सांख्यिकीय नरक

भ्रम का गणित

पिछली बार जब हम उस धुएँ से भरे, सस्ते बार में बैठे थे, तो हमने ‘ग्रोथ माइंडसेट’ के उस खोखलेपन पर चर्चा की थी जिसने कॉर्पोरेट जगत को एक वातानुकूलित मानसिक अस्पताल बना दिया है। वह चर्चा अधूरी थी। जिसे आप ‘बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन’ या ‘पब्लिक सर्विस’ कहते हैं, वह वास्तव में कुछ और नहीं बल्कि उन लोगों का एक झुंड है जो अपने खाली पेट, अपनी असुरक्षाओं और अपनी अधूरी नींद को सांख्यिकीय विविधताओं (Statistical Manifolds) के पीछे छिपा रहे हैं। लोग सोचते हैं कि वे समाज की सेवा कर रहे हैं या जीडीपी में योगदान दे रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे केवल अपनी ईएमआई (EMI) चुकाने के लिए एक डेटा बिंदु से दूसरे बिंदु तक रेंग रहे हैं। यह जीवन नहीं है; यह एक गणितीय त्रुटि है जिसे बार-बार दोहराया जा रहा है।

महंगे पिंजरे की वक्रता

एक संगठन केवल सूचनाओं का एक संग्रह है जो ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह सुनने में बहुत वैज्ञानिक और परिष्कृत लगता है, है न? लेकिन असल में यह उतना ही साधारण और अपमानजनक है जितना कि राशन की दुकान पर अपनी बारी का इंतजार करना। जब आप सुबह 9 बजे ऑफिस में बायोमेट्रिक मशीन पर अपनी उंगली रखते हैं, तो आप इंसान नहीं होते; आप केवल एक सांख्यिकीय बिंदु होते हैं जो इस विविध तंत्र की वक्रता (Curvature) को बनाए रखने की कोशिश कर रहा होता है। यह वक्रता कुछ और नहीं, बल्कि आपके बॉस के चेहरे पर मौजूद चिंता की लकीरें, एसी की भनभनाहट और उन व्यर्थ की फाइलों का ढेर है जो कभी नहीं पढ़ी जाएंगी।

लोग ‘टीम वर्क’ की बात ऐसे करते हैं जैसे यह कोई आध्यात्मिक अनुभव हो। असल में, यह सिर्फ एक-दूसरे की कोहनियों से टकराना है। यह दिल्ली मेट्रो के राजीव चौक स्टेशन पर उस पसीने से तर-बतर भीड़ जैसा है, जहाँ हर कोई एक ‘विजन’ का हिस्सा होने का नाटक करता है, जबकि असलियत में वे केवल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका बटुआ चोरी न हो जाए। वहां कोई ‘सिनर्जी’ (Synergy) नहीं है, वहां सिर्फ ‘कोलिजन’ (Collision) है। यह सहयोग नहीं, बल्कि अस्तित्व का एक नग्न संघर्ष है जिसे ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ का रंगीन कवर पहना दिया गया है। आपकी इस तथाकथित ‘कल्चर’ की कीमत केवल उतनी ही है जितनी कि कैंटीन में मिलने वाली उस ठंडी, बेस्वाद चाय और कल के समोसे की।

श्रम की ज्यामिति और पसीने का कर

यहाँ ‘इन्फॉर्मेशन ज्योमेट्री’ का असली खेल शुरू होता है। जब हम ‘सार्वजनिक श्रम’ की बात करते हैं, तो हम वास्तव में इष्टतम परिवहन सिद्धांत (Optimal Transport Theory) का उपयोग कर रहे होते हैं—जो कि बस यह है कि कैसे एक आम आदमी की जेब से पैसा और समय निकालकर सिस्टम की तिजोरी तक पहुँचाया जाए। समाज में एक ‘अव्यवस्थित स्थिति’ (Point A) है और हमें उसे ‘आदर्श स्थिति’ (Point B) तक ले जाना है, लेकिन इस प्रक्रिया में जो घर्षण होता है, वह आपकी कमर के पुराने दर्द और आँखों के नीचे के काले घेरों में स्पष्ट दिखाई देता है।

इस सांख्यिकीय धरातल की वक्रता इतनी अधिक है कि आप कभी भी सीधी रेखा में नहीं चल सकते। नौकरशाही, बेतुके नियम, और वे सहकर्मी जो एक्सेल शीट से ज्यादा कार्यालय की राजनीति में माहिर हैं—ये सब उस धरातल के गड्ढे हैं। आप सोचते हैं कि आप समाज सुधार रहे हैं, लेकिन आप केवल ‘वासेरस्टीन दूरी’ (Wasserstein distance) को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। यह दूरी आपके घर और आपके ऑफिस के बीच की वह अनंत खाई है जिसे आप हर रोज एक टूटी हुई बस या जाम में फँसी कार में तय करते हैं। यह स्थिति ठीक वैसी है जैसे किसी पाँच सितारा होटल में ₹1500 के ‘छोले भटूरे’ खाना। स्वाद वही सड़क के ठेले वाला है, लेकिन आप उस ‘एम्बिएंस’ और झूमर के नीचे बैठने के नाम पर जो अतिरिक्त पैसा देते हैं, वह उस सिस्टम की वक्रता को बनाए रखने का टैक्स है। आप हर दिन अपनी ऊर्जा का वह हिस्सा टैक्स में देते हैं जिससे आप वास्तव में जी सकते थे।

विडंबना देखिए, लोग आजकल अपनी कलाई पर यह आधुनिक स्वास्थ्य मॉनिटर बाँधकर घूमते हैं, जो उन्हें लगातार याद दिलाता रहता है कि उनका दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है और उनकी नींद कितनी खराब थी। यह यंत्र आपको यह नहीं बताता कि आप जीवित हैं, बल्कि यह आपकी मृत्यु की सांख्यिकीय संभावनाओं को रिकॉर्ड करता है। ₹80,000 का यह खिलौना केवल यह बताने के लिए है कि आप उस कॉर्पोरेट मशीन के कितने कुशल पुर्जे हैं और आप कब खराब होने वाले हैं। इस तकनीक की चमक और आपके जीवन के अंधेरे के बीच का अंतर ही इस आधुनिक युग की सबसे बड़ी विसंगति है। यह कोई प्रगति नहीं है, यह केवल अपनी ही बर्बादी को हाई-डेफिनिशन में देखने का एक महँगा तरीका है।

एन्ट्रॉपी का बोझ: सड़न की महक

ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम कहता है कि अराजकता (Entropy) हमेशा बढ़ेगी। एक संगठन इस नियम के खिलाफ लड़ने की एक हताश और नाकाम कोशिश है। हर मीटिंग, हर ‘रिप्लाई ऑल’ ईमेल, और वे अंतहीन ज़ूम कॉल्स जिनमें आप अपनी आत्मा का थोड़ा सा हिस्सा बेचते हैं, वास्तव में उस सड़न को छिपाने के तरीके हैं जो धीरे-धीरे पूरे सिस्टम को खा रही है। जिसे आप ‘पब्लिक सर्विस’ या ‘मैनेजमेंट’ कहते हैं, वह वास्तव में एक ऐसी मशीन है जो बिजली से नहीं, बल्कि इंसानी हताशा और व्यर्थ के कागजी कार्रवाई से चलती है। आप एन्ट्रापी कम करने की कोशिश में बाहर और भी अधिक गर्मी (Chaos) पैदा कर रहे हैं।

मानवीय भावनाओं को अगर हम न्यूरोसाइंस की रूखी भाषा में कहें तो ये केवल ‘रिएक्टिव बग्स’ हैं। जब कोई कर्मचारी कहता है कि वह ‘प्रेरित’ महसूस कर रहा है, तो वास्तव में उसके मस्तिष्क में डोपामाइन का एक अस्थाई और भ्रामक स्पाइक आया है, जो उसे इस निरर्थक सांख्यिकीय मॉडल में कुछ और घंटों तक बिना शिकायत किए काम करने के लिए मजबूर करता है। यह बिल्कुल आपके स्मार्टफोन की बैटरी जैसा है। शुरुआत में 100% दिखती है, लेकिन ‘लिथियम डिग्रेडेशन’ की तरह, हर गुजरते साल के साथ आपकी क्षमता कम होती जाती है। आप उसे चार्जर पर लगा सकते हैं, आप ‘वीकेंड गेटअवे’ पर जा सकते हैं, लेकिन अंततः वह बैटरी फूलकर फट जाएगी या चुपचाप मर जाएगी।

हम सब एक ऐसे तंत्र का हिस्सा हैं जो अपनी ही जटिलता के नीचे दबकर मर रहा है। हम केवल डेटा के बिंदु हैं, जो एक ऐसे वक्र (Curve) पर चल रहे हैं जहाँ अंत में केवल शून्य है। और सबसे दुखद बात यह है कि हम इस शून्य को ‘सफलता’ कहते हैं। घर जाने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि वहां भी केवल एक दूसरा ‘डेटा सेट’ आपका इंतजार कर रहा है जिसे ‘परिवार’ नामक लेबल दिया गया है, और वहां भी वक्रता उतनी ही जानलेवा है।

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