पिछले हफ्ते, जब हम और आप इस बार के धुएं में ‘संस्थागत दक्षता’ की लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे, तो याद है हमने क्या पाया था? केवल नौकरशाही के मलबे का ढेर। आज, उसी सड़ांध मारते मलबे के ऊपर खड़े होकर उस पाखंड का चीर-फाड़ करते हैं जिसे दुनिया ‘पब्लिक’ या ‘सार्वजनिकता’ कहती है। जब वातानुकूलित कमरों में बैठे सूट-बूट वाले ‘जनहित’ और ‘सामाजिक सहमति’ का राग अलापते हैं, तो मुझे वह किसी आलीशान रेस्तरां की मेज नहीं, बल्कि पुराने दिल्ली के किसी ढाबे की वह मेज याद आती है, जहाँ पिछली ग्राहक द्वारा छोड़ी गई दाल के दाग अभी भी सूखे नहीं हैं। हम जिसे ‘लोकतंत्र’ या ‘सामूहिक निर्णय’ कहते हैं, वह असल में सब्जी मंडी के बंद होने के वक्त सड़ी-गली सब्जियों के लिए होने वाली छीना-झपटी का एक औसत (average) मात्र है।
आप शायद सोचते होंगे कि मैं अतिशयोक्ति कर रहा हूँ। लेकिन ज़रा इस [बेतुकी कीमत वाली इटालियन लेदर कुर्सी](https://example.com/absurdly-priced-sofa) पर अपनी पीठ टिकाकर सोचिए। क्या इस कुर्सी का एर्गोनॉमिक्स आपके विचारों को पवित्र बना देता है? नहीं। ठीक वैसे ही, संसद या बोर्डरूम में जुटने वाली भीड़ का शोर ‘सत्य’ नहीं बन जाता। यह केवल अस्तित्व बचाने की एक भद्दी जद्दोजहद है, जिसे हमने ‘सभ्यता’ का रैपर चढ़ा दिया है।
गणित, पसीना और मेट्रो की धक्कमपेल
अब ज़रा उस बौद्धिक कचरे को साफ करते हैं जिसे लोग ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) कहकर पूजते हैं। विद्वान कहते हैं कि समाज ‘संभाव्यता वितरण’ (Probability Distributions) का एक मैनिफोल्ड है। सुनने में कितना अच्छा लगता है, है ना? लेकिन इसे ज़मीन पर उतारिए। यह ज्यामिति और कुछ नहीं, बल्कि खचाखच भरी मेट्रो में बगल वाले यात्री के पसीने और बदबू से बचने के लिए अपने शरीर को एक विशेष कोण पर मोड़ने की कला है। हम जिसे ‘सामाजिक मूल्य’ कहते हैं, वे गणितीय दृष्टि से केवल ‘फिशर इनफॉर्मेशन मेट्रिक’ के बिंदु हैं—यानी, वह दूरी जो आप एक शराबी से बनाए रखना चाहते हैं ताकि वह आपके जूतों पर उल्टी न कर दे।
जब दो लोग बहस करते हैं और कहते हैं कि वे ‘सहमति’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो वे असल में ‘कुल्बैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (KL Divergence) को कम करने का नाटक कर रहे होते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि यह किसी ऐसे ग्राहक के पीछे भागने जैसा है जो बिना बिल चुकाए भाग गया हो। आप कभी उस तक पहुँच नहीं सकते। मानवीय संवेदनाएं इस ठंडे गणित में केवल एक ‘बग’ हैं, एक त्रुटि हैं। जिसे हम ‘न्याय’ कहते हैं, वह डेटा का एक ऐसा संरेखण (alignment) है जो केवल तभी सुंदर लगता है जब आप उसे दूर से देखें। पास जाने पर, वह केवल शोर (noise) है।
दिमाग का दही हो गया है। वेटर! एक और व्हिस्की लाओ, बिना बर्फ की। यह सब बर्दाश्त करने के लिए नशा ज़रूरी है।
तर्क के भूत और टूटा हुआ एटीएम
आजकल हर कोई ‘स्वचालन’ और ‘एल्गोरिद्मिक शासन’ की बात कर रहा है। वे चाहते हैं कि एक ‘तर्क का भूत’ (Ghost of Logic) आए और हमारी समस्याओं को हल कर दे। वे इसे निष्पक्षता कहते हैं। मैं इसे एक टूटे हुए एटीएम के रूप में देखता हूँ जो आपका कार्ड निगल गया है और अब स्क्रीन पर केवल ‘एरर’ दिखा रहा है। आप उस मशीन से दया की भीख नहीं मांग सकते।
अगर हम वास्तव में एक पूर्णतः तार्किक ‘गणना तंत्र’ को सत्ता सौंप दें, तो वह सबसे पहले इस ‘लोकतंत्र’ नामक तमाशे को बंद कर देगा। सांख्यिकीय रूप से, एक अनपढ़ और भावुक भीड़ द्वारा लिया गया निर्णय हमेशा गलत होता है—यह सड़क पर पड़े कुत्ते की गंदगी से बचने की प्रायिकता जितना ही अनिश्चित है। एक शुद्ध मशीन देखेगी कि मानवाधिकार और स्वतंत्रता जैसी अवधारणाएं सिस्टम की दक्षता (entropy) को बढ़ा रही हैं, और वह उन्हें तुरंत डिलीट कर देगी।
प्रशासनिक ढांचों में इन मशीनी देवताओं को स्थापित करना ऐसा ही है, जैसे दीमकों द्वारा खोखले किए गए मकान के मुख्य दरवाजे पर एक अत्याधुनिक बायोमेट्रिक लॉक लगाना। घर की नींव गिर रही है, छत टपक रही है, लेकिन आप खुश हैं कि आपका ताला ‘स्मार्ट’ है। हम जिस ‘भविष्य’ की ओर बढ़ रहे हैं, वह समाधान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भागने का एक बहाना है। हम चाहते हैं कि मशीनें हमें बताएं कि किसे जीना है और किसे मरना है, ताकि हमें अपनी अंतरात्मा का बोझ न उठाना पड़े।
खैर, यह सब बातें दीवारों से बात करने जैसा है। यहाँ अंधेरे में, जहाँ हर कोई एक-दूसरे की जेब काटने की फिराक में है, कोई मेरी [चांदी की विंटेज फाउंटेन पेन](https://example.com/stealth-pen) पर नज़र गड़ाए बैठा है। यही समाज का असली चेहरा है—अवसरवाद और छीनने की कला। बाकी सब तो बस, आंकड़ों का मायाजाल है। बिल चुकाओ, मुझे यहाँ से निकलना है।
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