सांख्यिकीय शोर

श्रम, जिसे समाज ने ‘करियर’ का चमकदार आवरण पहना दिया है, वह असल में ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का एक क्रूर मजाक है। मैं यहाँ बार के अंधेरे कोने में बैठा हूँ, मेरी व्हिस्की में बर्फ का टुकड़ा पिघलकर अपना अस्तित्व खो रहा है—ठीक वैसे ही जैसे आप, मैं, और वे तमाम ‘ह्यूमन रिसोर्सेज’ अपनी जवानी को कॉर्पोरेट की भट्टियों में झोंक रहे हैं। यह राष्ट्र निर्माण का कोई महान यज्ञ नहीं है; यह महज़ एन्ट्रापी (Entropy) का बढ़ना है। हम सब धीरे-धीरे, लेकिन निश्चित रूप से, एक सांख्यिकीय शून्यता की ओर बढ़ रहे हैं।

भ्रम

मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा, सबसे पवित्र झूठ यह है कि ‘हुनर’ (Skill) आपको बचा लेगा। बकवास। जिसे आप ‘लर्निंग कर्व’ कहते हैं, वह सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की भाषा में एक ‘सांख्यिकीय भ्रम’ मात्र है। आप अपने दिमाग के न्यूरॉन्स को जलाकर कंपनी के ‘आदर्श सांचे’ में फिट होने की कोशिश करते हैं। यह प्रक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे सड़क किनारे के उस ठेले वाले का समोसा। उसे माइक्रोवेव में डालिए, वह बाहर से इतना गर्म हो जाएगा कि आपकी उंगलियाँ जल जाएँ, लेकिन अंदर? अंदर वही बासी, ठंडा, और बेस्वाद आलू का मसाला भरा होता है, जिसकी उम्र शायद आपकी नौकरी से भी ज्यादा है。

कॉर्पोरेट ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट का यही सच है—ऊपर से ‘सर्टिफाइड’ होने की क्षणिक गर्मी, और भीतर वही ठंडी, मरी हुई आत्मा जो यह भी नहीं जानती कि वह किसलिए जी रही है। यह ‘केएल डाइवर्जेंस’ (KL Divergence) को कम करने का गणितीय प्रयास नहीं है; यह बस आपकी भूख और आपकी खाली थाली के बीच की दूरी को पाटने की एक भद्दी, अपमानजनक जद्दोजहद है। आप सीखते हैं, रटते हैं, और अंततः एक ऐसी मशीन के पुर्जे बन जाते हैं जिसे बदला जाना तय है。

वक्रता

अब बात करते हैं वक्रता (Curvature) की। लीनियर अलजेब्रा की बातें छोड़िए, असली वक्रता वह है जो आपकी रीढ़ की हड्डी में स्थाई रूप से घर कर चुकी है। जिस सस्ती ऑफिस कुर्सी पर बैठकर आप दिन के बारह घंटे बिताते हैं, वह किसी मध्ययुगीन यातना गृह के उपकरण से कम नहीं है। वह चरमराहट, वह सस्ता प्लास्टिक जो आपकी जांघों में चुभता है, और वह पीठ का दर्द जो अब आपकी पहचान बन चुका है—यह है आपके जीवन की असली ज्यामिति। मैंने सुना है कि सिलिकॉन वैली के देवता हर्मन मिलर एर्गोनोमिक चेयर पर बैठते हैं, जो रीढ़ को ‘प्राकृतिक सहारा’ देती है। क्या विडंबना है! जिस सिस्टम ने पहले फाइलों और असंभव डेडलाइन के बोझ से हमारी कमर तोड़ दी, वही अब उसे सीधा रखने के लिए हमारी किडनी बेचने की कीमत मांग रहा है। मूर्खता की पराकाष्ठा है。

करियर की प्रगति किसी ‘रीमानियन मैनिफोल्ड’ पर खींची गई सीधी रेखा नहीं है। यह तो दिल्ली के किसी व्यस्त फ्लाइओवर पर, मई की 45 डिग्री वाली जानलेवा धूप में, एक पंक्चर टायर वाले रिक्शे को खींचने जैसा है। आपके फेफड़े पीएम 2.5 और कार्बन मोनोऑक्साइड से भर रहे हैं, पसीना आँखों में जा रहा है, और पीछे बैठा सवारी—आपका बॉस—एसी कार के सपने देख रहा है और झल्ला रहा है कि आप तेज क्यों नहीं चलते। यहाँ गुरुत्वाकर्षण का नियम नहीं, बल्कि शोषण का नियम चलता है। आप एक ऐसे ब्लैक होल के ‘इवेंट होराइजन’ पर खड़े हैं जहाँ आप जितनी भी ऊर्जा लगा लें, वह सब मकान मालिक की जेब और बिजली बिल के रूप में शून्य में विलीन हो जानी है。

बाज़ार

अंततः, यह पूरा विश्व एक विशाल कसाईखाना है जिसे ‘बाज़ार’ का नाम दिया गया है। हम यहाँ अपनी मांस-मज्जा और समय तौलने के लिए कतार में खड़े हैं। जिसे आप ‘प्रतिभा’ या ‘कौशल’ कहते हैं, वह विशाल डेटा सेट के समुद्र में एक मामूली सा ‘सांख्यिकीय शोर’ (Statistical Noise) है। आप ‘गौसियन डिस्ट्रीब्यूशन’ (Gaussian Distribution) के किस हिस्से में गिरते हैं, यह आपकी तथाकथित मेहनत से नहीं, बल्कि एक अंधाधुंध संयोग (Stochastic Process) से तय होता है। अधिकतर लोग तो बस ‘औसत’ (Mean) के दलदल में धंसकर दम तोड़ देते हैं, इस उम्मीद में कि कल शायद कोई चमत्कार होगा। चमत्कार नहीं होते, सिर्फ टार्गेट रिवाइज होते हैं。

आपकी मेज पर रखा वह सपना, वह महंगा मोंब्लैंक पेन, जिसे खरीदने की औकात आप शायद रिटायरमेंट तक न बना पाएं—अगर वह मिल भी जाए तो क्या बदल जाएगा? उससे आप कोई क्रांति नहीं लिखेंगे। आप उस शाही कलम से भी वही घिसी-पिटी, रीढ़विहीन ‘माफीनामा’ या ‘लीव एप्लीकेशन’ ही लिखेंगे। स्याही बदल जाएगी, लेकिन गुलामी की भाषा वही रहेगी। हमारा दिमाग एक खराब बैटरी वाला सस्ता स्मार्टफोन बन चुका है। सुबह की कॉफी के बाद शायद 80% चार्ज हो, लेकिन लंच के बाद की मीटिंग्स तक हम ‘पावर सेविंग मोड’ में रेंगने लगते हैं। स्क्रीन धुंधली हो जाती है, प्रोसेसिंग धीमी हो जाती है, लेकिन हम बंद नहीं हो सकते। क्योंकि ईएमआई का चार्जर हमारी गर्दन में लगा हुआ है。

वेटर बिल लेकर खड़ा है। कागज का यह छोटा सा टुकड़ा मेरे पूरे दिन की कमाई को एक झटके में निगल जाएगा। यह लेन-देन, यह शिष्टाचार, सब एक छलावा है। जेब हल्की हो गई है, नशा उतरने लगा है, और बाहर की दुनिया अपनी क्रूरता के साथ बाहें फैलाए इंतज़ार कर रही है。

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