एन्ट्रॉपी का तमाशा

इन वातानुकूलित कांच के पिंजरों में बैठकर जब तुम लोग ‘सस्टेनेबिलिटी’ (Sustainability) और ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ पर ज्ञान बांटते हो, तो मुझे हंसी नहीं, बल्कि उस ब्रह्मांडीय मजाक पर तरस आता है जिसे हम ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) कहते हैं। एक संगठन, चाहे वह कोई टेक जायंट हो या सड़क किनारे छोले-कुलचे का ठेला, वह मूल रूप से एक ‘ओपन सिस्टम’ है। इसका एकमात्र काम है बाहर से उच्च गुणवत्ता वाली ऊर्जा (निवेशकों का पैसा और तुम्हारी जवानी) को चूसना और बदले में निम्न गुणवत्ता वाला कचरा—जिसे हम ‘मीटिंग्स’ और ‘ब्यूरोक्रेसी’ कहते हैं—बाहर उगलना।

जिसे तुम ‘प्रबंधन’ कहते हो, वह असल में ब्रह्मांड की अनिवार्य मृत्यु—एन्ट्रॉपी (Entropy)—के खिलाफ एक हताश और बचकानी लड़ाई है। और सच कहूँ? तुम हार रहे हो। बुरी तरह।

व्यवस्था: मखमली कफन

जब तुम्हारा एच.आर. (HR) विभाग मुस्कुराते हुए कहता है कि कंपनी अब ‘संतुलन’ (Equilibrium) की स्थिति में है, तो समझ लेना कि शवदाह गृह की बुकिंग का समय हो गया है। भौतिकी में साम्यावस्था या इक्विलिब्रियम का मतलब है—थर्मल डेथ। जब ऊर्जा का प्रवाह रुक जाता है, तो सिस्टम मर जाता है। एक आदर्श दफ्तर, जहाँ प्रक्रियाएं मक्खन की तरह चल रही हों और जहाँ कोई घर्षण न हो, वह असल में एक मुर्दाघर है।

इंसानी जज्बात, जिसे तुम ‘वफादारी’ का नाम देते हो, वे केवल सिस्टम के बग्स (Bugs) हैं जो तुम्हें यह भ्रम देने के लिए कोड किए गए हैं कि तुम्हारा काम मायने रखता है। तुम असल में उस हरमन मिलर की एर्गोनोमिक कुर्सी पर अपनी रीढ़ की हड्डी टिकाए हुए बस यह सुनिश्चित कर रहे हो कि तुम्हारा शरीर सिस्टम के खत्म होने से पहले ही जवाब न दे दे। तुम सोचते हो कि यह कुर्सी तुम्हारी सेहत के लिए है? गलतफहमी है। यह केवल इसलिए है ताकि तुम मशीन के एक पुर्जे के रूप में थोड़ी देर और चल सको। तुम एन्ट्रॉपी को रोक नहीं रहे हो, बस उसे अपनी डिस्क और उस कुर्सी के मेश के बीच छिपा रहे हो।

उफ्फ, क्या बकवास है। एक और पेग मंगवाओ, यह सब सोचना भी सिरदर्द है।

अराजकता: जुगाड़ ही विज्ञान है

तुम्हारे बोर्डरूम में जो ‘ब्रेनस्टॉर्मिंग’ होती है, वह इन्नोवेशन नहीं, बल्कि सामूहिक समय की बर्बादी है। इल्या प्रिगोगिन (Ilya Prigogine) ने बहुत पहले ही साबित कर दिया था कि जटिल प्रणालियाँ केवल ‘नॉन-इक्विलिब्रियम’ यानी घोर असंतुलन की स्थिति में ही खुद को पुनर्गठित करती हैं। इसे ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ कहते हैं। इन्नोवेशन तब नहीं होता जब तुम प्लान करते हो; यह तब होता है जब सिस्टम में इतनी अधिक ऊर्जा और अराजकता भर जाती है कि वह फटने की कगार पर होता है।

इसे ‘जुगाड़’ कहते हैं। जब दिल्ली का कोई ऑटोवाला ट्रैफिक जाम (Chaos) के बीच से अपनी तिपहिया निकालकर ले जाता है, तो वह एक नई संरचना का निर्माण कर रहा होता है। वह किसी एस.ओ.पी. (SOP) का पालन नहीं करता। इसके विपरीत, तुम लोग मोंटब्लैंक के फाउंटेन पेन से उन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हो जो केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि कल भी आज जैसा ही उबाऊ हो। वह पेन तुम्हारी सत्ता का प्रतीक नहीं है, वह तुम्हारी नपुंसकता का सबूत है कि तुम अराजकता को गले लगाने से डरते हो। असली इन्नोवेशन गंदे, शोरगुल वाले और पसीने से तर-बतर माहौल में होता है, वातानुकूलित कमरों में नहीं।

शून्य: शांति का महंगा भ्रम

अंततः, हर संगठन उस ‘स्टेडी स्टेट’ (Steady State) की तलाश में है जहाँ न्यूनतम ऊर्जा खर्च हो। यह ‘एफिशिएंसी’ का नशा है। लेकिन याद रखना, एक प्रणाली जितनी अधिक कुशल (Efficient) होती है, वह झटकों के प्रति उतनी ही नाजुक (Fragile) हो जाती है। जब तुम सिस्टम से सारा ‘स्लैक’ या ढीलापन निकाल देते हो, तो तुम उसे एक कांच की गुड़िया बना देते हो।

तुम दफ्तर के शोर को काटने के लिए सोनी के नॉइज़-कैंसलिंग हेडफ़ोन पहनते हो, यह सोचकर कि तुम अपनी उत्पादकता बढ़ा रहे हो। तुम बेवकूफ हो। वह शोर, वह बकवास, वह कैंटीन की गॉसिप—वही तो वह ‘रैंडम फ्लक्चुएशन’ है जो सिस्टम को जिंदा रखता है। तुमने शांति तो खरीद ली, लेकिन उसकी कीमत है तुम्हारी रचनात्मक मृत्यु। तुम खुद को बाहरी दुनिया से काटकर एक बंद सिस्टम (Closed System) बना रहे हो, और ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम कहता है कि बंद सिस्टम में एन्ट्रॉपी हमेशा अधिकतम स्तर तक बढ़ती है। मतलब? मतलब तुम अंदर ही अंदर सड़ रहे हो।

घर जाओ। तुम्हारी एक्सेल शीट और तुम्हारा यह फर्जी अनुशासन ब्रह्मांड की नजर में धूल के बराबर भी नहीं है। सब माया है, और वह भी बहुत सस्ती वाली।

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