कॉर्पोरेट ज्यामिति

पिछली बार जब हम इस बार (Bar) के अंधेरे कोने में मिले थे, तो मैंने कहा था कि आधुनिक कॉर्पोरेट जगत एक ऐसा सर्कस है जहाँ जोकर ही रिंगमास्टर बन बैठे हैं। आज, ज़रा इस ‘बिजनेस वैल्यू’ (Business Value) नाम के प्रेत का असली पोस्टमार्टम करते हैं। लोग इसे ‘मिशन’, ‘विजन’ और ‘पर्पस’ जैसे रेशमी शब्दों में लपेटते हैं, जैसे कोई सड़क किनारे बिकने वाले सड़े हुए कबाब को सोने के वर्क में लपेट कर परोस रहा हो। हकीकत में, यह सब डेटा के समुद्र में एक सांख्यिकीय विचलन (statistical deviation) और धोखाधड़ी के अलावा और कुछ नहीं है।

तमाशा: भूख और खाली जेब का नाटक

कॉर्पोरेट जगत में ‘सार्वजनिक हित’ की बात करना उतना ही घिनौना और हास्यास्पद है जितना कि एक भूखे नंगे आदमी के सामने बैठकर छप्पन भोग की बारीकियों पर चर्चा करना। बड़ी-बड़ी टेक कंपनियाँ चिल्लाती हैं कि वे दुनिया को ‘कनेक्ट’ कर रही हैं और समाज सुधार रही हैं, लेकिन उनकी असलियत उनके बैंक बैलेंस के ‘लोकल मिनिमा’ (local minima) में छिपी हुई है, जहाँ वे नैतिकता को दफन कर चुके हैं। जिसे तुम ‘संगठनात्मक विकास’ कहते हो, वह वास्तव में ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम का क्रूर प्रदर्शन है—यानी कि अव्यवस्था का बढ़ना। यह सिर्फ तुम्हारे बटुए की खाली होती जेब और सिस्टम की बढ़ती हुई ‘एंट्रॉपी’ है।

एक कर्मचारी की ‘प्रेरणा’ क्या है? यह कोई दैवीय शक्ति या ‘पैशन’ नहीं है। यह सिर्फ न्यूरोट्रांसमीटर का एक सस्ता खेल है और महीने के अंत में मिलने वाले उन चंद कागज के टुकड़ों की भूख है, जो उसे इस वातानुकूलित नरक में टिके रहने पर मजबूर करती है। यह वैसा ही है जैसे दोपहर की तपती धूप में अपने स्मार्टफोन की बैटरी का 1% पर आ जाना और चार्जर न मिलना—एक अंतहीन, धीमी और दर्दनाक चिड़चिड़ाहट। लोग फाइव-स्टार होटलों के एयर-कंडीशनर वाले कमरों में ‘सिनर्जी’ (Synergy) पर भाषण देते हैं, जबकि बाहर खड़ा चपरासी यह गणित लगा रहा होता है कि शाम को घर ले जाने के लिए आटा सस्ता मिलेगा या नहीं। ये तथाकथित ‘विजनरी लीडर्स’ खुद को भगवान समझते हैं क्योंकि वे अपनी जेब में पाँच लाख रुपये का Montblanc Meisterstück रखते हैं। विडंबना देखिए, उनके उस हस्ताक्षर की कीमत उस रद्दी कागज से भी कम है जिस पर वे दस्तखत करते हैं। यह कोई स्टेटस सिंबल नहीं है, बल्कि उनकी बौद्धिक कंगाली और असुरक्षा का विज्ञापन है।

ज्यामिति: शोषण का नया पैमाना

अब, ज़रा उस ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) पर आते हैं जिसका तुम लोग एमबीए की कक्षाओं में ढोल पीटते हो। एक कंपनी कोई पवित्र मंदिर नहीं, बल्कि एक जटिल ‘मैनीफोल्ड’ (Manifold) है—एक ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी, ऊबड़-खाबड़ सतह जहाँ हर मोड़ पर तुम्हें लूटने का पुख्ता इंतजाम है। यहाँ ‘फिशर इंफॉर्मेशन मैट्रिक्स’ (Fisher Information Matrix) वह चालाक और क्रूर पैमाना है जिससे यह नापा जाता है कि एक मजदूर के पसीने से, उसकी आत्मा से, कितनी और बूंदें निचोड़ी जा सकती हैं बिना उसे पूरी तरह से मारे।

इस मैनीफोल्ड पर ‘रीमानियन मेट्रिक’ (Riemannian metric) कोई गणितीय सुंदरता नहीं है, बल्कि यह वह घुमावदार रास्ता है जो एक आम आदमी को कभी सीधे सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने ही नहीं देता। तुम सोचते हो कि तुम ‘कड़ी मेहनत’ की सीधी रेखा (geodesic) में चल रहे हो, लेकिन बाज़ार की वक्रता (curvature) तुम्हें उसी गंदे गड्ढे में वापस धकेल देती है जहाँ से तुमने शुरू किया था। यह वैसा ही है जैसे एक ऑटो-रिक्शा वाला तुम्हें पूरे शहर के चक्कर लगवाकर, मीटर घुमाकर, वापस उसी रेलवे स्टेशन पर छोड़ दे और दुगना किराया वसूल ले। तुम बस चल रहे हो, पहुँच कहीं नहीं रहे।

इस ‘ज्यामितीय’ खेल में तुम्हारी भावनाएं, तुम्हारा दर्द, तुम्हारी वफादारी—यह सब सिर्फ ‘शोर’ (noise) है। तुम्हारी रातों की नींद और तनाव, यह सब डेटा के विशाल समुद्र में एक मामूली सा ‘फ्लक्चुएशन’ है जिसे कॉरपोरेट एल्गोरिदम पल भर में साफ (smooth out) कर देते हैं। यदि कोई कंपनी गर्व से कहती है कि वह ‘डेटा-ड्रिवन’ है, तो समझ लो कि उन्होंने तुम्हारी खाल उधेड़ने का सबसे सटीक गणितीय तरीका ढूंढ लिया है। वे तुम्हारे जीवन की हर हरकत, हर सांस को एक कोऑर्डिनेट में बदल देते हैं ताकि वे यह तय कर सकें कि तुम्हें कब और कैसे ‘डिस्कार्ड’ करना है। यह सूचना का विज्ञान नहीं, यह आधुनिक गुलामी की नई ज्यामिति है।

शून्य: सड़े हुए समोसे और अस्तित्व का संकट

जैसे-जैसे हम इस सांख्यिकीय नरक (Statistical Hell) में और नीचे गिरते हैं, हमें ‘अस्तित्वगत सार्वजनिकता’ (Existential Publicity) का वह मोड़ मिलता है जहाँ सब कुछ स्वाहा हो जाता है, जहाँ अर्थ का अनर्थ हो जाता है। यहाँ ‘फेज ट्रांजिशन’ (Phase Transition) का मतलब यह नहीं है कि कोई महान परिवर्तन हो रहा है या पानी भाप बन रहा है। इसका सीधा और कड़वा मतलब यह है कि सिस्टम इतना सड़ चुका है, इतना जटिल हो गया है कि अब उसे सुधारने की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

यह ‘कटिंग चाय’ और किसी ‘फाइव स्टार होटल की लाट्टे’ के बीच का फर्क है। सड़क किनारे की टपरी की चाय में कम से कम गंदगी और पसीना सामने तो दिखता है, उसमें एक ईमानदारी है। लेकिन कॉर्पोरेट की ‘पब्लिकिटी’ उस झाग वाली कॉफी की तरह है जिसके नीचे सिर्फ कड़वा, बेस्वाद काला पानी होता है। तुम जितना अधिक ‘वैल्यू क्रिएशन’ की बात करते हो, उतनी ही तेजी से तुम शून्य की ओर, शून्यता की ओर बढ़ते हो। कंपनियाँ अब उत्पाद नहीं बेचतीं, वे तुम्हें एक ऐसा भ्रम, एक ऐसा ‘सिमुलेशन’ बेचती हैं जिसे तुम अपनी खाली, अर्थहीन जिंदगी के सन्नाटे को भरने के लिए खरीदते हो।

अंत में, यह सब एक ऐसा विशालकाय ‘ब्लैक होल’ है जो तुम्हारी ऊर्जा, तुम्हारा समय और तुम्हारी बची-खुची गरिमा को निगल रहा है। जिसे तुम ‘सफलता’ या ‘करियर’ कहते हो, वह इस अंधेरी सुरंग का आखिरी कोना है जहाँ पहुँचने के बाद, जब तुम्हारी जवानी ढल चुकी होती है, तुम्हें पता चलता है कि वहाँ कुछ भी नहीं था—सिर्फ एक रसीद थी जिस पर लिखा था ‘नॉन-रिफंडेबल’। मुझे अब यहाँ और नहीं रुकना, इस फालतू की बौद्धिक चर्चा से बेहतर है कि मैं बाहर जाकर उस कड़कती धूप और धूल का सामना करूँ, जहाँ कम से कम गर्मी असली है, तुम्हारी इन कागजी थ्योरीज और सजे हुए शब्दों की तरह फर्जी नहीं। बकवास।

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