विघटन: व्यवस्था का वहम

ऊष्मागतिकी और सड़े हुए समोसे

पिछली बार जब हम ‘दक्षता’ (Efficiency) के उस खोखले और बिकाऊ आदर्श पर चर्चा कर रहे थे, तो मुझे लगा था कि शायद दुनिया के इस बेतुके सर्कस में थोड़ी बहुत अकल बाकी होगी। लेकिन नहीं, कॉर्पोरेट के इन वातानुकूलित कांच के महलों में आज भी ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘इकोसिस्टम’ के नाम पर वही पुराना तमाशा चल रहा है। लोग समझते हैं कि एक कंपनी बनाना या उसे चलाना किसी महान ‘विजन’ या ‘मिशन’ का खेल है—यह एक ऐसा सफेद झूठ है जिसे सुनकर मुझे उस शादी के बासी समोसे की याद आती है जो बाहर से सख्त दिखता है लेकिन भीतर से फफूंद और दुर्गंध से भरा होता है। सच तो यह है कि कोई भी संगठन, चाहे वह कोई चमकदार यूनिकॉर्न स्टार्टअप हो या फाइलों में दबा हुआ सरकारी दफ्तर, केवल एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है। अगर मैं भौतिकी की रूखी भाषा में कहूं, तो यह एक ऐसा छेद वाला बर्तन है जिसमें आप जितनी भी ऊर्जा और संसाधन डालेंगे, वह अंततः ब्रह्मांड की गर्मी और अराजकता (Entropy) को ही बढ़ाएगा।

गुलामी का पट्टा और बैटरी का फूलना

जब आप सुबह नौ बजे अपनी गर्दन पर वह सिंथेटिक गुलामी का पट्टा—जिसे आप गर्व से ‘टाई’ कहते हैं—बांधकर दफ्तर में दाखिल होते हैं, तो आप कोई ‘वैल्यू’ क्रिएट नहीं कर रहे होते। आप बस अपनी जेब से गिरते समय के सिक्कों की आवाज को कीबोर्ड की खटखट में छुपाने की कोशिश कर रहे होते हैं। जिसे आप ‘प्रोडक्टिविटी’ कहते हैं, वह असल में एन्ट्रॉपी से लड़ने की एक हारी हुई जंग है। आप बेमतलब की एक्सेल शीट्स भरते हैं, उन ईमेल्स का जवाब देते हैं जिन्हें कोई नहीं पढ़ता, और शाम तक आपकी मानसिक हालत उस सस्ती मोबाइल बैटरी जैसी हो जाती है जो 1% पर आकर फूल चुकी होती है और किसी भी पल फट सकती है। यह संगठन का विकास नहीं है; यह सिर्फ उस जैविक ऊर्जा का विसर्जन है जिसे आपने अपने परिवार और नींद के हिस्से से चुराया है।

हकीकत यह है कि जिसे हम ‘बिजनेस इकोसिस्टम’ कहते हैं, वह असल में पैसे को पसीने और हताशा में बदलने की एक बेहद महंगी मशीन है। ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम किसी सीईओ की ‘टाउन हॉल मीटिंग’ या प्रेरणादायक भाषणों से नहीं बदलता—ब्रह्मांड में गंदगी हमेशा बढ़ेगी। एक कंपनी क्या करती है? वह बाहर से ताजा खून (युवा कर्मचारी), निवेशकों का पैसा और कच्चा माल सोखती है ताकि अपने साउंड-प्रूफ केबिन के भीतर थोड़ी सी ‘व्यवस्था’ का ढोंग कर सके। लेकिन इस झूठी शांति की कीमत क्या है? बाहर की गलियों में फैलता ट्रैफिक का धुआं, तनाव से टूटते रिश्ते और वह मानसिक कचरा जिसे कोई रिसायकल नहीं कर सकता। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली की किसी तपती दोपहर में उस पुराने डीजल जनरेटर का शोर, जो खुद को ठंडा रखने के लिए पूरे मोहल्ले के फेफड़ों को काले धुएं से भर देता है।

कुर्सी, जो आपकी रीढ़ और बैंक बैलेंस दोनों तोड़ दे

इस पागलपन की हद देखिए, लोग इस अव्यवस्था के बोझ को सहने के लिए भी अपनी गाढ़ी कमाई लुटा रहे हैं। कल ही मैंने एक तथाकथित ‘विजनरी लीडर’ को देखा जो इस ₹2,00,000 की एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठकर ‘कॉस्ट कटिंग’ और ‘मितव्ययिता’ की बातें कर रहा था। क्या विडंबना है! दो लाख रुपये की जालीदार प्लास्टिक और एल्युमिनियम की कुर्सी सिर्फ इसलिए ताकि आपकी रीढ़ की हड्डी उस खोखलेपन को झेल सके जो यह पूरा सिस्टम पैदा कर रहा है? इतने पैसों में तो एक मजदूर का पूरा खानदान साल भर का घी, अनाज और शायद थोड़ी खुशियाँ भी खरीद सकता है। लेकिन नहीं, आपको उस ‘कााइनेमैटिक’ ढांचे की जरूरत है ताकि आप यह भूल सकें कि आप एक डूबते हुए जहाज के कैप्टन हैं। यह व्यवस्था नहीं, यह तो सिर्फ अपने अस्तित्व के डर को महंगे ब्रांडेड लेबल से ढकने की एक भद्दी कोशिश है।

भौतिकी का क्रूर मजाक

गैर-संतुलन ऊष्मागतिकी (Non-equilibrium thermodynamics) के भारी-भरकम शब्दों को अगर मैं सड़क की भाषा में समझाऊं, तो संगठन कुछ और नहीं, बल्कि एक बहती हुई गंदी नाली है जिसमें कहीं-कहीं कुछ भंवर बन जाते हैं जिन्हें हम ‘संस्थान’ कहते हैं। इल्या प्रोगोगिन ने इसे ‘ऑर्डर आउट ऑफ केओस’ कहा था, लेकिन हकीकत में यह ‘केओस फॉर द सेक ऑफ प्रॉफिट’ है। जैसे ही निवेशकों का पैसा या बाजार की मांग रुकती है, आपकी यह भव्य इमारत ताश के पत्तों की तरह नहीं, बल्कि उस गीले कचरे की तरह ढहती है जिसकी बदबू हफ्तों तक नहीं जाती। आपके ‘क्वार्टरली रिजल्ट्स’ और ‘केपीआई’ (KPIs) कुछ और नहीं, बल्कि उस मरते हुए मरीज की धड़कनें हैं जिसे वेंटिलेटर पर रखा गया है। जब तक आप इस सिस्टम में ‘नेगेटिव एन्ट्रॉपी’ यानी दूसरों की मेहनत और प्राकृतिक संसाधनों को ठूंसते रहेंगे, यह जिंदा होने का नाटक करता रहेगा।

याद रहे, इस ब्रह्मांड में लंच तो दूर, सांस लेना भी मुफ्त नहीं है। जब आप किसी बोर्डरूम के भीतर शांति और अनुशासन का माहौल बनाते हैं, तो आप अनिवार्य रूप से समाज के दूसरे कोने में अशांति, शोर और गरीबी को धक्का दे रहे होते हैं। आपकी कंपनी का ‘नेट प्रॉफिट’ असल में प्रकृति के खाते में लिखा गया एक ऐसा ‘थर्मल कर्ज’ है जिसे आपकी आने वाली नस्लें ब्याज समेत, शायद बाढ़ या सूखे के रूप में चुकाएंगी। यह एक शून्य-योग खेल (Zero-sum game) है—किसी का लॉन तभी हरा दिखता है जब पड़ोस की बाल्टी का पानी चुराया गया हो। आज का मैनेजमेंट सिर्फ इस चोरी को एक ‘प्रोफेशनल’ नाम देने की कला है।

मृत गाय की खाल और फाइलों का बोझ

सार्वजनिक क्षेत्र में इस ‘नेगेटिव एन्ट्रॉपी’ का तमाशा और भी वीभत्स और हास्यास्पद है। सरकारें पार्क बनाती हैं, सड़कें बनाती हैं—यह सब समाज की अव्यवस्था को कम करने के दिखावे हैं। लेकिन क्या आपने कभी उस कागजी कार्रवाई की मोटाई और वजन महसूस किया है? सूचना सिद्धांत (Information Theory) चीख-चीख कर कहता है कि जब शोर (Noise) बहुत बढ़ जाए, तो वह संगीत नहीं, बल्कि सरदर्द बन जाता है। आज का प्रशासन सिर्फ फाइलों का एक ऐसा पहाड़ है जो अपनी ही ऊंचाई के नीचे दबकर सड़ रहा है। हम जटिलता को सुलझाते नहीं हैं, हम उसे सिर्फ एक डेस्क से दूसरे डेस्क पर सरकाते हैं, उस उम्मीद में कि शायद वह गायब हो जाएगी। यह बिल्कुल उस पार्टी के अंत में बचे हुए ठंडे, चिपचिपे और बेस्वाद समोसे जैसा है, जिसे वेटर डस्टबिन में फेंकने के बजाय फिर से ओवन में गरम करने ले जाता है—न कोई उसे खाना चाहता है, न कोई उसे फेंकने की जिम्मेदारी लेना चाहता है।

हैरत होती है कि लोग इस सड़न को छुपाने के लिए डेढ़ लाख रुपये के इस इटालियन लेदर बैग में अपनी फाइलें छिपाकर चलते हैं। जैसे कि मृत जानवर की वह महंगी खाल उस प्रशासनिक बदबू को गुलाब की खुशबू में बदल देगी। यह विलासिता नहीं, यह तो एक बीमार सभ्यता की पहचान है जो अपने गहरे, मवाद भरे घावों पर सोने का वर्क चढ़ा रही है। मैं थक चुका हूँ उन बुद्धिजीवियों की बातें सुनकर जो ‘इकोसिस्टम’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे करते हैं जैसे वह कोई पवित्र गंगाजल हो। असल में, हम सब बस जलती हुई मोमबत्तियाँ हैं जो अंधेरे को दूर करने का भ्रम पाल रही हैं, जबकि हकीकत में हम सिर्फ मोम को जहरीले धुएं में बदलकर अपना अस्तित्व खत्म कर रहे हैं। जाओ, अब अपने उन बेमतलब के ज़ूम कॉल्स पर वापस लौट जाओ और म्यूट बटन दबाकर खुद को यकीन दिलाओ कि तुम दुनिया बदल रहे हो।

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