श्रम की ज्यामिति

सोमवार की सुबह, मेट्रो के उस दमघोंटू डिब्बे में खड़े होकर कभी अपने आसपास की गंध पर गौर किया है? वह पसीने, सस्ते हेयर जेल और दबी हुई हताशा की एक विशेष कॉकटेल है। आप लोग इसे ‘सप्ताह की शुरुआत’ कहते हैं, मैं इसे एन्ट्रापी (Entropy) के बढ़ने का एक और दुखद प्रमाण कहता हूँ। हम सब एक बंद थर्मोडायनामिक सिस्टम में फंसे कण हैं, जो बेवजह इधर-उधर टकरा रहे हैं, और इस टकराव को ही आप ‘कैरियर’ का नाम दे देते हैं। अजीब विडंबना है।

बाज़ार का सांख्यिकीय भ्रम

सच्चाई यह है कि श्रम का बाज़ार कोई ‘अवसरों का सागर’ नहीं है, बल्कि फिलीपींस की किसी पिछली गली में चल रहे सट्टेबाज़ी के अड्डे जैसा है। यहाँ नियम गणित के हैं, भावनाओं के नहीं। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के दृष्टिकोण से देखें, तो आपका पूरा पेशेवर जीवन केवल एक सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) पर एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक खिसकने की जद्दोजहद है।

आप अपनी सीवी (CV) में ‘पायथन’ या ‘डेटा एनालिटिक्स’ जैसे शब्द जोड़कर सोचते हैं कि आपने अपना स्तर बढ़ा लिया। क्या बचकाना ख्याल है। आपने केवल ‘फिशर इन्फॉर्मेशन मेट्रिक’ (Fisher Information Metric) पर अपनी स्थिति बदली है। एक स्किल से दूसरी स्किल तक की दूरी कोई सीधी रेखा नहीं है; यह एक टेढ़ी-मेढ़ी, ऊर्जा सोखने वाली पगडंडी है। सड़क किनारे मिलने वाले ‘छोले-कुलचे’ को अगर आप चांदी की थाली में परोस दें, तो वह ‘गॉरमेट’ नहीं हो जाता। ठीक वैसे ही, आपके फैंसी जॉब टाइटल्स आपकी आत्मा के खोखलेपन को नहीं भर सकते। आप बस एक कॉरपोरेट मशीन के लिए अपना ‘वेरिएंस’ (Variance) कम करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि आप एक विश्वसनीय पुर्जे बन सकें।

सिर फट रहा है मेरा, यह बीयर गर्म क्यों है?

वक्रता का पिंजरा

कैरियर की सीढ़ी जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यह एक भ्रम है। असल में, स्किल का स्पेस मुड़ा हुआ होता है—इसमें ‘वक्रता’ (Curvature) होती है। जैसे-जैसे आप किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करते हैं, स्पेस-टाइम की तरह आपके विकल्पों की ज्यामिति मुड़ जाती है। आप एक ‘लोकल ऑप्टिमा’ (Local Optima) में फंस जाते हैं, जिसे कॉर्पोरेट भाषा में ‘स्थिरता’ कहा जाता है, लेकिन भौतिकी की भाषा में यह ‘ब्लैक होल’ है।

और इस गुरुत्वाकर्षण के दबाव को झेलने के लिए आप क्या करते हैं? आप खुद को छोटी-छोटी विलासिताओं से बहलाते हैं। आप एक शानदार होम ऑफिस बनाते हैं। आप बाज़ार की सबसे महँगी, जालीदार एर्गोनोमिक कुर्सी खरीदते हैं। दो-ढाई लाख रुपये एक कुर्सी के लिए? वाह। यह कोई सिंहासन नहीं है, यह आधुनिक युग का एक आरामदायक पिंजरा है। आप उस पर बैठकर अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने की कोशिश करते हैं, जबकि आपका बॉस आपकी आत्मसम्मान की रीढ़ को हर रोज़ तोड़ रहा होता है। यह वैसा ही है जैसे किसी डूबते हुए जहाज़ पर अपनी केबिन को सोने से सजाना। एर्गोनॉमिक्स आपके शरीर को बचा सकता है, लेकिन उस गणितीय अपरिहार्यता को नहीं बदल सकता कि आप केवल एक संसाधन हैं जिसका मूल्यह्रास (Depreciation) निश्चित है।

शून्य और शोर

इंसानी जज़्बात—वफादारी, जुनून, ‘कंपनी कल्चर’—ये सब सिस्टम के शोर (Noise) हैं। जब आपका दिमाग यह स्वीकार नहीं कर पाता कि वह एक निरर्थक सांख्यिकीय वितरण का हिस्सा है, तो वह ‘जुनून’ नामक एक हार्मोनल नशा पैदा करता है। यह एक जैविक रक्षा तंत्र है, एक बग (Bug) है जिसे हमने फीचर समझ लिया है।

हम सब सूचना के एक विशाल महासागर में तैर रहे हैं, जहाँ हमारी हर हरकत, हर ईमेल, हर ‘नेटवर्किंग’ वाली झूठी मुस्कान अंततः ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम के सामने घुटने टेक देगी। आप कितना भी हाथ-पैर मार लें, अंत में सब कुछ औसत की ओर लौट आता है। ‘मीन रिवर्जन’ (Mean Reversion) ही एकमात्र सत्य है। आपकी सारी उपलब्धियाँ, वह महँगी कुर्सी, वह अपडेटेड लिंक्डइन प्रोफाइल—सब कुछ ब्रह्मांडीय पैमाने पर केवल एक सांख्यिकीय त्रुटि है जिसे समय अपने आप सुधार लेगा।

क्या बकवास ज़िन्दगी है। बिल ले आओ।

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