ऊष्मा का कसाईखाना

सड़न का स्थगन

सुबह आँख खुलते ही मुँह में जो वह बासी, कसैला स्वाद होता है, उसे तुम ‘नई सुबह’ का आगाज़ कहते हो? भ्रम है तुम्हारा। वह स्वाद तुम्हारी अपनी जैविक घड़ी के जंग लगने का है। हम जिसे ‘करियर’ कहते हैं, वह असल में अपनी ही लाश को सड़ने से बचाने की एक हताश और थकाऊ कवायद के सिवा कुछ नहीं है। यह सब कुछ एक बासी कढ़ी को बार-बार गर्म करके पीने जैसा है—हर बार स्वाद थोड़ा और कसैला, थोड़ा और जानलेवा।

तुम अपनी टाई की गाँठ ठीक करते हो, यह सोचकर कि तुम दुनिया बदलने जा रहे हो, जबकि हकीकत यह है कि तुम बस ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के उस क्रूर नियम का ईंधन बनने जा रहे हो जो कहता है कि व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ऊर्जा की बलि देनी ही पड़ेगी। तुम्हारा दफ्तर कोई ‘वैल्यू क्रिएशन’ का मंदिर नहीं है; वह एक वातानुकूलित कसाईखाना है जहाँ तुम्हारे सपनों का कीमा बनाकर उसे ‘तिमाही नतीजों’ के रूप में परोसा जाता है।

सिंक में पड़े जूठे बर्तन

इल्या प्रिगोजिन ने जिसे ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) कहा था, उसे अगर हम अपनी दलाली की भाषा में समझें, तो वह सिंक में पड़े उन जूठे बर्तनों जैसा है जिन पर चिकनाई जम चुकी है। तुम चाहे कितना भी रगड़ लो, एंतरोपी (Entropy) की वह परत हटने वाली नहीं है। तुम्हारे संगठन, तुम्हारी कंपनियाँ, सब इसी सिद्धांत पर चल रही हैं—बाहर से ताज़ी ऊर्जा (नर्सरी से निकले नए इंटर्न्स) को निगलना और अंदर की गंदगी (तनाव, डिप्रेशन और रद्दी एक्सेल शीट्स) को बाहर उगलना।

वह जो कॉन्फ्रेंस रूम में ‘रणनीति’ पर चर्चा होती है, वह क्या है? वह गली के आवारा कुत्तों की भौंकने की प्रतियोगिता से ज्यादा कुछ नहीं है। एक कुत्ता भौंकता है, तो बाकी भी सुर में सुर मिलाने लगते हैं, बिना यह जाने कि खतरा क्या है। हम इसे ‘सिनर्जी’ कहते हैं। वाह, क्या मज़ाक है। तुम जिसे ‘इनोवेशन’ कहते हो, वह बस उस कचरे के ढेर को एक कोने से दूसरे कोने में सरकाना है ताकि बदबू कुछ देर के लिए कम हो जाए।

कितना घिनौना है यह सब।

सिलिकॉन का मृगतृष्णा

और अब, उस नए खिलौने की बात करते हैं—वह सिलिकॉन का बना ‘स्वचालित मुनीम’ जिसे तुम अपनी बुद्धि का विस्तार समझते हो। वह तुम्हारे बोझ को कम नहीं कर रहा; वह बस उस कसाईखाने की रफ़्तार बढ़ा रहा है। वह एक ऐसा मशीनी परजीवी है जो शून्य को प्रोसेस करता है और बदले में और गहरा शून्य उगलता है। हम इंसानों की फितरत है कि हम अपनी mediocrity (औसत दर्जे) को छिपाने के लिए मशीनों की शरण में जाते हैं।

यह ‘डेटा’, यह ‘एनालिटिक्स’, यह सब क्या है? यह बस डिजिटल धुआँ है। जैसे कोई शराबी अपनी लत को ‘सांस्कृतिक अनुभव’ का नाम दे दे, वैसे ही हम इस सूचना के कचरे को ‘ज्ञान’ कह रहे हैं। वह मशीन न तो थकती है, न उसे कब्ज की पीड़ा होती है, इसलिए वह तुम्हारे अस्तित्व की निरर्थकता को और भी नग्न कर देती है। तुम बस एक ऑपरेटर हो जो एक ऐसी मशीन के लीवर खींच रहा है जिसका कोई उत्पाद नहीं है।

रीढ़ की हड्डी का सौदा

जरा अपनी कमर पर ध्यान दो। वह चीख रही है। लाखों साल के विकासक्रम ने तुम्हें दो पैरों पर खड़ा होकर चलने के लिए बनाया था, और तुमने क्या किया? तुमने खुद को एक 90-डिग्री के कोण में कैद कर लिया। अब तुम अपनी इस जैविक भूल को सुधारने के लिए उस [महंगे एर्गोनोमिक सिंहासन](https://www.amazon.in/s?k=ergonomic+office+chair+high+end) की शरण में जाते हो। तुम्हें लगता है कि वह जालीदार नायलॉन और क्रोम का ढाँचा तुम्हारी रीढ़ को बचा लेगा? वह कुर्सी आराम का साधन नहीं है, वह तुम्हारी गुलामी का सबसे महंगा पट्टा है।

यह सब एक ‘बफर’ है। तुम उस कुर्सी पर बैठकर काम नहीं करते, तुम बस गुरुत्वाकर्षण के साथ एक हारा हुआ युद्ध लड़ते हो। हम अपनी कमाई का आधा हिस्सा उन गैजेट्स और [रीढ़ को सीधा रखने वाले पाखंडों](https://www.amazon.in/s?k=herman+miller+chair) पर खर्च कर देते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि हम अगले दिन फिर से उसी कुर्सी पर बैठकर अपनी जवानी को धीरे-धीरे पिघलते हुए देख सकें। यह ‘वैल्यू’ नहीं है, यह道 किनारे पड़ी उस सिगरेट की बट जैसा है जिसे कोई और पीकर फेंक चुका है, और तुम उसे उठाकर आखिरी कश लगाने की कोशिश कर रहे हो।

राख

अंत में, ब्रह्मांड का खाता हमेशा संतुलित रहता है। तुम अपनी फाइलें बंद करते हो, लैपटॉप का ढक्कन गिराते हो, और लिफ्ट की ओर बढ़ते हो। क्या बदला? कुछ नहीं। बस ब्रह्मांड की कुल एंतरोपी में थोड़ा सा इजाफा हुआ। तुम्हारी मेहनत, तुम्हारा पसीना, तुम्हारी वह ‘डेडलाइन’ की घबराहट—सब उस ऊष्मा में बदल गया जो अब अंतरिक्ष के अंधेरे में कहीं खो जाएगी।

तुम जीत नहीं सकते। तुम बस इस प्रक्रिया को देख सकते हो, जैसे कोई जलते हुए घर को सड़क के उस पार से देखता है। न पानी है, न बाल्टी। बस लपटें हैं।

コメント

コメントを残す

メールアドレスが公開されることはありません。 が付いている欄は必須項目です