ज़रा अपनी उन थकी हुई आँखों से उस तमाशे को देखिए जिसे आप ‘करियर’ कहते हैं। वह सुबह की मीटिंग, जहाँ पसीने की गंध और सस्ते डियोडरेंट का मिश्रण एक घुटन भरी हवा बनाता है। आप वहाँ बैठे हैं, और आपका वह ‘बॉस’ जिसका चेहरा किसी बासी समोसे जैसा सूजा हुआ है, ‘विजन’ की बातें कर रहा है। आप सोचते हैं कि आप एक साम्राज्य की ईंटें रख रहे हैं, लेकिन भौतिक विज्ञान की क्रूर सच्चाई यह है कि आप बस एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) हैं—एक ऐसा नाला जो ऊर्जा को कचरे में बदलने के लिए बनाया गया है। इल्या प्रिगोजिन ने जब इस सिद्धांत को गढ़ा था, तो उन्हें अंदाज़ा नहीं होगा कि उनके पवित्र समीकरणों का इस्तेमाल आप जैसे लोग अपनी बेवकूफी को छिपाने के लिए करेंगे। एक संगठन का अस्तित्व ही इस बात पर टिका है कि वह बाहर से कितनी ऊर्जा (यानी पैसा और आपके जीवन के कीमती घंटे) निगल सकता है ताकि अपनी आंतरिक सड़न को थामे रख सके।
शून्य: व्यवस्था का ढोंग
क्या आपको वाकई लगता है कि आपके ‘मैनेजमेंट’ से कुछ सुधर रहा है? बकवास। ब्रह्मांड का हर कण बिखरने के लिए बेताब है, और आपकी यह कंपनी उस बिखराव को केवल एक महँगे नाम देने की कोशिश कर रही है। जब आप एक स्टार्टअप शुरू करते हैं, तो आप केवल एक ‘जुआ’ नहीं खेल रहे होते, आप प्रकृति के दूसरे नियम (Second Law of Thermodynamics) के मुँह पर थप्पड़ मारने की कोशिश कर रहे होते हैं। लेकिन अंत में जीत प्रकृति की ही होती है। आप जितना अधिक ‘ऑर्गनाइज़’ होने का नाटक करेंगे, उतना ही अधिक ‘एंट्रोपी’ यानी अराजकता पैदा होगी।
यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी भीड़भाड़ वाली लोकल बस में अपनी जगह बनाने की कोशिश करना। आप अपनी जगह तो बना लेते हैं, लेकिन उस प्रक्रिया में आपने दस और लोगों को कोहनी मारी होती है और खुद के कपड़े पसीने से तर-बतर कर लिए होते हैं। आपके ऑफिस का ‘एचआर डिपार्टमेंट’ भी बिल्कुल वैसा ही है—अंदर से खोखला, लेकिन बाहर से ऐसा व्यवहार करता है जैसे वह शांति का दूत हो। असल में वे केवल सिस्टम की गर्मी को बाहर निकालने के लिए बने ‘एग्जॉस्ट फैन’ हैं, जो खुद भी धूल से अटे पड़े हैं।
ऊष्मागतिकी: बर्बादी का गणित
अब ज़रा इस गणितीय विडंबना को समझिए: σ = ∑ Ji Xi ≥ 0। यह समीकरण चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि आप जितना अधिक ‘प्रोडक्टिव’ होने का दावा करेंगे, आप ब्रह्मांड में उतनी ही अधिक गंदगी फैलाएंगे। जब कोई कंपनी बड़ी होती है, तो उसके भीतर ‘सूचना का प्रवाह’ (Information Geometry) किसी पुराने ज़ंग लगे पाइप जैसा हो जाता है। एक ईमेल को दस लोग सीसी (CC) किए जाते हैं, फिर उस पर तीन मीटिंग्स होती हैं, और अंत में नतीजा वही निकलता है जो एक अनपढ़ आदमी भी बता देता। इस फालतू के संचार में जो ऊर्जा खर्च होती है, वही ‘एंट्रोपी प्रोडक्शन’ है।
आपकी वह ‘कॉर्पोरेट वैल्यूज़’ वाली दीवार? वह सिर्फ एक पर्दा है जो आपके दिमाग की शून्यता को ढँकता है। लोग इस शून्यता से इतने डरे हुए हैं कि वे दिन भर अपने कीबोर्ड पर उँगलियाँ घिसते रहते हैं ताकि उन्हें लगे कि वे ‘जीवित’ हैं। और इस डर को भुनाने के लिए बाज़ार बैठा है। आपकी पीठ में जो दर्द है, वह उस बोझ का है जिसे आप ढो रहे हैं, लेकिन आपको बेचा जाएगा एक बेतुका मँहगा स्टेटस सिंबल, जिसकी कीमत ₹1,50,000 है। लोग इसे खरीदेंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि एक मँहगी गद्दी उनके टूटे हुए अस्तित्व को जोड़ सकती है। क्या आप सचमुच सोचते हैं कि एक कुर्सी आपके उस मानसिक दिवालियेपन को ठीक कर देगी जो हर महीने की 30 तारीख को सैलरी के इंतज़ार में झलकता है? कितना हास्यास्पद है यह।
विनाश: अंत ही सत्य है
विकास एक ऐसा नशा है जिसकी कोई वापसी नहीं। एक बार जब संगठन का आकार बढ़ता है, तो वह ‘अपरिवर्तनीय’ (Irreversible) हो जाता है। वह एक ऐसा राक्षस बन जाता है जिसे हर दिन और भी अधिक संसाधनों की बलि चाहिए। इसे आप ‘स्केल’ कहते हैं, मैं इसे ‘धीमी मौत’ कहता हूँ। यह रेलवे की उस वेटिंग लिस्ट की तरह है जो कभी खत्म नहीं होती, बस लंबी होती जाती है और अंत में ट्रेन ही छूट जाती है।
जितना बड़ा नाम, उतनी ही बड़ी बर्बादी। आप बस ऊर्जा का रूपांतरण कर रहे हैं—अपने अनमोल समय को ऐसी चीज़ों में बदल रहे हैं जिनका दुनिया को कोई फायदा नहीं। यह सब सिर्फ इसलिए ताकि आप उस ‘थर्मल डेथ’ को कुछ पल के लिए टाल सकें जहाँ न कोई टारगेट होगा, न कोई इंक्रीमेंट। अजीब पागलपन है। मेरा सिर दर्द कर रहा है, और यह चाय भी ठंडी हो गई है।
संगठन कोई मशीन नहीं है जो कुछ ‘बनाती’ है, यह एक दरार है जिससे होकर ब्रह्मांड की व्यवस्था नष्ट हो रही है। आप जितनी तेज़ी से भागेंगे, उतनी ही जल्दी थकेंगे। भौतिकी को आपकी ‘टीम बॉन्डिंग’ से कोई लेना-देना नहीं है। अंत में केवल धूल बचेगी। कोई बॉस नहीं, कोई क्लाइंट नहीं, और वह मँहगी कुर्सी भी कबाड़ के भाव बिकेगी। शून्य ही एकमात्र गंतव्य है। बाकी सब बस शोर है।
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