ऊर्जा का कब्रिस्तान

बासी चाय और ब्रह्मांडीय ढ़लान

इस मेज पर पड़ी उस बासी चाय को देखिए जिसकी मलाई अब किसी नाले के ऊपर जमी हुई चिकनाई जैसी दिख रही है। आप इसे ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम कहते हैं? मैं इसे सिर्फ एक भव्य, ब्रह्मांडीय बर्बादी कहता हूँ। आपका पूरा करियर, आपकी ये बड़ी-बड़ी फाइलें, और ये सरकारी दफ्तर, सब उसी ठंडी होती चाय की तरह हैं। हम जिसे ‘विकास’ और ‘संगठन’ की संज्ञा देते हैं, वह वास्तव में सिर्फ अपने पेट की भूख मिटाने और जेब भरने के लिए इस ब्रह्मांड की गंदगी यानी ‘एन्ट्रॉपी’ को बढ़ाने का एक व्यवस्थित तरीका है। जिसे आप ‘काम’ कहते हैं, वह असल में अपनी अनिवार्य मृत्यु को कुछ घंटों के लिए टालने की एक घटिया और महंगी कोशिश है। हम सब एक ढलान पर खड़े हैं, और जिसे हम चढ़ाई समझ रहे हैं, वह दरअसल फिसलन है।

श्रम: हड्डियों का चूरा और ईएमआई का गणित

दफ्तरों में ‘टीम वर्क’ का जो ढोल पीटा जाता है, वह दरअसल उन लोगों की दबी हुई चीखें हैं जिन्हें अपनी मासिक किश्तें (EMI) चुकानी हैं। एक संगठन कोई सुचारू ‘प्रणाली’ नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा वातानुकूलित कसाईखाना है जहाँ आपकी जैविक ऊर्जा को खींचकर उसे बेजान कागजी रिपोर्टों में बदला जाता है। आप सुबह-सुबह अपनी टूटी हुई चप्पल, लोकल ट्रेन के धक्के और फटी हुई उम्मीदें लेकर दफ्तर जाते हैं, ताकि उस ‘अराजकता’ को रोक सकें जो आपके घर के खाली राशन के डिब्बों से शुरू होती है। यह कोई ‘नेगेंट्रॉपी’ (Negentropy) का चमत्कार नहीं है, यह सिर्फ भूखे पेट की मरोड़ है जिसे आप ‘प्रोफेशनलिज्म’ का नाम देते हैं। हम ग्लुकोज जलाते हैं ताकि एक्सेल की शीट सीधी रह सके, जबकि हमारी खुद की रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो रही होती है।

सोचिए, आप दिन भर उस नीली रोशनी वाली स्क्रीन के सामने अपनी आँखों और नसों का होम करते हैं ताकि किसी ऐसी कंपनी का शेयर भाव बढ़ सके जिसे आपके अस्पताल जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इस अंतहीन थकान और शारीरिक पतन को कम करने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। यह एक विडंबना ही है कि शरीर को गलाकर कमाए गए पैसे उसी शरीर को टूटने से बचाने में खर्च हो जाते हैं। कल ही मेरे एक सहकर्मी ने, जो अपनी पीठ के दर्द से किसी बूढ़े बैल की तरह कराह रहा था, हार मानकर वह Ergonomic Office Chair मंगवाई। कीमत सुनकर आधे दफ्तर को दिल का दौरा पड़ सकता है, लेकिन यह कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक मजबूरी है। जब आपका शरीर ही आपका साथ छोड़ने लगे, तो आप ऐसी महंगी लकड़ियों और जालीदार कपड़ों को अपनी इज्जत और कशेरुकाओं (Vertebrae) को बचाने के लिए खरीदते हैं। यह कुर्सी आरामदायक नहीं है, यह आपकी गुलामी का एक महंगा सिंहासन है, जिस पर बैठकर आप अपनी जवानी के नष्ट होने का तमाशा देखते हैं।

बिखराव: सरकारी गड्ढे और धूल का गुबार

अब जरा उन सड़कों और पुलों की ओर नजर घुमाइए जिन्हें आप ‘सार्वजनिक निर्माण’ कहते हैं। यहाँ भौतिकी का ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) अपने सबसे वीभत्स रूप में दिखाई देता है। यहाँ गड्ढा इसलिए नहीं खोदा जाता कि उसे भरा जाए, बल्कि इसलिए खोदा जाता है ताकि बजट की गर्मी को सिस्टम से बाहर निकाला जा सके। एक सड़क बनती है, फिर उसे पानी वाले खोदते हैं, फिर उसे फाइबर केबल वाले फाड़ते हैं। यह कोई कुप्रबंधन नहीं है, यह ऊर्जा के प्रवाह का शुद्धतम रूप है—जिसे आम भाषा में ‘लूट’ कहते हैं। सीमेंट में रेत ज्यादा है और नियत में खोट। ठेकेदार से लेकर इंजीनियर तक, सब उस बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं जहाँ पानी कम और कीचड़ ज्यादा है।

जब भी कोई नया टेंडर पास होता है, तो उसका मतलब यह नहीं होता कि जनता को सुविधा मिलेगी। उसका मतलब होता है कि ऊष्मा का स्थानांतरण शुरू हो गया है—टैक्सदाता की जेब से किसी नेता की तिजोरी तक। यह जो सड़कों पर धूल उड़ रही है, यह वही ‘एन्ट्रॉपी’ है जो आपके फेफड़ों में जमा हो रही है, आपको धीरे-धीरे मार रही है। आप जितना ज्यादा ‘निर्माण’ करेंगे, उतनी ही ज्यादा गंदगी और अव्यवस्था फैलेगी। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जहाँ ‘व्यवस्था’ बनाने के नाम पर सिर्फ और सिर्फ कूड़ा पैदा किया जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि उन फाइलों का क्या होता है जो बरसों से सरकारी अलमारियों में धूल फांक रही हैं? वे सिर्फ दीमकों का पेट भर रही हैं। संगठन का काम व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि उस दीमक की तरह धीरे-धीरे सब कुछ चाट जाना है।

शून्यता: राख का ढेर

अंत में, यह सब सिर्फ एक तमाशा है। आप जिसे ‘प्रबंधन’ या ‘मैनेजमेंट’ कहते हैं, वह दरअसल उस बदबू को छुपाने के लिए छिड़का गया सस्ता और तीखा परफ्यूम है जो इस सड़ते हुए सिस्टम से आ रही है। हम सब उस शराबी की तरह हैं जो नाली में पड़ा हुआ भी खुद को बादशाह समझता है क्योंकि उसने टाई पहन रखी है। सार्वजनिक क्षेत्र में कोई ‘लक्ष्य’ नहीं होता, वहाँ सिर्फ एक ‘स्थिरता’ होती है—वैसी ही स्थिरता जो कब्रिस्तान में पाई जाती है। सूचना, डेटा, रिपोर्ट्स—ये सब सिर्फ वो शोर हैं जो हमें यह भूलने में मदद करते हैं कि हम सब धीरे-धीरे एक बड़े शून्य की ओर बढ़ रहे हैं। हम अपनी अपनी महंगी, एर्गोनोमिक कुर्सियों पर टिके हैं, यह जानते हुए भी कि बैटरी खत्म होने वाली है, चार्जर खो चुका है, और बाहर अँधेरा गहराता जा रहा है। सब कुछ राख है।

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