श्रम की सड़ांध और सीलन
क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर की उन पीली पड़ चुकी दीवारों को अपनी नाक के करीब से महसूस किया है? वह गंध केवल पुराने कागजों और सस्ते फिनाइल की नहीं है; वह दशकों से वहां जमा हो रहे ‘श्रम’ के पसीने, हताशा और बासी समोसों की चटनी का एक कार्बनिक मिश्रण है। हम जिसे बड़े गर्व से ‘राष्ट्र निर्माण’ या ‘सार्वजनिक सेवा’ कहते हैं, वह वास्तव में ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का एक बेहद भद्दा, क्रूर और खर्चीला मजाक है।
सुबह नौ बजे, एक क्लर्क अपनी जंग लगी साइकिल खड़ी करता है और उस कुर्सी पर ऐसे बैठता है जैसे वह किसी इंटरस्टेलर स्पेसशिप का पायलट हो। लेकिन भौतिकी की नजर में, वह और उसका पूरा विभाग केवल एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है। इल्या प्रिगोगिन अगर आज जीवित होते और किसी भारतीय नगर निगम के दफ्तर में जाते, तो वे अपनी नोबेल प्राइज वापस कर देते। यह क्लर्क ऊर्जा का उपभोग करता है, ऑक्सीजन जलाता है, और बदले में ब्रह्मांड को क्या देता है? केवल ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy)। फाइलों का एक मेज से दूसरी मेज पर खिसकना कोई ‘कार्य’ नहीं है; यह केवल ब्रह्मांडीय अव्यवस्था को बढ़ाने का एक नौकरशाही तरीका है।
तली हुई एन्ट्रापी: समोसा और लोकल ट्रेन
इस व्यवस्था को समझने के लिए किसी पाठ्यपुस्तक की जरूरत नहीं है, बस कैंटीन में तल रहे उस समोसे को देखिए। वह समोसा अब भोजन नहीं रहा; वह पुराने तेल और अत्यधिक तापमान का एक ऐसा अस्थिर संतुलन (Non-equilibrium state) है जो बस गैस्ट्रिक विस्फोट का इंतजार कर रहा है। श्रमिक का जीवन भी ठीक वैसा ही है। वह लोकल ट्रेन या मेट्रो की भीड़ में धक्का-मुक्की करता है, जहाँ सैकड़ों शरीर एक-दूसरे के साथ केवल पसीने और थर्मल ऊर्जा का आदान-प्रदान कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में ‘उत्पादकता’ शून्य है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी सस्ते चाइनीज फोन की बैटरी—जो चार्जिंग पर तो 100% दिखाती है, लेकिन एक जरूरी कॉल करते ही 12% पर आ गिरती है।
हम सब बस गर्मी पैदा कर रहे हैं। मीटिंग्स, सेमिनार, और अंतहीन ईमेल थ्रेड्स—ये सब सिस्टम को ठंडा रखने के लिए बाहर फेंका गया कचरा हैं। जब आप किसी निरर्थक फाइल पर ‘अप्रूव्ड’ की मुहर लगाते हैं, तो आप कोई मूल्य पैदा नहीं कर रहे होते। आप बस अपनी जैविक एटीपी (ATP) को स्याही के धब्बों में बदल रहे होते हैं ताकि शाम को मिलने वाली दिहाड़ी से अपनी भूख और अस्तित्व के संकट को कुछ देर के लिए शांत कर सकें। यह एक घटिया सौदा है।
भय, गणित और दो लाख की कुर्सी
अब यहाँ कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी ‘फ्री एनर्जी प्रिंसिपल’ (Free Energy Principle) का ज्ञान बघारेंगे। कार्ल फ्रिस्टन का सिद्धांत कहता है कि कोई भी जैविक प्रणाली (यानी आप और आपका बॉस) केवल एक ही चीज चाहती है: ‘सरप्राइज’ (Surprise) को कम करना। एक नौकरशाह जो ‘नियोजन’ या ‘प्लानिंग’ के नाम पर कागजों के पहाड़ खड़े करता है, वह देश का भविष्य नहीं सुधार रहा। वह तो बस उस अनिश्चितता से डरा हुआ है कि कहीं कोई आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता उससे सवाल न पूछ ले।
उसका दिमाग भविष्य की भविष्यवाणी करने की कोशिश कर रहा है, और जब वह इसमें विफल होता है, तो वह नियमों का एक ऐसा अभेद्य किला बनाता है जिसे हम ‘मार्कोव ब्लैकेट’ (Markov Blanket) कह सकते हैं। लेकिन असलियत में, यह किला उस फटी हुई मच्छरदानी जैसा है जिसमें छेद इतने बड़े हैं कि भ्रष्टाचार के मच्छर आराम से खून चूस सकें। जिसे हम ‘सहानुभूति’ या ‘सोशल सर्विस’ कहते हैं, वह भी बस एक न्यूरोलॉजिकल एरर है। हम दूसरों की मदद इसलिए नहीं करते कि हम महात्मा हैं, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि उनका रोना हमारे दिमाग के प्रेडिक्शन मॉडल में ‘शोर’ (Noise) पैदा करता है। उस शोर को बंद करने के लिए हम कुछ योजनाएँ फेंक देते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस खोखलेपन को भरने के लिए लोग बाजारवाद का सहारा लेते हैं। आप किसी वरिष्ठ अधिकारी के केबिन में जाइए, वहां आपको एक Herman Miller Aeron Chair मिलेगी, जिसकी कीमत एक छोटे गाँव के बजट के बराबर है। क्या उन्हें वाकई लगता है कि एर्गोनॉमिक्स का यह चमत्कार, यह जालीदार पीठ और एडजस्टेबल लम्बर सपोर्ट, उनके रीढ़ की हड्डी में बसी उस नैतिक शून्यता को ठीक कर देगा? आप चाहे जितनी महंगी और वैज्ञानिक कुर्सी पर बैठ जाएं, गुरुत्वाकर्षण और एन्ट्रापी आपकी आत्मा को नीचे खींचते ही रहेंगे। कमर का दर्द कुर्सी से नहीं, उस बोझ से है जो निरर्थक काम करने से आत्मा पर पड़ता है।
सूचना ज्यामिति और स्याही का प्रलय
सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की दृष्टि से देखें तो आज के संगठन अपनी ही जटिलता के बोझ तले दबे जा रहे हैं। वे वास्तविकता को मॉडल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वास्तविकता (Reality) हमेशा उनके मॉडल से ज्यादा तेज और क्रूर होती है। यह उस बूढ़े हाथी जैसा है जो कीचड़ में फंसा है; वह बाहर निकलने के लिए जितनी ताकत लगाता है, उतना ही गहरा धंसता जाता है। वे ‘पब्लिक गुड’ की बातें करते हैं, लेकिन यह सब केवल संस्थागत मृत्यु को टालने का एक बहाना है।
शाम के सात बज रहे हैं। दफ्तर की ट्यूबलाइट्स अब टिमटिमाना शुरू कर रही हैं, जैसे वे भी हार मान चुकी हों। आप अपनी मेज पर रखे उस Montblanc Meisterstück पेन को उठाते हैं। सोने की निब, काला रेजिन, सही वजन—एक शानदार उपकरण। लेकिन आप इससे क्या लिखते हैं? केवल अपनी गुलामी के आदेश। यह पेन आपकी उंगलियों के उस कंपन को छुपाने का एक महंगा खिलौना भर है जो आपको यह याद दिलाता है कि आप जीवन में कुछ और कर सकते थे। लेकिन आपने नहीं किया।
श्रम कोई गौरव नहीं है। यह एक जैविक विफलता है। यदि हम वास्तव में कुशल होते, तो हमें ‘काम’ करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। हम बस अस्तित्व में होते, जैसे पत्थर या तारे। लेकिन नहीं, हमें तो सुबह उठकर अलार्म बंद करना है, ठंडे पानी से नहाना है और यह साबित करना है कि हम अभी मरे नहीं हैं।
मुझे अब घर जाने दो। मेरी चाय ठंडी हो चुकी है, और इस कमरे की हवा में अब सिर्फ हार की गंध बची है। एन्ट्रापी जीत गई है। हमेशा की तरह।
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