एन्ट्रॉपी की भट्ठी

ऊष्मागतिक दासता का सिद्धांत

अपने काम को ‘आत्म-सम्मान’ या ‘सृजन’ जैसे भारी-भरकम शब्दों से सजाना बंद करो। यह सड़ी हुई लाश पर महँगा इत्र छिड़कने जैसा है, जिससे बदबू नहीं जाती, बस और भी भयानक हो जाती है। अगर हम भावनाओं के कचरे को हटाकर शुद्ध भौतिकी की नज़र से देखें, तो तुम और तुम्हारा वो शानदार ऑफिस, थर्मोडायनेमिक्स (Thermodynamics) के क्रूर नियमों में फँसे एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) के अलावा कुछ नहीं हो। तुम, मैं, और यह पूरी कॉर्पोरेट दुनिया—हम सब बस एक ऐसी मशीन के पुर्जे हैं जिसका काम ब्रह्मांड की बढ़ती हुई अव्यवस्था (Entropy) को कुछ पलों के लिए अपने अंदर रोककर रखना है। और इसकी कीमत? तुम्हारी अपनी जैविक ऊर्जा का क्षय।

सिर दर्द हो रहा है… इस सस्ती शराब में शायद मिलावट है।

ईंधन की बर्बादी और भूख का गणित

श्रम का असली मूल्य ‘वैल्यू क्रिएशन’ नहीं है। यह इस बात का माप है कि तुमने खुद को बिखरने से बचाने के लिए वातावरण में कितनी गर्मी (Heat) छोड़ी है। सुबह की शुरुआत को ही ले लो। तुम उस लोहे के डिब्बे (मेट्रो या बस) में जानवरों की तरह ठुंसकर जाते हो, जहाँ पसीने की गंध और दूसरों की सांसों की उमस तुम्हारा स्वागत करती है। यह घर्षण (Friction) है। फिर तुम कैंटीन की बासी दाल और सड़क किनारे की ज़हरीली चाय—जिसे तुम ‘फ्यूल’ समझते हो—अपने पेट में डालते हो।

तुमने ‘नेगेटिव एन्ट्रॉपी’ (भोजन/वेतन) का उपभोग किया, लेकिन बदले में तुमने क्या पैदा किया? रिपोर्ट्स? पीपीटी? नहीं। भौतिकी की नज़र में तुमने सिर्फ ‘अपशिष्ट ऊष्मा’ (Waste Heat) पैदा की है। जिस तरह कीचड़ में फंसा हुआ ऑटो-रिक्शा पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबाता है—शोर बहुत होता है, धुआं निकलता है, इंजन गर्म हो जाता है, लेकिन गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ती—वही हाल तुम्हारे 9-से-5 के जीवन का है। तुम बस अपनी जगह पर खड़े होकर, अपनी कोशिकाओं (Cells) को जलाकर, ब्रह्मांड का तापमान बढ़ा रहे हो।

संगठन: एक टूटा हुआ रेफ्रिजरेटर

कॉर्पोरेट संगठन एक ऐसे रेफ्रिजरेटर की तरह हैं जिसका कंप्रेसर खराब हो चुका है। वे बाहर से निवेश और क्लाइंट्स के पैसे (ऊर्जा) खींचते हैं ताकि अंदर एक कृत्रिम ‘व्यवस्था’ (Order) बनाए रख सकें। लेकिन ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम माफ़ नहीं करता। तुम जितनी कोशिश करते हो चीज़ों को व्यवस्थित करने की—ईमेल को फोल्डर में डालने की, मीटिंग्स शेड्यूल करने की—उतनी ही तेज़ी से सिस्टम में अराजकता बढ़ती है।

तुम्हारे मैनेजर ‘हीट सिंक’ नहीं हैं; वे उस पुरानी दीवार की तरह हैं जो गर्मी को बाहर निकलने ही नहीं देती। मीटिंग्स में जब कोई ‘सिनर्जी’ और ‘ऑप्टिमाइजेशन’ की बात करता है, तो असल में वह हवा में कार्बन डाइऑक्साइड और मूर्खता का स्तर बढ़ा रहा होता है। यह सब बस शोर है। उष्मीय शोर।

और इस शोर में, अपनी नंगी और कांपती हुई आत्मा को ढंकने के लिए तुम क्या करते हो? तुम बाज़ार के चंगुल में फँसकर ‘सफलता’ के प्रतीक खरीदते हो। ज़रा इस बेतुके महंगे चमड़े के ऑर्गनाइज़र को देखो। इसकी कीमत में एक छोटे परिवार का महीने भर का राशन आ जाएगा। तुम इसे क्यों खरीदते हो? तुम्हें लगता है कि ₹50,000 की इस इटालियन लेदर की जिल्द में अपनी टू-डू लिस्ट (To-Do List) लिखने से तुम्हारे जीवन की अराजकता कम हो जाएगी? यह एक अंधविश्वास है। यह डायरी तुम्हारी उत्पादकता का सबूत नहीं है; यह तुम्हारे डर का स्मारक है। यह उस डूबते हुए जहाज पर पॉलिश मारने जैसा है जो पहले से ही पेंदे में छेद लिए हुए है। तुम इसे खरीदकर बस अपनी ‘डेथ क्लॉक’ को थोड़ा क्लासी बनाने की कोशिश कर रहे हो।

कितना हास्यास्पद है यह सब। हम अपनी ही चिता की लकड़ियों को वार्निश कर रहे हैं।

साम्यावस्था: एक ठंडी कब्र

अंततः, हर सिस्टम साम्यावस्था (Equilibrium) की तलाश में है। जीव विज्ञान में इसे ‘मृत्यु’ कहते हैं। तुम जिसे ‘रिटायरमेंट’ या ‘बर्नआउट’ कहते हो, वह बस वह अवस्था है जहाँ तुम्हारा सिस्टम अब और अधिक ऊर्जा को कार्य (Work) में बदलने में सक्षम नहीं रह गया है। तुम्हारा सारा संघर्ष, सारी रात की मेहनत, वह सारा स्ट्रेस जिसने तुम्हारे पेट में अल्सर पैदा कर दिया—ब्रह्मांड के पैमाने पर उसका मूल्य शून्य है।

ब्रह्मांड को परवाह नहीं है कि तुमने डेडलाइन पूरी की या नहीं। तुम बस एक स्थानीय गड़बड़ी (Local disturbance) थे जो अब शांत हो रही है। तुम्हारे द्वारा की गई सारी ‘मेहनत’ ने अंततः ब्रह्मांड की एन्ट्रॉपी को बढ़ाया ही है। तो फिर यह सब नाटक क्यों? शायद इसलिए कि हम शून्यता को सीधा देखने की हिम्मत नहीं रखते।

गला सूख गया है। और यह जगह अब बर्दाश्त के बाहर है।

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