सामूहिक प्रहसन

जब भी मैं किसी सरकारी दफ्तर की उस कतार को देखता हूँ जहाँ लोग अपने ‘अधिकार’ के लिए एक-दूसरे की पसलियों में कोहनियां मारकर ‘लोकतंत्र’ का जश्न मना रहे होते हैं, तो मुझे अरस्तू या प्लेटो की याद नहीं आती। मुझे याद आती है ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के एक सड़े हुए मांस के टुकड़े की। जिसे हम ‘सार्वजनिक हित’ कहते हैं, वह वास्तव में एक उच्च-आयामी सांख्यिकीय बहुविध (High-dimensional Statistical Manifold) पर रेंगते हुए उन कीड़ों का समूह है, जो यह भी नहीं जानते कि उनका अगला कदम किसी ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) की बलि चढ़ने वाला है।

कार्यालय की उन अंतहीन बैठकों का दृश्य याद करें, जहाँ हवा में केवल पसीने की गंध और मुफ्त की ठंडी चाय का स्वाद होता है। वहां ‘सहमति’ का मतलब संवाद नहीं, बल्कि एक-दूसरे की ‘सूचना वक्रता’ (Curvature) को कुचलकर बराबर करना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली की तपती दोपहर में एक बस की सीट के लिए दो मोटे आदमी लड़ रहे हों—दोनों को लगता है कि वे सही हैं, लेकिन अंत में जीत केवल उस घर्षण (Entropy) की होती है जो उनकी कमीजों को गीला कर देता है।

सामूहिक प्रहसन और पेट की आग

नौकरी करना, कर (Tax) भरना, और फिर समाज सुधार की बातें करना—यह सब एक ऐसा प्रपंच है जिसे हम अपनी ईएमआई (EMI) चुकाने के बीच में मनोरंजन के लिए पालते हैं। जब कोई राजनेता ‘जनता की आवाज’ कहता है, तो वह वास्तव में डेटा के शोर (Noise) को एक ऐसे सांचे में ढाल रहा होता है जिससे उसका अपना बैंक बैलेंस सुरक्षित रहे। यह सहानुभूति (Empathy) कुछ और नहीं, बल्कि मस्तिष्क का एक सस्ता सुरक्षा तंत्र है। यह सुनिश्चित करता है कि जब आप सड़क पर किसी को मरते हुए देखें, तो आपका अपना ‘ब्लड प्रेशर’ न बढ़ जाए। यह एक खराब एल्गोरिथ्म है जो केवल ‘सर्वाइवल’ के लिए बनाया गया है।

सोचिए, उस समिति के बारे में जो शहर के कचरे के प्रबंधन पर चर्चा करने के लिए पाँच सितारा होटल में मिलती है। वहां होने वाला हर निर्णय उस महंगे बुफे के खाने जैसा है—दिखने में भव्य, लेकिन पचाने में भारी और अंततः केवल गंदगी पैदा करने वाला। जितना बड़ा विजन, उतना ही बड़ा झूठ। हम ‘संसाधन आवंटन’ की बात करते हैं, लेकिन असल में हम केवल अपनी-अपनी थालियों में सबसे बड़ा चिकन का टुकड़ा खींचने की कोशिश कर रहे होते हैं। यह ‘पब्लिक वेलफेयर’ नहीं, बल्कि सामूहिक भूख का एक सुसंस्कृत प्रदर्शन है।

सूचना का वक्र और खाली जेब

अब उस ज्यामिति की बात करें जिसे समझने का दावा केवल वे लोग करते हैं जिनके पास सोचने के लिए बहुत सारा फालतू समय है। प्रत्येक मानवीय राय सूचना-स्थान में एक बिंदु है। इनके बीच की दूरी को ‘कोहनी की टक्कर’ से मापा जाना चाहिए, न कि किसी गणितीय सूत्र से। जब समाज ‘ध्रुवीकृत’ होता है, तो इसका मतलब है कि हमारे विश्वासों के बीच की खाई इतनी गहरी हो गई है कि वहां अब केवल गालियां और पत्थर ही पहुंच सकते हैं। सहमति बनाना कोई कला नहीं है; यह तो केवल एक दूसरे के दिमाग की ‘एन्ट्रॉपी’ को कम करने का एक यांत्रिक और उबाऊ प्रयास है।

हम ‘कॉमन ग्राउंड’ की तलाश में ऐसे भटकते हैं जैसे कोई आदमी महीने के आखिरी हफ्ते में अपनी फटी हुई जेब में चिल्लर ढूंढ रहा हो। यह तलाश कभी खत्म नहीं होती क्योंकि ‘सत्य’ जैसा कुछ है ही नहीं—केवल ‘कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler Divergence) है, जो हमें यह बताता है कि हम एक-दूसरे से कितने अलग और कितने अकेले हैं। एक आलीशान एर्गोनोमिक चेयर पर बैठकर, जिसकी कीमत एक क्लर्क के साल भर के वेतन से अधिक है, न्याय की बातें करना कितना सुखद है। वह कुर्सी आपकी रीढ़ की हड्डी को तो सीधा रख सकती है, लेकिन उस खोखलेपन का क्या जो आपके हर तर्क के पीछे छिपा है? आप वहां बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर करते हैं, जबकि बाहर की दुनिया उस वक्रता में फंसी हुई है जहाँ ‘न्याय’ केवल एक प्रिंटिंग मिस्टेक जैसा लगता है। क्या बकवास है।

एन्ट्रापी का नग्न नृत्य

तथाकथित ‘आदर्श समाज’ की कल्पना करना वैसा ही है जैसे किसी कसाई से शाकाहार पर प्रवचन सुनना। व्यवस्था (Order) केवल एक भ्रम है जिसे हम डर के कारण पालते हैं। असलियत तो केवल एन्ट्रापी (Entropy) है—वह अव्यवस्था जो हर क्षण बढ़ रही है। हम जितना अधिक ‘संगठित’ होने का प्रयास करते हैं, उतनी ही अधिक गर्मी और घृणा पैदा करते हैं। जिसे आप ‘संस्कृति’ कहते हैं, वह सूचना के प्रवाह में अटका हुआ एक पुराना कीचड़ है, जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है लेकिन हमें यह भ्रम देता है कि हम ‘जड़ों’ से जुड़े हैं।

सड़क के किनारे उस टूटी हुई साइकिल को घसीटते हुए आदमी को देखिए। उसे आपके ‘सूचना ज्यामिति’ या ‘बहुविध संरचना’ से कोई लेना-देना नहीं है। उसके लिए ‘कर्वेचर’ का मतलब केवल सड़क का वह गड्ढा है जो उसके टायर को फाड़ सकता है। हम अपनी जटिल शब्दावलियों के पीछे छिपकर केवल अपनी कायरता को ढकते हैं। ‘लोकनीति’ और ‘रणनीति’ जैसे शब्द केवल वे पर्दे हैं जिनके पीछे बैठकर हम अपनी छोटी-छोटी स्वार्थ सिद्धियों का जश्न मनाते हैं।

चाय अब पूरी तरह ठंडी और कड़वी हो चुकी है, बिल्कुल हमारे इन तर्कों की तरह। इस शोर से भरे बाज़ार में, जहाँ हर कोई ‘सत्य’ का नीलामीकर्ता बना बैठा है, सबसे बड़ी विलासिता केवल एक ही है—चुप रह जाना। लेकिन चुप्पी बेची नहीं जा सकती, उससे ‘कमीशन’ नहीं मिलता, इसलिए हम चिल्लाते रहेंगे। हम इस सूचना के ब्लैक होल में तब तक गिरते रहेंगे जब तक कि हमारी आवाज़ें खुद को ही सुनाई देना बंद न कर दें। क्या बकवास तमाशा है।

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