श्रम की थकान और कॉरपोरेट मीटिंगों का वह अंतहीन सिलसिला, जहाँ चाय हमेशा ठंडी हो जाती है और शब्दों के अर्थ दम तोड़ देते हैं। पिछली बार जब हम पदानुक्रम और व्यवस्था की निरर्थकता पर हँस रहे थे, तो एक बात स्पष्ट थी: मनुष्य काम नहीं करता, वह केवल व्यस्त होने का एक भद्दा नाटक करता है। लेकिन इस नाटक के पीछे एक गहरा, सड़ा हुआ गणितीय ढांचा है जिसे हम ‘सार्वजनिकता’ (Publicness) कहते हैं।
निर्णय का कीचड़
अक्सर दफ्तर की उन खिड़की-बंद कमरों में, जब दस लोग किसी एक बिंदु पर ‘सहमति’ बनाने की कोशिश करते हैं, तो मुझे वह किसी व्यस्त भारतीय चौराहे पर फंसे एक खटारा ऑटो-रिक्शा और एक जिद्दी गाय के बीच के गतिरोध जैसा लगता है। हम इसे ‘लोकतांत्रिक संवाद’ का नाम देते हैं, लेकिन तकनीकी रूप से यह ‘निर्णय मैनिफोल्ड’ (Decision Manifold) पर एक बेहद ऊबड़-खाबड़ यात्रा है। यह जो हम ‘सर्वसम्मति’ का राग अलापते हैं, वह कुछ और नहीं बल्कि सांख्यिकीय वितरणों (Statistical Distributions) के बीच की एक गंदी खींचतान है। कल्पना कीजिए कि लंच के लिए ‘छोले-भटूरे’ और ‘उबले हुए सलाद’ के बीच चुनाव होना है। यह केवल स्वाद का संघर्ष नहीं है; यह सूचना के घनत्व का संघर्ष है जहाँ हर व्यक्ति का अहंकार एक अलग दिशा में गुरुत्वाकर्षण पैदा कर रहा है। सार्वजनिकता का अर्थ यह नहीं है कि सब खुश रहें, बल्कि यह है कि सूचना का प्रवाह इस तरह कुचला जाए कि व्यक्तिगत मतभेदों का शोर, उस एयर कंडीशनर की भनभनाहट में दब जाए।
जलेबी जैसी वक्रता
यहाँ तथाकथित ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) का प्रवेश होता है। मान लीजिए कि हर व्यक्ति का विचार एक बिंदु है। इन बिंदुओं के बीच की दूरी को हम भावनाओं से नहीं, बल्कि ‘फिशर सूचना मैट्रिक्स’ (Fisher Information Matrix) से मापते हैं। गणित कहता है कि सहमति एक ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) होनी चाहिए—यानी दो बिंदुओं के बीच का सबसे छोटा और सीधा रास्ता। लेकिन इंसानी फितरत ज्यामिति की दुश्मन है; वह सीधे रास्ते के बजाय उस जलेबी की तरह घूमना पसंद करती है जो नुक्कड़ वाले हलवाई के यहाँ पुरानी कढ़ाई में तली जा रही है। अगर सहमति तार्किक होती, तो वह बॉस अपने महंगे पेलिकन फाउंटेन पेन को हवा में नचाते हुए, तीन घंटे तक उसी घिसी-पिटी बात को क्यों दोहराता? वह अनजाने में रीमानियन मैनिफोल्ड (Riemannian Manifold) को मोड़ रहा है, ताकि उसकी बौद्धिक शून्यता उस वक्रता (Curvature) में छिप सके। हम जिसे ‘विजन’ कहते हैं, वह असल में स्पेस-टाइम का वह विरूपण है जो किसी की अक्षमता को ढकने के लिए पैदा किया गया है।
एन्ट्रापी का सिंहासन
अनुकूलन (Optimization) का यह पूरा नाटक केवल ऊर्जा बचाने का एक पाखंड है। ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम अटल है: ब्रह्मांड में अव्यवस्था और कचरा बढ़ेगा। हमारी बैठकें, हमारी नीतियां, हमारे कानून—ये सब उस बढ़ती हुई एन्ट्रापी (Entropy) को रोकने की कोशिश में, एक टूटी हुई बाल्टी से समुद्र उलीचने जैसा है। हम फिशर सूचना को अधिकतम करने की कोशिश करते हैं ताकि अनिश्चितता कम हो सके, लेकिन अंततः हम केवल ‘सफेद शोर’ (White Noise) पैदा करते हैं। आज का कॉर्पोरेट मजदूर लाखों रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सियों पर बैठकर अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने का संघर्ष कर रहा है, जबकि उसकी आत्मा का ढांचा बहुत पहले ही ढह चुका है। उस गद्देदार सीट पर बैठकर, एन्ट्रापी के सागर में डूबते हुए, हम खुद को यह समझाते हैं कि हम ‘उत्पादक’ हैं। यह कुर्सी, यह पेन, यह मीटिंग—सब उस भव्य शून्यता को सजाने के खिलौने हैं।
सहमति की वक्रता जितनी अधिक होगी, समाज उतना ही अधिक तनावपूर्ण होगा। एक आदर्श व्यवस्था वह है जहाँ सूचना का वितरण इतना सपाट हो कि किसी को मुँह खोलने की जरूरत ही न पड़े—एक श्मशान जैसी शांति। लेकिन हमें शोर पसंद है। हमें अपनी बैटरियों को उस स्मार्टफोन की तरह खत्म करना पसंद है जो दिन भर फालतू के नोटिफिकेशन दिखाने में अपनी जान दे देता है। अगली बार जब आप किसी ‘पब्लिक डिस्कशन’ में सिर हिला रहे हों, तो याद रखिएगा कि आप कोई महान कार्य नहीं कर रहे। आप बस एक बहुआयामी स्थान (Multi-dimensional space) में एक सांख्यिकीय त्रुटि (Statistical Error) मात्र हैं, जो अपनी तुच्छ पहचान को गणितीय स्थिरता देने की कोशिश कर रहा है। यह सब एक प्रपंच है। मुझे अब घर जाना है।
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