इस सस्ती व्हिस्की में वो नशा नहीं है जो इन दिनों कॉरपोरेट बोर्डरूम्स में परोसा जा रहा है। वहाँ एक अलग ही तरह का नशा है—’सिनर्जी’ और ‘सहमति’ का नशा। बाहर से देखो तो लगता है कि सब कुछ एक सीधी रेखा में चल रहा है, जैसे कोई मिलिट्री परेड हो। लेकिन अगर आप मेरी तरह सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के चश्मे से देखें, तो यह पूरी व्यवस्था एक टूटी हुई खाट की तरह चरमरा रही है। जिसे ये लोग ‘संगठन’ कहते हैं, वह असल में एक अत्यधिक वक्रता (high curvature) वाला सांख्यिकीय मैनिफोल्ड है, जहाँ सच्चाई और तर्क का दम घुट रहा है।
भ्रम का गणित
जब कोई सीईओ मंच पर खड़ा होकर ‘विज़न’ की बात करता है, तो वह यह मानकर चलता है कि सूचना एक समतल मैदान पर दौड़ रही है। क्या बकवास है। हकीकत यह है कि सूचना का प्रवाह किसी पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में फँसे हुए रिक्शे जैसा है। वह कभी सीधा नहीं चलता। विभाग दर विभाग, शब्द अपने अर्थ खोते चले जाते हैं। इसे हम गणित में ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) कहते हैं।
आपकी मार्केटिंग टीम और इंजीनियरिंग टीम के बीच की दूरी को मीटर या किलोमीटर में नहीं मापा जा सकता; यह दूरी ‘प्रोबेबिलिटी डिस्ट्रीब्यूशन’ के अंतर की है। वे अलग-अलग वास्तविकताओं में जीते हैं। उनके बीच ‘सहमति’ पैदा करना गणितीय रूप से असंभव है। यह वैसा ही है जैसे आप बासी समोसे को ताज़ा बताकर बेचने की कोशिश करें—चटनी कितनी भी डाल लो, बासीपन नहीं छिपता।
इस अराजकता को छिपाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। कल ही मैंने एक ‘सीनियर वाइस प्रेसिडेंट’ को देखा, जो अपनी कमर के दर्द का बहाना बनाकर एक अत्याधुनिक एर्गोनोमिक मेश चेयर पर विराजमान थे। साठ हजार की कुर्सी? क्या उससे उनकी रीढ़ की हड्डी में तोता बैठ जाएगा? नहीं। यह कुर्सी केवल उस शारीरिक और मानसिक पक्षाघात को आरामदायक बनाने का एक महँगा तरीका है, जो निर्णय न ले पाने की वजह से पैदा हुआ है। वे उस जालीदार नायलॉन के सिंहासन पर बैठकर सोचते हैं कि वे दुनिया चला रहे हैं, जबकि असल में वे केवल एंट्रॉपी (Entropy) का एक और स्रोत हैं।
कोलाहल और मौन सहमति
जिसे दुनिया ‘टीम वर्क’ कहती है, वह असल में ‘कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler divergence) को कम करने का एक भद्दा प्रयास है। हम मीटिंग में सिर इसलिए नहीं हिलाते कि हम सहमत हैं; हम सिर इसलिए हिलाते हैं क्योंकि हम थक चुके हैं। यह बौद्धिक समर्पण है। यह वह पल है जब इंसान सोचता है, “भाड़ में जाए तर्क, मुझे बस घर जाना है।”
इस बौद्धिक शून्यता को भरने के लिए फिर से बाज़ार बीच में आता है। लोग सोचते हैं कि अगर वे अपने निरर्थक विचारों को किसी महँगी चीज़ पर लिखेंगे, तो वे विचार सोने में बदल जाएंगे। मैंने देखा है लोगों को, प्रीमियम लेदर जर्नल्स और प्लानर्स में अपनी टू-डू लिस्ट बनाते हुए। उस मरे हुए जानवर की खाल पर स्याही घिसने से आपकी ‘मीटिंग’ का निष्कर्ष नहीं बदलने वाला। यह सिर्फ एक ‘फेटिश’ है—खुद को व्यस्त और महत्वपूर्ण दिखाने का एक नाटक। पच्चीस सौ रुपये की डायरी में लिखी गई मूर्खता, अंततः मूर्खता ही रहती है।
क्या घटिया मजाक है।
यांत्रिक बुद्धि का ठंडा स्पर्श
और अब, इस सबके ऊपर वह काली छाया मंडरा रही है जिसे लोग भविष्य कहते हैं। मैं उस ‘दो अक्षरों वाले शब्द’ (AI) का नाम नहीं लूँगा, क्योंकि वह अब एक गाली बन चुका है। हम जिसे ‘कम्प्यूटेशनल गवर्नेंस’ कहते हैं, वह दरअसल मानवीय त्रुटियों को एक ठंडी, निर्जीव कलन विधि (Algorithm) से बदलने की प्रक्रिया है।
यह कोई नैतिक उत्थान नहीं है। मशीनें हमारी तरह ‘समझौता’ नहीं करतीं। वे केवल ‘लॉस फंक्शन’ को मिनिमाइज़ करती हैं। उनके लिए, आपकी भावनाएं, आपका ऑफिस का ड्रामा, और आपकी वह साठ हजार की कुर्सी—सब कुछ बस ‘शोर’ (noise) है जिसे फ़िल्टर किया जाना है। हेगेलियन डायलेक्टिक (Hegelian Dialectic) की बात करें तो, यह एक विचित्र ‘सिंथेसिस’ है जहाँ मनुष्य का लोप हो जाता है। हम अब निर्णय लेने वाले नहीं, बल्कि डेटा पॉइंट बन गए हैं।
संगठन की ज्यामिति अब सपाट की जा रही है, लेकिन तर्क से नहीं, बल्कि एक बुलडोज़र से। जिस दिन यह प्रक्रिया पूरी होगी, उस दिन किसी मीटिंग की जरूरत नहीं होगी, किसी सहमति की जरूरत नहीं होगी। बस एक लंबी, ठंडी चुप्पी होगी, और सर्वर रूम की हल्की भनभनाहट।
बिल ले आओ। यह सब अब बर्दाश्त के बाहर है।
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