सहमति का भ्रम

पिछली बार जब हम उस घटिया दफ्तर की डेस्क पर अपनी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी करने की मजबूरी पर चर्चा कर रहे थे, तो मैंने कहा था कि ‘मजदूरी’ दरअसल आत्मा का ई-कचरा है। लेकिन जरा ठहरिए और सोचिए, क्या होता है जब बहुत सारे ‘संसाधन’—यानी आप और हम—एक मेज के चारों ओर बैठते हैं? उसे दुनिया ‘सार्वजनिक सहमति’ (Public Consensus) का नाम देती है। सुनने में यह शब्द किसी मंदिर की घंटी जैसा पवित्र लगता है, जैसे लोकतंत्र का कोई महान उत्सव हो रहा हो। लेकिन हकीकत में? यह एक ऐसा कबाड़खाना है जहाँ व्यक्तिगत बुद्धि की बलि दी जाती है ताकि व्यवस्था का जंग लगा पहिया बिना चीख-पुकार के घूम सके।

शोर और पसीना

लोग कहते हैं कि सहमति एक ‘सामूहिक चेतना’ है। बकवास। यह केवल एक सूचनात्मक दबाव है, और कुछ नहीं। लोकतंत्र या किसी भी कॉर्पोरेट बोर्डरूम में ‘सहमति’ बनाना उतना ही वीभत्स और थकाऊ है जितना कि दिल्ली की जून वाली गर्मी में एक खचाखच भरे शेयरिंग ऑटो-रिक्शा में बैठना।

जरा उस दृश्य को याद कीजिए। आपके पास अपनी एक जगह (Identity) है, लेकिन बगल वाले यात्री का पसीना आपके शर्ट पर लग रहा है, किसी की कोहनी आपकी पसलियों में चुभ रही है, और ड्राइवर का हॉर्न आपके दिमाग की नसों को फाड़ रहा है। उस वक्त आप जो महसूस करते हैं, वह ‘भाईचारा’ नहीं है। वह एक हताश समझौता है। आप केवल इसलिए चुप हैं और उस भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं क्योंकि आप बस घर पहुँचना चाहते हैं। यह जो ‘जल्दी खत्म करो और निकलो’ की भावना है, यही सामाजिक अनुबंध (Social Contract) की असली, घिनौनी ऊर्जा है। हम एक-दूसरे से सहमत इसलिए नहीं होते कि हम एक-दूसरे को समझते हैं; हम सहमत होते हैं क्योंकि अलग राय रखने में जो ऊर्जा खर्च होती है, वह हमारे आलसी दिमाग को मंजूर नहीं।

वक्रता का पाखंड

अगर हम भावनाओं के कीचड़ से बाहर निकलकर विज्ञान की रूखी भाषा में बात करें, तो सहमति कोई आध्यात्मिक मिलन नहीं है। यह ‘इंफॉर्मेशन ज्योमेट्री’ (Information Geometry) का एक क्रूर खेल है। हम सभी एक विशाल ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) पर बिखरे हुए अलग-अलग बिंदु हैं।

जब समाज या कंपनी किसी मुद्दे पर ‘एक’ होने का ढोंग करती है, तो वह वास्तव में क्या कर रही होती है? वह हमारे व्यक्तिगत प्रायिकता वितरणों (Probability Distributions) के बीच की दूरी—जिसे गणित में ‘कुल्बैक-लीबलर डाइवर्जेंस’ कहते हैं—को जबरदस्ती कम कर रही होती है। यह एक हिंसक प्रक्रिया है। एक विविध समाज की स्वाभाविक वक्रता (Curvature) को पीट-पीट कर सीधा किया जाता है ताकि उस पर सत्ता का रोड-रोलर आसानी से चल सके।

इस पूरी प्रक्रिया को ‘ऑप्टिमाइज़’ करने के लिए हमारे पास बड़े-बड़े विशेषज्ञ और सलाहकार होते हैं। इन बैठकों में आप अक्सर देखेंगे कि वे लोग मेज पर एक बेहद भारी और महंगा, शायद पच्चीस हजार रुपये का [चमड़े का नोटबुक](https://example.com/luxury-leather-journal) रखकर बैठे हैं। उस बेजान जानवर की खाल की महक और पन्नों की मोटाई आपको यह भ्रम देने के लिए काफी है कि यहाँ कुछ महत्वपूर्ण लिखा जा रहा है। लेकिन असलियत क्या है? वह डायरी, जिसकी कीमत एक सामान्य परिवार के महीने भर के राशन से ज्यादा है, केवल झूठ को सुंदर अक्षरों में दफनाने के काम आती है। उस महंगे कागज पर स्याही से लिखे गए समझौते सत्य नहीं हैं; वे केवल एन्ट्रापी (Entropy) को सजाने का सामान हैं। यह विडंबना ही है कि जितनी महंगी स्टेशनरी, उतना ही सस्ता विचार।

शून्य

सहमति का असली चेहरा वह ‘शून्य’ है जहाँ तर्क का अंत होता है। हम जिस ‘विविधता’ का जश्न मनाते हैं, वह सिस्टम के लिए केवल ‘शोर’ (Noise) है। जब दस लोग एक कमरे में किसी बात पर राजी होते हैं, तो वे सत्य के करीब नहीं पहुँचते; वे बस उस कमरे की ‘थर्मल डेथ’ को स्वीकार कर लेते हैं। उनकी अपनी मौलिकता मर चुकी होती है, और जो बचता है वह है एक ठंडा, निर्जीव ‘कॉमन ग्राउंड’—जैसे ठंडी हो चुकी खिचड़ी जिसे कोई खाना नहीं चाहता, पर फेंकने की हिम्मत भी नहीं है।

मनुष्य का यह अहंकार कि वह ‘स्वतंत्र निर्णय’ लेता है, महज एक न्यूरोनल बग है। हम केवल डेटा पैकेट हैं जो एक ऐसी ज्यामिति में फंसे हैं जिसका नियंत्रण हमारे हाथ में कभी था ही नहीं। हम खुद को समझाते हैं कि हमने समझौता किया है, जबकि वास्तव में हमें एक एल्गोरिदम द्वारा ‘राउंड ऑफ’ कर दिया गया है। इस रूखे गणितीय समीकरण में आपकी व्यक्तिगत भावनाओं की हैसियत दशमलव के बाद वाले उस अंक से ज्यादा कुछ नहीं है, जिसे गणना आसान बनाने के लिए मिटा दिया जाता है。

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