इस तथाकथित ‘सभ्य समाज’ की सबसे बड़ी और सबसे हास्यास्पद गलतफहमी यह है कि ‘काम’ का कोई वास्तविक उद्देश्य होता है। तुम लोग, जो हर सुबह अलार्म की चीख के साथ उठते हो और अपनी गर्दन को टाई के फंदे में कसकर लोकल ट्रेन के डिब्बों में भेड़-बकरियों की तरह ठुंसे चले जाते हो, क्या तुम्हें वाकई लगता है कि तुम ‘राष्ट्र निर्माण’ या ‘जीडीपी’ का हिस्सा हो? अपनी उन नींद से बोझिल आंखों से भावुकता का परदा हटाओ। तुम एक विशाल, अदृश्य इंजन से निकलने वाले काले धुएं, यानी ‘एक्ज़हॉस्ट गैस’ से ज्यादा कुछ नहीं हो। भौतिकी के निर्दयी नियमों के अनुसार, तुम्हारा पूरा पेशेवर जीवन ‘नॉन-इक्विलिब्रियम थर्मोडायनामिक्स’ (Non-equilibrium Thermodynamics) का एक भद्दा मजाक है। जिसे तुम ‘करियर’ कहते हो, वह ब्रह्मांडीय स्तर पर केवल ऊर्जा का एक अकुशल रूपांतरण है, जिसका अंतिम उत्पाद सिर्फ और सिर्फ ‘कचरा’ है।
तमाशा
जरा अपने उस वातानुकूलित कबूतरखाने (Cubicle) को वैज्ञानिक दृष्टि से देखो, जिसे तुम बड़े गर्व से अपना ‘ऑफिस’ कहते हो। यह स्थान कार्यकुशलता का मंदिर नहीं, बल्कि एन्ट्रापी (Entropy) का प्रजनन केंद्र है। बगल वाली सीट से आती पसीने की बदबू, टिफिन में लादी गई बासी सब्जी की महक और सस्ते रूम फ्रेशनर का वह जहरीला मिश्रण—यह सब मिलकर एक ऐसी ‘संवहन धारा’ (Convection Current) बनाते हैं जो तुम्हारी आत्मा को धीरे-धीरे गला रही है। वहां बैठा तुम्हारा बॉस, जो किसी ट्रैफिक जाम में फंसे हुए ऑटो-रिक्शा चालक की तरह बिना किसी कारण के चिल्ला रहा है, केवल सिस्टम में ‘घर्षण’ (Friction) पैदा कर रहा है।
इस अराजकता के बीच, तुम खुद को दिलासा देने के लिए बाज़ार के जाल में फंसते हो। अपनी रीढ़ की हड्डी को, जो इस अप्राकृतिक मुद्रा में बैठने के कारण धीरे-धीरे ‘S’ आकार में मुड़ रही है, बचाने के लिए तुम अपनी तीन महीने की मेहनत की कमाई इस Ergonomic Office Chair पर फूंक देते हो। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक डूबते हुए जहाज में अपनी सीट को मखमल से ढकना। तुम सोचते हो कि यह महंगा फर्नीचर तुम्हें ‘प्रोफेशनल’ बना देगा, लेकिन असल में तुम सिर्फ एक सड़े हुए फल को फैंसी रैपर में लपेट रहे हो। मीटिंग्स में होने वाली वह अंतहीन चर्चा, जिसे तुम ‘ब्रेनस्टॉर्मिंग’ कहते हो, वह ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम का साक्षात प्रमाण है—जहाँ अत्यधिक ऊर्जा लगाने के बावजूद, प्राप्त होने वाला कार्य (Work Done) शून्य होता है, और शेष सब कुछ व्यर्थ ऊष्मा (Heat) के रूप में वातावरण में फैल जाता है।
सड़न
संगठन जितना विशाल होता है, उसकी आंतरिक संरचना उतनी ही तेजी से सड़ने लगती है। इल्या प्रिगोजिन ने इसे ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ कहा था, लेकिन मैं इसे ‘बजबजाता हुआ नाला’ कहूंगा। सूचना जब ऊपर से नीचे की ओर बहती है, तो वह ‘इनफार्मेशन थ्योरी’ के तहत शोर (Noise) में बदल जाती है। निर्देश, जो कभी स्पष्ट थे, तुम्हारे तक पहुँचते-पहुंचते एक अस्तित्ववादी पहेली बन जाते हैं। यह प्रक्रिया अपरिवर्तनीय है। तुम एक पुरानी हो चुकी बैटरी की तरह हो, जिसे चाहे जितनी बार ‘स्किल डेवलपमेंट’ के चार्जर से जोड़ लो, उसकी क्षमता (Capacity) अब वापस नहीं आने वाली।
फिर भी, तुम इस भ्रम को बनाए रखने के लिए प्रतीकों का सहारा लेते हो। उस Montblanc Fountain Pen को देखो, जिसे तुम अपनी जेब में सजाए रखते हो। तुम इसका इस्तेमाल उन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए करते हो जिन्हें अगले ही साल रद्दी के भाव बेचा जाएगा। उस पेन से बहने वाली स्याही, तुम्हारे जीवन के उन कीमती क्षणों का तरल रूप है जो अब कभी नहीं लौटेंगे। यह एक ब्रह्मांडीय विडंबना है कि तुम समय देखने के लिए लाखों की घड़ी पहनते हो, जबकि असल में समय तुम्हारे हाथों से रेत की तरह फिसल रहा है और तुम केवल उस फिसलन को सजाने में व्यस्त हो।
शून्य
अंततः, यह सब कुछ एक ‘फेज ट्रांजिशन’ (Phase Transition) की ओर बढ़ रहा है। जिसे तुम ‘रिटायरमेंट’ या ‘सफलता’ कहते हो, वह भौतिकी की भाषा में ‘थर्मल डेथ’ (Heat Death) है। जब सिस्टम की एन्ट्रापी अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाएगी, तो सब कुछ एक समान, नीरस तापमान पर आ जाएगा—ठंडा और मृत। तुम्हारी वफादारी, तुम्हारी नैतिकता, और तुम्हारी वह झूठी मुस्कान—ये सब तुम्हारे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स में होने वाले रसायनों के छोटे-मोटे स्पार्क हैं, एक तरह का जैविक ‘बग’, जो तुम्हें इस चक्की में पिसते रहने के लिए मजबूर करता है। ब्रह्मांड को तुम्हारी बैलेंस शीट से कोई लेना-देना नहीं है। तुम कल फिर उठोगे, अपनी खराब होती पीठ को सीधा करने की कोशिश करोगे, और ब्रह्मांड को थोड़ा और अव्यवस्थित करने के लिए निकल पड़ोगे। यही तुम्हारी नियति है, और यही इस तमाशे का अंत।
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