।
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