पिछली बार जब मैंने ‘कुशलता’ (Efficiency) का ज़िक्र किया था, तो मेरा मतलब उस खोखले शब्द से नहीं था जिसे तुम अपनी सीवी में चिपकाते फिरते हो। असल में, जिसे तुम ‘सफल बिज़नेस’ कहते हो, वह और कुछ नहीं बल्कि ब्रह्मांड की अनिवार्य तबाही के खिलाफ एक छोटी सी, ज़िद्दी और बेहद महंगी बगावत है। कॉर्पोरेट जगत के ये सूट-बूट पहने ‘विज़नरी’ लोग जब एयर-कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर ‘स्थिरता’ (Stability) की रट लगाते हैं, तो मुझे हंसी आती है। उन्हें अंदाज़ा ही नहीं है कि थर्मोडायनामिक्स के नज़रिए से वे एक ऐसी जलती हुई चिता पर बैठे हैं जो उनके बैंक बैलेंस और मानसिक सुकून को धीरे-धीरे राख कर रही है। अगर तुम्हारा संगठन पूरी तरह शांत है, तो मुबारक हो, तुम एक लाश चला रहे हो।
अराजकता
किसी भी स्टार्टअप या पुरानी कंपनी के ऑफिस में घुसते ही जो शोर, तनाव और फालतू की भाग-दौड़ दिखती है, वह ‘काम’ की आवाज़ नहीं है। वह ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) की चीख है। इल्या प्रिगोजिन (Ilya Prigogine) ने जिसे ‘विघटनकारी संरचना’ (Dissipative Structure) कहा था, वह कोई महान दार्शनिक विचार नहीं है; वह बस उस फटे हुए बटुए की तरह है जिसे तुम भरने की कोशिश करते हो, लेकिन छेद इतना बड़ा है कि सिक्का गिरना तय है। संगठन को एक ‘ओपन सिस्टम’ कहना उसे इज़्ज़त देना है—सच तो यह है कि यह एक ऐसा नाला है जिसमें तुम अपनी ज़िंदगी का बेशकीमती समय और खून-पसीने की कमाई झोंक रहे हो ताकि वह बस ‘दिखने’ में थोड़ा साफ लगे।
इसे सड़क किनारे मिलने वाले उस ‘समोसे’ से समझो जिसका तेल हफ्तों से नहीं बदला गया। जब तक नीचे से गैस जल रही है (यानी जब तक तुम्हारे जैसे मजदूरों का शोषण हो रहा है और बाहरी निवेश की गर्मी मिल रही है), तब तक वह समोसा एक आकार में है। जैसे ही गैस खत्म हुई, वह समोसा एक ठंडा, बेस्वाद और धमनियों को ब्लॉक करने वाला कचरा बन जाता है। तुम्हारे बिज़नेस का ‘पैशन’ भी बस वही उबलता हुआ तेल है जो बार-बार इस्तेमाल होने से ज़हरीला हो चुका है। लोग जिसे ‘टीम स्पिरिट’ कहते हैं, वह असल में न्यूरॉन्स का एक ऐसा ‘सिंक्रोनाइज़्ड’ बग है, जो एक-दूसरे को न मारने का गुप्त समझौता है, ताकि शाम को घर जाकर उधार के पैसे से खरीदी गई शराब पी सकें। इस अराजकता को तुम जितने भी ‘मैनेजमेंट गुरुओं’ के शब्दों से सजा लो, हकीकत में यह बस एक भूख है जो कभी नहीं मिटती। पागलपन है।
ऊष्मा
व्यापार कोई सुचारू मशीन नहीं है; यह एक ऐसा पुराना लोहे का इंजन है जो चलने से ज़्यादा शोर करता है और काला धुँआ छोड़ता है। तुम जितना ज़्यादा डेटा, पैसा और ‘पॉलिसी’ इसके अंदर डालोगे, यह उतना ही ज़्यादा ‘वेस्ट हीट’ (Waste Heat) पैदा करेगा। ऑफिस की गॉसिप, फालतू की ईमेल्स जिन्हें कोई नहीं पढ़ता, और वो अंतहीन प्रेजेंटेशन्स जहाँ लोग बस घड़ी देखते हैं—ये सब उस कचरा ऊष्मा के रूप में हैं जो सिस्टम को ठंडा रखने के लिए बाहर निकालनी पड़ती है। अगर यह गर्मी बाहर नहीं निकली, तो पूरा सिस्टम पिघल जाएगा।
सबसे बड़ा मज़ाक तो यह है कि इस गर्मी और अव्यवस्था से बचने के लिए तुम क्या-क्या नहीं खरीदते। जब बुद्धि काम करना बंद कर देती है और ऑफिस की बदइंतज़ामी रीढ़ की हड्डी तोड़ने लगती है, तो तुम मोक्ष की तलाश में इस ₹1,45,000 की एर्गोनोमिक एम्बॉडी कुर्सी की शरण में जाते हो। तुम्हें लगता है कि इस मखमली और वैज्ञानिक गद्दी पर अपने शरीर को टिकाने से, तुम्हारी कंपनी की गिरती हुई किस्मत और तुम्हारा पोस्टर (Posture) दोनों सीधे हो जाएंगे। यह तुम्हारी वही पुरानी बीमारी है—सड़ांध को छुपाने के लिए रेशमी पर्दा खरीदना। जैसे कि वह कुर्सी थर्मोडायनामिक्स के उस अटल नियम को बदल देगी जो कहता है कि हर चीज़ अंततः बिखर जाएगी। यह सिर्फ बैठने की जगह नहीं है, यह तुम्हारी हार का एक बहुत महंगा स्मारक है। क्या तमाशा है।
अस्तित्व
एक प्रोफेसर के तौर पर जब मैं बार में बैठकर इन बिज़नेस टाइकून्स को ‘स्केलेबिलिटी’ और ‘सस्टेनेबिलिटी’ पर ज्ञान देते सुनता हूँ, तो मुझे अपने व्हिस्की के गिलास में मौजूद बर्फ के टुकड़ों पर तरस आता है। वे बर्फ के टुकड़े भी एक समय में संगठित होने का गुमान रखते थे, फिर उन्होंने बाहरी गर्मी सोखी और अब वे अपने अस्तित्व को खोकर पानी में मिल रहे हैं। तुम्हारा ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ भी उस बर्फ की तरह ही पिघल रहा है, बस तुम्हें उसका अहसास नहीं है क्योंकि तुम मीटिंग रूम के तापमान को नियंत्रित करने में व्यस्त हो।
सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के हिसाब से देखें तो, संगठन के भीतर का हर संवाद केवल एन्ट्रॉपी को कम करने की एक असफल कोशिश है। तुम जितनी ज़्यादा मीटिंग्स करते हो, उतनी ही ज़्यादा अनिश्चितता पैदा होती है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे कोई भी ‘सिलिकॉन-आधारित मूर्खता’ (जिसे तुम सॉफ्टवेयर कहते हो) या ‘फाइव-ईयर प्लान’ ठीक नहीं कर सकता। जो बिज़नेस आज ‘स्व-संगठित’ दिख रहा है, वह कल का बिखरा हुआ मलबा है। हम बस उस मलबे को थोड़ा सुंदर दिखाने के लिए महंगे ऑफिस और फैंसी पदवियों का सहारा लेते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे मुम्बई की लोकल ट्रेन में भीड़ इतनी बढ़ जाए कि आपको खड़े होने के लिए मेहनत न करनी पड़े; भीड़ का दबाव और पसीने का चिपचिपापन ही आपको सीधा खड़ा रखता है।
घर जाना है। तुम्हारी ये तथाकथित ‘प्रोफेशनल लाइफ’ उस फटे हुए टायर की तरह है जिसमें तुम हर रोज़ पंप से हवा भरते हो। टायर बदल नहीं सकते क्योंकि तुम्हारी औकात नहीं है, और हवा भरना छोड़ नहीं सकते क्योंकि फिर चल नहीं पाओगे। अंत में, सिर्फ वही बचता है जो पूरी तरह जलकर राख हो चुका हो। बाकी सब तो बस भौतिकी का एक क्रूर मज़ाक है जिसे हम ‘करियर’ कहते हैं。
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