सांख्यिकीय नरक: श्रम की ज्यामिति और आत्मा का पतन
पिछली बार हम ‘सफलता’ की उस मृगतृष्णा पर चर्चा कर रहे थे जिसे कॉर्पोरेट जगत के कांच के महलों में परोसा जाता है। आज उस सड़ांध को थोड़ा और गहराई से, गणितीय निष्ठुरता के साथ खुरचते हैं। जिसे आप ‘करियर ग्रोथ’ कहते हैं, वह वास्तव में सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के मैनिफोल्ड पर एक बेतुकी और थकाऊ दौड़ मात्र है।
आप सोचते हैं कि आप सीढ़ी चढ़ रहे हैं, लेकिन हकीकत में आप केवल अपनी संभावना वितरण (Probability Distribution) के मापदंडों को बदल रहे हैं ताकि आपकी कुल एन्ट्रॉपी थोड़ी देर के लिए कम दिखाई दे। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे स्मार्टफोन की बैटरी जब 1% पर होती है, तो आप स्क्रीन की ब्राइटनेस कम कर देते हैं—मौत तो तय है, बस आप उस काली स्क्रीन के सन्नाटे को थोड़ा धीमा कर रहे हैं। क्या बकवास है।
भ्रम और भूख
मध्यम वर्ग के लिए ‘मेहनत’ एक ऐसा शब्द है जिसे पवित्र माना जाता है, जैसे किसी मंदिर का प्रसाद। लेकिन भौतिकी की दृष्टि से देखें तो यह केवल ऊर्जा का अपव्यय है। जब कोई कर्मचारी रात के दो बजे तक एक्सेल शीट पर अपनी आंखें फोड़ता है, तो वह ‘मूल्य’ (Value) पैदा नहीं कर रहा होता, बल्कि वह केवल फिशर सूचना (Fisher Information) के स्थान में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने की कोशिश कर रहा होता है।
लोग अक्सर ‘जुनून’ या ‘पैशन’ की बात करते हैं। तंत्रिका विज्ञान की भाषा में, यह केवल डोपामाइन की एक छोटी सी लहर है जो आपके मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को यह विश्वास दिलाने के लिए धोखा देती है कि आपके अस्तित्व का कोई अर्थ है। यह उतना ही सतही है जितना कि पहाड़ों पर मिलने वाली वह ₹100 की मैगी—स्वाद कुछ नहीं, बस ‘माहौल’ का पैसा है। आप उस मैगी को खाते हैं, यह जानते हुए भी कि वह कच्ची है, ठीक वैसे ही जैसे आप अपनी नौकरी को निगलते हैं। यह पेट नहीं भरती, बस भूख को मार देती है।
अपमान की ज्यामिति
सूचना ज्यामिति में, करियर एक ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ पर एक वक्र (Curve) की तरह है। यहाँ दूरी किलोमीटर में नहीं, बल्कि ‘कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler Divergence) में मापी जाती है। आपकी वर्तमान स्थिति और आपके ‘प्रमोशन’ के बीच की दूरी इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आपने कितना काम किया, बल्कि इस पर कि उस सिस्टम की वक्रता (Curvature) कितनी टेढ़ी है।
कभी-कभी आप पूरी ताकत लगा देते हैं, फिर भी वहीं रहते हैं। क्यों? क्योंकि आप एक ऐसी जगह पर हैं जहाँ ‘मीट्रिक टेंसर’ (Metric Tensor) शून्य के करीब है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे मुंबई की लोकल ट्रेन के जनरल कोच में बीच में फंस जाना—आप हिलना चाहते हैं, आपके पैर जमीन पर नहीं हैं, पसलियों में किसी की कोहनी धंसी है, लेकिन भीड़ का दबाव आपको स्थिर रखता है। आप इसे ‘स्थिरता’ कहते हैं, मैं इसे ‘ज्यामितीय लकवा’ कहता हूँ।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे हास्यास्पद चीज़ वह एर्गोनोमिक ऑफिस चेयर है जिसे लोग इस उम्मीद में खरीदते हैं कि शायद उनकी रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ उनका करियर भी सीधा हो जाए। पच्चीस हज़ार रुपये की कुर्सी? क्या यह मुझे अंतरिक्ष में ले जाएगी? या सिर्फ मेरे पतन को थोड़ा और आरामदायक बनाएगी? यह कुर्सी उस कसाई के तख्ते जैसी है जिसे मखमल से ढंक दिया गया हो। आप उस पर बैठकर अपनी ही आत्मा का सौदा करते हैं।
घिसावट और सन्नाटा
अनुकूलन (Optimization) का सिद्धांत कहता है कि हर प्रणाली न्यूनतम ऊर्जा की स्थिति की ओर बढ़ती है। कार्यस्थल में, इसका मतलब है ‘बर्नआउट’। जिसे समाज ‘असफलता’ कहता है, वह वास्तव में थर्मल इक्विलिब्रियम (Thermal Equilibrium) है। जब आपका दिमाग अब और अधिक डेटा प्रोसेस नहीं कर पाता, तो वह सूचना के शोर को कम करने के लिए खुद को शटडाउन कर लेता है। समाज इसे डिप्रेशन कहता है, मैं इसे ‘सिस्टम रीसेट’ कहता हूँ।
हम सब एक ऐसे एल्गोरिथ्म का हिस्सा हैं जिसे यह नहीं पता कि रुकना कब है। हम अपनी कार्यक्षमता को उस बिंदु तक ऑप्टिमाइज़ करते हैं जहाँ हम खुद ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। आप एक असली चमड़े के लैपटॉप बैग को सीने से लगाकर चलते हैं, जैसे वह कोई जीवन रक्षक जैकेट हो। जबकि हकीकत में, वह केवल उन फाइलों का बोझ ढो रहा है जो आपकी कब्र खोद रही हैं। वह बैग आपकी ‘सफलता’ का प्रतीक नहीं, आपकी बेड़ियों का वजन है।
जितना अधिक हम करियर के पथ को ‘अनुकूलित’ करने की कोशिश करते हैं, उतना ही हम उसकी प्राकृतिक वक्रता को बिगाड़ देते हैं। अंत में, हम सब केवल एक सांख्यिकीय आउटलायर (Outlier) बनकर रह जाते हैं, जिसका डेटा पॉइंट किसी भी सार्थक ग्राफ में फिट नहीं बैठता। और शायद, यही एकमात्र स्वतंत्रता है जो हमें मिलती है—एक त्रुटि (Error) बन जाना। घर जाना चाहता हूँ। यह बियर भी अब गर्म हो चुकी है।
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