सांख्यिकीय नरक

चाय, एन्ट्रापी और पसीने की गंध

विश्वविद्यालय के पीछे वाली उस जर्जर चाय की टपरी पर, जहाँ समोसे तलने वाला तेल शायद मेरे जन्म से पहले से उबल रहा है, मैं अक्सर बैठकर उस विशाल धोखे को निहारता हूँ जिसे दुनिया ‘लोकतंत्र’ और ‘सार्वजनिक सेवा’ कहती है। उस कड़ाही में उबलता हुआ काला तेल शुद्ध ‘एन्ट्रापी’ (Entropy) है—अव्यवस्था का वह चरम रूप, जहाँ स्वाद और स्वास्थ्य दोनों आत्महत्या कर लेते हैं। ठीक वैसे ही, जिसे आप ‘समाज सेवा’ या ‘पब्लिक वर्क’ कहते हैं, वह असल में एक सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) पर होने वाला एक क्रूर मजाक है।

यहाँ कोई ‘सेवा’ नहीं हो रही है। यहाँ केवल ऊर्जा का एक अकुशल स्थानांतरण हो रहा है, जहाँ एक आम आदमी अपनी गरिमा को जलाकर सिस्टम के लिए ईंधन बना रहा है।

श्रम: एक महिमामंडित गुलामी

अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री श्रम को ‘मूल्य निर्माण’ का नाम देकर उसे पवित्र बनाने की कोशिश करते हैं। बकवास। श्रम, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र का श्रम, अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अपनी ही आत्मा को किस्तों में बेचने की प्रक्रिया है। यह एक तरह का ‘बायोलॉजिकल टैक्स’ है जो हम जिंदा रहने के जुर्म में भरते हैं।

कल्पना कीजिए एक सफाई कर्मचारी की, या उस क्लर्क की जो फाइलों के पहाड़ के नीचे दबा है। वे ‘देश बना’ नहीं रहे हैं; वे केवल समाज के उच्च वर्ग द्वारा फैलाए गए कचरे को कालीन के नीचे सरका रहे हैं। यह ‘सफाई’ नहीं है, यह सभ्यता की गंदगी को छुपाने का एक हताश प्रयास है। और विडंबना देखिए, जिस सिस्टम को चलाने के लिए ये लोग अपनी रीढ़ की हड्डी तोड़ देते हैं, उसी सिस्टम के शीर्ष पर बैठा कोई ‘सरकारी दामाद’ करदाताओं के पैसे से खरीदी गई आलीशान एर्गोनोमिक कुर्सी पर अपनी तोंद टिकाकर ऊँघ रहा होता है। उस कुर्सी का ‘लम्बर सपोर्ट’ (Lumbar Support) शायद उस गरीब क्लर्क की पूरी जिंदगी की कमाई से ज्यादा महंगा होगा। लेकिन विज्ञान चाहे जितनी तरक्की कर ले, उस कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की नैतिक रीढ़ को सीधा करने की तकनीक अभी तक ईजाद नहीं हुई है।

सामाजिक सहमति और बगल वाले की कोहनी

सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की बात करें तो ‘सामाजिक सहमति’ (Social Consensus) कोई समतल मैदान नहीं है जहाँ सब खुशी-खुशी हाथ मिलाते हैं। यह एक ऊबड़-खाबड़, वक्रता (Curvature) से भरा हुआ दुःस्वप्न है। अगर आप वास्तव में इस ‘कर्वेचर’ को महसूस करना चाहते हैं, तो सुबह 9 बजे की मुंबई लोकल या दिल्ली मेट्रो में चढ़ जाइये।

वह ‘सामाजिक सहमति’ वहाँ उस पल महसूस होती है जब भीड़ में दबे होने के कारण, बगल वाले पसीने से तरबतर यात्री की कोहनी आपकी पसलियों में धंस रही होती है, और आप चाहकर भी हिल नहीं पाते। वह दबाव, वह उमस, और वह लाचारी—वही है असली ‘फिशर इनफॉर्मेशन मीट्रिक’ (Fisher Information Metric)। हम जिसे ‘सहिष्णुता’ कहते हैं, वह असल में न्यूरॉन्स का वह शोर है जो हमें चीखने से रोकता है ताकि बस या ट्रेन में दंगा न भड़क जाए। यह शांति नहीं है, यह एक विस्फोटक स्थिति का ‘स्थिर संतुलन’ (Stable Equilibrium) है।

लूट का गणित: इष्टतम परिवहन (Optimal Transport)

अब आते हैं ‘मूल्य वितरण’ पर। गणित में ‘मोंगे-कांतोरोविच’ (Monge-Kantorovich) का सिद्धांत है जो संसाधनों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ‘इष्टतम परिवहन’ (Optimal Transport) की बात करता है। लेकिन हमारे महान देश में, यह परिवहन एक ऐसी पाइपलाइन के जरिए होता है जिसमें छेद ही छेद हैं।

जब सरकार 100 रुपये जारी करती है, तो वह ‘जनता’ तक पहुँचते-पहुँचते 10 रुपये का सिक्का बन जाता है। बाकी के 90 रुपये? वे घर्षण (Friction) में नहीं जाते, वे उस अदृश्य ‘ब्लैक होल’ में समा जाते हैं जिसे हम ‘प्रशासनिक व्यय’ और ‘कमीशन’ कहते हैं। यह लीकेज नहीं है, यह डकैती है जिसे गणितीय समीकरणों में ‘सिस्टम लॉस’ कहकर उचित ठहराया जाता है।

आप देखिए, नीतियां बनाने वाले लोग उन वातानुकूलित कमरों में बैठकर फैसले लेते हैं, जहाँ हकीकत की धूल का एक कण भी प्रवेश नहीं कर सकता। वे अपनी महंगी मोंटब्लैंक कलम से उन फाइलों पर हस्ताक्षर करते हैं जो लाखों लोगों की किस्मत तय करती हैं। उस कलम की स्याही जितनी शाही है, उससे लिखे गए शब्द उतने ही खोखले हैं। वे ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लिखते हैं, लेकिन असल में वे केवल गरीबी को आंकड़ों (Statistics) के एक पन्ने से दूसरे पन्ने पर स्थानांतरित कर रहे होते हैं। इसे ‘अर्थ मूविंग’ (Earth Moving) समस्या कहा जाता है, लेकिन यहाँ केवल फाइलों की धूल मूव हो रही है।

शून्य का सन्नाटा

अंततः, यह सब एक बड़ा सांख्यिकीय तमाशा है। हम सभी एक विशाल ‘प्रोबेबिलिटी डिस्ट्रीब्यूशन’ (Probability Distribution) में फँसे हुए छोटे-छोटे बिंदु हैं, जो यह मानकर चल रहे हैं कि हमारी भागदौड़ का कोई मतलब है। लेकिन ज्यामिति निर्दयी होती है। वक्रता कभी सीधी नहीं होगी, और एन्ट्रापी हमेशा जीतेगी। चाय ठंडी हो चुकी है, और सामने वाली सड़क पर लगा जाम यह याद दिला रहा है कि हम कहीं नहीं पहुँच रहे हैं। बस शोर है। और धुआँ।

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