ज्यामितीय प्रहसन

सांख्यिकीय कचरा

समाज जिसे ‘जनमत’ या ‘लोकतांत्रिक सहमति’ का पवित्र नाम देता है, वह वास्तव में सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के एक वक्र पर रेंगता हुआ सांख्यिकीय कचरा है। जब आप किसी सरकारी दफ्तर की टूटी हुई कुर्सी पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं, या किसी कॉर्पोरेट मीटिंग में पावरपॉइंट की नीरसता को झेलते हैं, तो आप किसी ‘सामूहिक बुद्धि’ का निर्माण नहीं कर रहे होते। आप केवल संभाव्यता वितरण (Probability Distribution) के एक ‘मैनिफोल्ड’ (Manifold) पर होने वाले घर्षण का हिस्सा बन रहे हैं। यह वक्रता (Curvature) किसी गणितीय सुंदरता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक दुर्गंध का नक्शा है जो बासी विचारों के सड़ने से पैदा होती है।

जिसे हम ‘सहमति’ कहते हैं, वह न्यूरोलॉजिकल स्तर पर केवल ‘फ्री एनर्जी’ (Free Energy) को कम करने का एक भद्दा और हताश प्रयास है। यह वैसा ही है जैसे दिल्ली की भीषण गर्मी में, राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर एक खचाखच भरी ट्रेन के अंदर पसीने से तर-बतर होकर खड़े होना और यह उम्मीद करना कि धक्का-मुक्की से आपको थोड़ी ‘सम्मानजनक’ जगह मिल जाएगी। वह जगह मिलती नहीं है, बस पसलियों पर पड़ने वाले दबाव का केंद्र बदल जाता है। जिसे आप ‘विचारधारा’ कहते हैं, वह उस भीड़ में कोहनी मारने की ज्यामितीय रणनीति से अधिक कुछ नहीं है।

दफ्तर का श्मशान और ठंडी चाय

ज़रा उस मीटिंग रूम की कल्पना करें जहाँ तथाकथित ‘भविष्य’ तय किया जाता है। एसी की पुरानी मशीन से आती हुई वह थकाऊ, निरंतर घरघराहट, टेबल पर पड़े हुए बिस्किट के चूरे जो चीटियों को निमंत्रण दे रहे हैं, और ठंडी हो चुकी चाय की सतह पर जमी हुई मलाई की वह घिनौनी, झुर्रीदार परत। यहाँ कोई ‘निर्णय’ नहीं लिया जा रहा। यहाँ केवल एन्ट्रापी (Entropy) के खिलाफ एक हताश और असफल लड़ाई लड़ी जा रही है।

जब आपका बॉस अपना मुंह खोलता है और ‘सिनर्जी’ या ‘पैराडाइम शिफ्ट’ जैसे शब्द हवा में फेंकता है, तो वह वास्तव में कोई जानकारी नहीं दे रहा होता। वह केवल फिशर इंफॉर्मेशन मैट्रिक (Fisher Information Metric) के तहत एक ‘डिस्टेंस’ (Distance) पैदा कर रहा होता है—कड़वी सच्चाई और मीठी बकवास के बीच की दूरी। हर सिर का हिलना, हर “यस सर”, उस सांख्यिकीय मैनिफोल्ड पर एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक की एक दर्दनाक यात्रा है। हम सोचते हैं कि हम तार्किक हैं, लेकिन हम केवल गॉसियन वितरण (Gaussian Distribution) के गुलाम हैं। हमारी ‘सहमति’ उस बिंदु पर होती है जहां सभी की सोच का विचलन (Variance) शून्य हो जाता है। और याद रखिए, शून्य विचलन का मतलब है—दिमागी मौत।

चमड़े की जिल्द में कैद झूठ

इस बौद्धिक रेगिस्तान के बीच, सबसे बड़ा और भद्दा मजाक वह उपकरण है जिसे हम इस शून्य को रिकॉर्ड करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लोग अपनी मेज पर झुककर, गंभीर चेहरा बनाकर, उन शब्दों को नोट करते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं है, जिनका अगले दिन की सुबह से पहले ही दम घुट जाएगा। और वे इसे कहाँ लिखते हैं?

वे इसे एक 30,000 रुपये के चमड़े के नोटबुक पर उतारते हैं। किसी मरे हुए जानवर की खाल को इतना महँगा और चमकदार बना दिया गया है ताकि आप उस पर अपने संगठन की सामूहिक मूर्खता को अमर कर सकें। यह पूंजीवाद का सबसे क्रूर व्यंग्य है—विचारों की दरिद्रता को छिपाने के लिए स्टेशनरी की रईसी। वह महँगा कागज, वह शाही जिल्द, सब कुछ चीख-चीख कर कह रहा है कि इसके अंदर लिखे जाने वाले शब्द कितने खोखले हैं। उस चमड़े के कब्रिस्तान की कीमत उस मीटिंग में मौजूद सभी लोगों की संयुक्त बुद्धिमत्ता से कहीं अधिक है। आप स्याही से नहीं, बल्कि अपने ही समय की राख से लिख रहे हैं।

शून्य का सन्नाटा

अंततः, ‘आम सहमति’ (Consensus) एक ऐसी अवस्था है जहाँ सिस्टम की सारी ऊर्जा खत्म हो चुकी होती है। यह थर्मोडायनामिक्स के ‘हीट डेथ’ (Heat Death) का सामाजिक संस्करण है। जब सब एक ही बात पर सहमत हो जाते हैं, तो सूचना का प्रवाह रुक जाता है। कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस (Kullback-Leibler Divergence) शून्य हो जाता है, जिसका सीधा अर्थ है कि दो दिमागों के बीच अब कोई अंतर नहीं बचा—यानी एक दिमाग अब अनावश्यक है।

हम जिसे ‘शांति’ या ‘सद्भाव’ कहते हैं, वह गणितीय रूप से एक ‘फ्लैट मैनिफोल्ड’ है। कोई उभार नहीं, कोई गहराई नहीं, कोई घर्षण नहीं। बस एक सपाट, अंतहीन बंजर मैदान जहाँ किसी भी नए विचार के अंकुरित होने की कोई गुंजाइश नहीं है। अगली बार जब आप तालियां बजाएं कि एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हो गया, तो याद रखिएगा कि आप किसी उपलब्धि का जश्न नहीं मना रहे। आप केवल इस बात का जश्न मना रहे हैं कि आप सबने मिलकर अपनी व्यक्तिगत चेतना की हत्या कर दी है और अब आप सब एक ही सांख्यिकीय औसत (Statistical Average) में बदल चुके हैं। भीड़ का हिस्सा होना इंसान होना नहीं है। यह केवल डेटा सेट का एक नगण्य बिंदु होना है। और डेटा को दर्द महसूस नहीं होता।

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