भ्रम का गुब्बारा और पसीने की बदबू
अगर कोई आपसे कहे कि ‘मेहनत ही सफलता की कुंजी है’ या ‘काम ही पूजा है’, तो समझ जाइए कि वह या तो आपको बेचना चाहता है या फिर आपकी मुफ्त की मजदूरी चाहता है। सच तो यह है कि जिसे समाज ‘करियर’ का नाम देकर महिमामंडित करता है, वह असल में जीवविज्ञान और भौतिकी का एक भद्दा मजाक है। अपनी सुबह की शुरुआत को ही देख लीजिए। अलार्म की उस कर्कश आवाज के साथ, आप अपनी नींद को अधुरा छोड़कर उठते हैं। यह ‘अनुशासन’ नहीं है, यह गुलामी की पहली किस्त है।
आप उस खचाखच भरी मेट्रो या बस में लटकते हुए दफ्तर जाते हैं, जहाँ किसी अजनबी की कोहनी आपकी पसलियों में चुभ रही होती है और हवा में सस्ते हेयर ऑयल और बासी पसीने की मिली-जुली गंध तैर रही होती है। क्या यह ‘मूल्य निर्माण’ (Value Creation) की प्रक्रिया है? बकवास। यह शुद्ध रूप से ऊष्मा का अपव्यय है। हम सब एक विशालकाय भट्ठी में जलने वाले कोयले के टुकड़े मात्र हैं। हमारा शरीर भोजन (इनपुट) को ग्रहण करता है और उसे एक्सेल शीट, बेमतलब की ईमेल्स और अंततः, वातावरण में गर्मी और हताशा (आउटपुट) में बदल देता है। महीने के अंत में जो सैलरी आपके खाते में आती है, वह कोई इनाम नहीं है; वह बस उस मशीन का ‘कूलेंट’ है जो आपको पूरी तरह पिघलने से रोकता है ताकि आप अगले महीने फिर से जल सकें। कितनी बेतुकी व्यवस्था है यह।
पेट की आग और कॉर्पोरेट ऊष्मागतिकी
एक आधुनिक कार्यालय (Office) को अगर हम ईमानदारी से देखें, तो वह एक ‘विघटनकारी संरचना’ (Dissipative Structure) के अलावा और कुछ नहीं है। इल्या प्रिगोगिन ने शायद नोबेल पुरस्कार जीता हो, लेकिन उन्हें असली थर्मोडायनामिक्स समझाने के लिए किसी भारतीय आईटी कंपनी के फ्लोर पर आना चाहिए था। यहाँ ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) का मतलब ब्रह्मांड की अव्यवस्था नहीं, बल्कि लंच के बाद होने वाली वह भयानक एसिडिटी है जो आपको यह याद दिलाती है कि आप इंसान नहीं, मशीन हैं।
संगठन खुद को जिंदा रखने के लिए लगातार आपकी ऊर्जा चूसते हैं। जिसे एचआर वाले ‘टीम वर्क’ कहते हैं, वह असल में अपनी नाकामी और आलस को दूसरों के सिर मढ़ने का एक सामूहिक प्रयास है। जब डेडलाइन सिर पर नाचती है, तो हम ‘सेल्फ-ऑर्गनाइजेशन’ (Self-organization) का नाटक करते हैं। हम इसे ‘इनोवेशन’ या ‘जुगाड़’ कहते हैं, लेकिन वास्तव में यह डर से पैदा हुई प्रतिक्रिया है। यह वैसा ही है जैसे एक डूबता हुआ आदमी हाथ-पैर मारता है। आप बॉस की घटिया जोक्स पर हंसते हैं, क्लाइंट के सामने झूठी मुस्कान चिपकाते हैं और उन रिपोर्ट्स को रंगीन बनाते हैं जिन्हें कोई नहीं पढ़ने वाला। यह सब सिस्टम को ढहने से बचाने की एक दयनीय कोशिश है।
सच कहूँ तो, यह सब देखकर मुझे उल्टी आती है। हम अपनी रीढ़ की हड्डी को कुर्सी के आकार में ढाल रहे हैं और अपनी आंखों की रोशनी को स्क्रीन की पिक्सेल्स के बदले गिरवी रख रहे हैं। और इसके बदले हमें क्या मिलता है? एक ‘एम्प्लॉई ऑफ द मंथ’ का सस्ता मग और ब्लड प्रेशर की गोलियां। मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती।
सन्नाटे का महंगा सौदा
इस शोरगुल और मानसिक प्रदूषण से बचने के लिए, इंसान किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है। जब दिमाग की नसें फटने लगती हैं, तो हम बाजार की शरण में जाते हैं। हमें लगता है कि कोई उत्पाद हमें बचा लेगा। मैंने देखा है कि कैसे समझदार लोग भी अपनी मेहनत की कमाई को आग लगा देते हैं, सिर्फ दो पल के सुकून के लिए। वे अपनी एक महीने की तनख्वाह या उससे भी ज्यादा, कानों को ढंकने वाले उस महंगे उपकरण पर खर्च कर देते हैं, जो दावा करता है कि वह दुनिया के शोर को मिटा देगा।
पचास हजार रुपये? सिर्फ इसलिए ताकि आप अपने बगल में बैठे सहकर्मी की चपड़-चपड़ या बॉस की चिल्लाहट को ‘म्यूट’ कर सकें? यह विडंबना देखिए—पहले आप उस शोर वाली जगह पर रहने के लिए पैसा कमाते हैं, और फिर उस शोर से बचने के लिए वही पैसा खर्च कर देते हैं। यह नॉइज़ कैंसलेशन (Noise Cancellation) नहीं है, यह आपकी आत्मा का कैंसलेशन है। आप एक महंगा प्लास्टिक का टुकड़ा अपने सिर पर चढ़ाकर खुद को यह तसल्ली देते हैं कि आप नियंत्रण में हैं, जबकि असल में आप बस अपनी इंद्रियों को सुन्न कर रहे हैं।
लेकिन जैसे ही आप उसे उतारेंगे, हकीकत का शोर दोगुनी ताकत से वापस आएगा। बैटरी खत्म हो जाएगी। सिस्टम ओवरहीट हो जाएगा। और आप? आप बस वही थके हुए, पुराने पुर्जे बने रहेंगे, जिसका रिप्लेसमेंट एचआर ने पहले ही ढूंढ लिया है। मैं थक गया हूँ। मुझे घर जाना है, अगर वह जगह अब भी बची है तो।
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