तमाशा: सामूहिक मतिभ्रम का अनुष्ठान
जब कांच की दीवारों वाले वातानुकूलित कमरे में दस तथाकथित ‘विशेषज्ञ’ एकत्र होते हैं, तो वहां बुद्धि का योग नहीं, बल्कि विभाजन होता है। जिसे आप ‘टीम वर्क’ कहते हैं, वह वास्तव में जिम्मेदारी का एक ऐसा होम्योपैथिक डाइल्यूशन है, जिसमें अंततः किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना गणितीय रूप से असंभव हो जाता है। यह दृश्य मुझे अक्सर पुरानी दिल्ली के उस जाम की याद दिलाता है, जहाँ हर कोई हॉर्न बजा रहा है, लेकिन पहिया एक इंच भी नहीं खिसक रहा। यह ‘सिनर्जी’ नहीं है; यह सामूहिक समय-हत्या का एक सभ्य नाम है।
एक मेज पर रखे हुए ठंडे समोसे और उससे भी ठंडे तर्क—यही है आधुनिक प्रबंधन का सार। हम जिसे ‘सहमति’ (Consensus) कहते हैं, वह वास्तव में थकान का एक उप-उत्पाद है। लोग सहमत इसलिए नहीं होते कि विचार उत्तम है; वे सहमत इसलिए होते हैं क्योंकि वे घर जाना चाहते हैं और उस कमरे की ऑक्सीजन अब उनके फेफड़ों को रास नहीं आ रही है। यह बौद्धिक चर्चा नहीं, बल्कि जैविक अस्तित्व को बचाने की एक हताश कोशिश है।
ज्यामिति: मूर्खता का गणितीय मानचित्र
भावुकता को किनारे रखकर अगर हम इस अराजकता को ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के चश्मे से देखें, तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है। एक संगठन का विचार-क्षेत्र एक ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) की तरह होता है। हर कर्मचारी की राय इस वक्र सतह पर एक बिंदु मात्र है। आदर्श स्थिति में, निर्णय लेने की प्रक्रिया को दो बिंदुओं के बीच की सबसे छोटी दूरी—जिसे हम ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) कहते हैं—तय करनी चाहिए।
लेकिन समस्या यह है कि मानवीय अहंकार इस सतह की ‘वक्रता’ (Curvature) को इतना बढ़ा देता है कि सीधा रास्ता बचता ही नहीं। जब वित्त विभाग का प्रमुख अपनी गर्दन की नसें फुलाकर चिल्लाता है, तो वह तर्क नहीं दे रहा होता; वह मैनिफोल्ड में एक ‘ब्लैक होल’ बना रहा होता है, जहाँ तर्क का प्रकाश भी खिंचकर नष्ट हो जाता है। यहाँ ‘फिशर इंफॉर्मेशन मीट्रिक’ फेल हो जाता है क्योंकि शोर (Noise) और संकेत (Signal) के बीच का अंतर मिट चुका होता है। हम जिसे ‘लोकतांत्रिक निर्णय’ कहते हैं, वह वास्तव में उस व्यक्ति को चुप कराने की लागत है जिसकी आवाज़ सबसे ऊँची है और जिसके पास बजट का वीटो पावर है।
यंत्र: भावनाशून्य अनुकूलन
यहीं पर उस ‘अमानवीय तर्क’ (Cold Calculation Circuits) की आवश्यकता महसूस होती है जिसे लोग डर के मारे भविष्य का नाम देते हैं। वह सिलिकॉन-आधारित व्यवस्था, जिसे मैं नाम नहीं दूंगा, उसे आपकी भावनाओं, आपके ‘कल्चर’, या आपके कार्यालय की राजनीति से कोई सरोकार नहीं है। वह केवल ‘एन्ट्रॉपी’ को घटाना जानती है। जहाँ इंसान एक-दूसरे के चेहरे के भाव पढ़ने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ करते हैं, वहाँ यह स्वचालित तर्क केवल ‘कोस्ट फंक्शन’ (Cost Function) को न्यूनतम करने में व्यस्त रहता है।
यह क्रूर है? शायद। लेकिन क्या यह उस पाखंड से बेहतर नहीं है जहाँ हम घंटों ‘वैल्यू क्रिएशन’ पर बात करते हैं और परिणाम शून्य रहता है? यह यंत्रीकृत तर्क उस ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ को एक समतल चादर की तरह बिछा देता है। यह वक्रता को शून्य कर देता है। कोई ड्रामा नहीं, कोई बहस नहीं, बस शुद्ध, ठंडा निष्कर्ष। यह मानवीय संवेदनाओं का अपमान नहीं है; यह समय की बचत है।
उफ्फ, थकान हो रही है।
विडंबना देखिए, हम इस ‘शून्य वक्रता’ की बात उस कमरे में बैठकर कर रहे हैं जो विरोधाभासों से भरा है। आप जिस कमर को लाड़-प्यार करने वाले 2 लाख रुपये के सिंहासन पर बैठे हैं, वह एर्गोनॉमिक्स का चमत्कार हो सकता है, लेकिन क्या यह आपके तर्कों को सीधा कर सकता है? कदापि नहीं। यह कुर्सी आपके मेरुदंड को सहारा दे सकती है, लेकिन उस रीढ़ की हड्डी का क्या जो नैतिक निर्णय लेने के लिए चाहिए? हम इतनी महंगी वस्तुओं से घिरे हुए हैं—लेदर की डायरियां, शोर को काटने वाले हेडफ़ोन—सिर्फ इसलिए ताकि हम अपने भीतर के खालीपन को छिपा सकें। यह कुर्सी, यह मेज, यह पूरा तामझाम… सब कुछ सिर्फ इसलिए है ताकि हम उस कड़वे सच को भूल सकें कि हम वास्तव में कुछ भी नया नहीं कर रहे हैं। हम बस डेटा के एक विशाल समुद्र में तैरते हुए मलबे हैं, जो किनारे की तलाश में हैं। चाय कहाँ है?
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