अक्सर जब मैं विश्वविद्यालय के पास वाली उस पुरानी दुकान पर बैठकर अपनी चाय में तैरती हुई मलाई को देखता हूँ, तो मुझे आधुनिक कॉर्पोरेट जगत के ‘संतुलन’ की याद आती है। लोग कहते हैं कि संगठन एक ‘सांख्यिकीय मैनीफ़ोल्ड’ (Statistical Manifold) है—संभावनाओं का एक ऐसा ज्यामितीय ढाँचा जहाँ ‘लोकहित’ और ‘व्यापार’ के निर्देशांक मिलते हैं। यह अकादमिक जगत का सबसे भद्दा मजाक है। असल में, यह कोई गणितीय स्थान नहीं, बल्कि सड़े हुए मांस का एक टुकड़ा है जिसे ‘सार्वजनिक सेवा’ के नाम पर रेशमी चादर से ढका गया है।
जब कोई कंपनी अपनी ‘व्यापारिकता’ और ‘लोकहित’ के बीच संतुलन की बात करती है, तो वह वास्तव में उस जेबकतरे की तरह होती है जो आपकी जेब काटते समय आपको ‘धर्म’ और ‘त्याग’ का उपदेश देता है। यह तथाकथित संतुलन कोई समीकरण नहीं, बल्कि भूख और लालच का एक ऐसा तमाशा है जिसे हम ‘कॉर्पोरेट रणनीति’ का नाम देते हैं। क्या आपने कभी उस सड़क किनारे खड़े भिखारी को देखा है जो मंदिर के बाहर बैठकर ‘पुण्य’ बांटने वाले सेठ का इंतज़ार करता है? सेठ का ‘सार्वजनिक हित’ केवल उस सिक्के तक सीमित है, जो उसकी करोड़ों की चोरी के बदले में फेंका गया एक भद्दा मज़ाक है। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) का उपयोग यहाँ केवल इस पाखंड की वक्रता (Curvature) को मापने के लिए किया जाना चाहिए।
लालच का ज्यामितीय ढांचा
तथाकथित ‘लोकहित’ और ‘व्यापार’ के बीच का मेल एक ऐसे घटिया प्रेशर कुकर जैसा है जिसकी सीटी बजना बंद हो गई है। अंदर मुनाफ़े का दबाव इतना बढ़ चुका है कि वह कभी भी फट सकता है, लेकिन ऊपर से उस पर ‘सोशल रिस्पांसिबिलिटी’ का एक सस्ता पेंट लगा दिया गया है। हम जिसे ‘फिशर सूचना मैट्रिक्स’ (Fisher Information Metric) कहते हैं, वह वास्तव में यह मापने का यंत्र है कि एक सीईओ की कुर्सी की चमक और उसके कर्मचारियों के घर के सूखे राशन के बीच कितनी गहरी खाई है।
भौतिकी की भाषा में, यह एक ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) का खेल है। एक कंपनी जब कहती है कि वह पर्यावरण या समाज के लिए काम कर रही है, तो वह वास्तव में अपने सिस्टम की गर्मी (Heat) को बाहर फेंक रही होती है ताकि उसका बैंक बैलेंस सुरक्षित और ठंडा रहे। संगठन का हर ‘डेटा पॉइंट’ उस मजदूर के पसीने की गंध है जिसे वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘सांख्यिकीय विचलन’ (Statistical Outlier) मान लिया जाता है। जब तक जेब में पैसा नहीं आता, ये सारे मॉडल केवल कागजी नाव हैं जो गंदे नाले में तैर रही हैं।
विलासिता का पाखंड
सूचना ज्यामिति हमें बताती है कि दो सांख्यिकीय मॉडलों के बीच की दूरी को ‘कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (KL Divergence) से मापा जा सकता है। कॉर्पोरेट जगत में, यह दूरी उनके ‘विज्ञापित चेहरे’ और ‘असली चेहरे’ के बीच का अंतर है। आजकल के आधुनिक दफ्तरों में ‘समानता’ पर चर्चा करना वैसा ही है जैसे किसी नर्क के द्वार पर ‘ठंडी हवा’ का बोर्ड लगा देना। वे लोग जो ‘सतत विकास’ (Sustainability) की भारी-भरकम फाइलें तैयार करते हैं, उनके हाथों में अक्सर Visconti Medici जैसे बेहद महंगे उपकरण होते हैं, जिनकी कीमत में एक छोटे गांव का साल भर का पानी आ सकता है।
यह कलम केवल हस्ताक्षर नहीं करती, यह उस ‘लोकहित’ का गला घोंटती है जिसका ढोंग वह संगठन कर रहा होता है। जिस कागज पर वे गरीबी उन्मूलन के सिद्धांतों को घसीटते हैं, वह कागज और वह स्याही स्वयं उस शोषण का प्रमाण हैं जिसे वे छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। इस व्यवस्था में ‘एन्ट्रॉपी’ का अर्थ केवल इतना है कि कितनी जल्दी गरीब का पैसा अमीर के ऐशो-आराम में बदल जाता है। यह कोई वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक साधारण लूट है जिसे ग्राफ़ और चार्ट के पीछे छिपा दिया गया है। एक संगठन तब तक सार्वजनिक भलाई की बात करता है जब तक उसका ‘पेट’ नहीं भर जाता, और विडंबना यह है कि कॉर्पोरेट जगत का पेट एक ब्लैक होल की तरह है—जो कभी नहीं भरता।
सड़ांध की गणितीय सटीकता
हमें यह समझना होगा कि ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ केवल उस सड़े हुए खाने को सजाने की कोशिश है जिसे कोई और नहीं खाना चाहता। आप इसे ‘मार्केट इक्विलिब्रियम’ कहें या ‘पैरेटो ऑप्टिमैलिटी’, असलियत में यह केवल उस रोज की खुजली की तरह है जिसे आप तब तक खुजलाते हैं जब तक खून न निकल आए। एक संगठन केवल अपनी ‘बिजनेस सर्वाइवल’ के लिए समाज का इस्तेमाल करता है, ठीक वैसे ही जैसे एक परजीवी अपने मेजबान का खून पीता है। पूंजीवाद की यह ज्यामिति इतनी सीधी है कि इसे समझने के लिए किसी उच्च-स्तरीय शोध पत्र की नहीं, बल्कि उस खाली थाली की ज़रूरत है जिसे ‘इम्पैक्ट असेसमेंट’ के नाम पर मेज से हटा दिया गया है। यह पूरा मॉडल एक शानदार, चमकीला, लेकिन पूरी तरह से खोखला झूठ है।
コメントを残す