मूर्खों का समागम
पिछले हफ्ते हमने चर्चा की थी कि कैसे कॉर्पोरेट जगत के ‘टाउनहॉल’ असल में मध्ययुगीन धार्मिक प्रवचनों का आधुनिक और अधिक उबाऊ संस्करण हैं। लोग वहां समाधान खोजने नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से अपनी अज्ञानता का उत्सव मनाने और एक-दूसरे की पीठ थपथपाने जाते हैं। यह सिलसिला वहीं से आगे बढ़ता है जहाँ तर्क खत्म होता है और ‘संगठनात्मक संस्कृति’ जैसा पाखंड शुरू होता है। किसी भी आधुनिक कार्यालय के मीटिंग रूम में कदम रखिए, आपको वहां ‘सहयोग’ और ‘सिनर्जी’ जैसे शब्दों का शोर सुनाई देगा, जो असल में बासी समोसे की तरह बेस्वाद और अंदर से खोखले होते हैं। एक तटस्थ पर्यवेक्षक के लिए, यह नजारा किसी रेलवे स्टेशन की चाट की दुकान जैसा है, जहां हर कोई चिल्ला रहा है लेकिन किसी को स्वाद का पता नहीं। समाजशास्त्र की दृष्टि से जिसे हम ‘सामूहिक बुद्धिमत्ता’ कहते हैं, वह सूचना सिद्धांत (Information Theory) की भाषा में केवल उच्च-डेसिबल वाला ‘सफेद शोर’ (White Noise) है। जब दस लोग एक मेज के चारों ओर बैठते हैं, तो वे जानकारी साझा नहीं कर रहे होते; वे असल में एक-दूसरे के ‘कैल बैक-लिब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler divergence) को बढ़ाने की कोशिश कर रहे होते हैं। हर व्यक्ति अपनी मान्यताओं के साथ आता है, जो एक सांख्यिकीय पूर्वाग्रह (Statistical Bias) के अलावा और कुछ नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक पुरानी एंबेसडर कार में फरारी का इंजन लगाने की कोशिश करें—दिखने में यह महत्वाकांक्षी लग सकता है, लेकिन भौतिकी के नियम इसे कबाड़ ही मानेंगे।
विकृत ज्यामिति
अब यदि हम इस तमाशे को थोड़ा गंभीरता से देखें—सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरे पास इस वक्त करने के लिए कुछ बेहतर नहीं है—तो हम ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। एक संगठन को एक ‘सांख्यिकीय विविध’ (Statistical Manifold) के रूप में सोचें। यहाँ हर निर्णय एक बिंदु है, और हर नीतिगत बदलाव उस सतह पर एक वक्र (Curve) है। फिशर सूचना मैट्रिक्स (Fisher Information Matrix) यहाँ वह मापदंड है जो बताता है कि आपका संगठन बाहरी दुनिया के संकेतों के प्रति कितना संवेदनशील है। अधिकांश कंपनियों में, यह मैट्रिक्स इतना संकुचित होता है कि वे अपने पैर की उंगलियों पर गिरने वाले हथौड़े को भी तब तक महसूस नहीं करते जब तक कि संक्रमण मस्तिष्क तक न पहुँच जाए। वे निर्णय नहीं लेते, वे केवल ‘स्ट्रक्चरल लर्निंग’ का ढोंग करते हैं। यह सीखना उतना ही धीमा और कष्टदायक है जितना कि दिल्ली की भीषण गर्मी में ट्रैफिक जाम में फँसे एक रिक्शे की गति। लोग अक्सर पूछते हैं कि सबसे बुद्धिमान निर्णय कैसे लिया जाए। गणितीय रूप से, आपको केवल सूचना की सतह पर ‘नेचुरल ग्रेडिएंट’ (Natural Gradient) का पालन करना है। लेकिन इंसान अपनी भावनाओं और ‘ईगो’ के कारण हमेशा उस ढलान से भटक जाता है। हम अपनी मानसिक अव्यवस्था को छिपाने के लिए दुनिया के सबसे महंगे शोर-रद्द करने वाले हेडफ़ोन लगाकर बाहरी दुनिया को म्यूट करने की कोशिश करते हैं, या फिर 15,000 रुपये की हस्तनिर्मित इतालवी चमड़े की डायरी खरीदते हैं, यह सोचकर कि शायद महंगे कागज पर लिखने से हमारे विचार सुव्यवस्थित हो जाएंगे। यह मूर्खता की पराकाष्ठा है। कागज की कीमत या गैजेट्स की चमक से दिमाग की गुणवत्ता नहीं बदलती।
शून्य में विलीन
अंततः, संगठन की इस पूरी कसरत का परिणाम ‘एन्ट्रॉपी’ की अधिकतम स्थिति की ओर जाना ही है। सूचना ज्यामिति हमें सिखाती है कि जैसे-जैसे डेटा बढ़ता है, वैसे-वैसे मॉडल की जटिलता भी बढ़नी चाहिए। लेकिन हमारे संस्थान इसके उलट काम करते हैं। वे जितने बड़े होते जाते हैं, उतने ही अधिक जड़ और मूर्ख होते जाते हैं। इसे आप ‘थर्मोडायनामिक्स’ के दूसरे नियम का सामाजिक अनुप्रयोग कह सकते हैं। हर मीटिंग, हर ईमेल, और हर वार्षिक समीक्षा उस गर्मी (Heat) को बढ़ाती है जो सिस्टम को नष्ट कर रही है। हम जिस ‘सफलता’ का जश्न मनाते हैं, वह अक्सर केवल सांख्यिकीय अनियमितता (Statistical Fluke) होती है जिसे हमने अपनी बहादुरी समझ लिया होता है। सच तो यह है कि फिशर मैट्रिक्स कभी झूठ नहीं बोलता; यदि आपकी संरचना में लचीलापन नहीं है, तो आप केवल एक ज्यामितीय विसंगति हैं जो मिटने की प्रतीक्षा कर रही है। सच कहूँ तो, इस सब पर बहस करना भी ऊर्जा की बर्बादी है। बाहर बारिश हो रही है और मेरा लैपटॉप चार्ज नहीं है। अजीब पागलपन है।
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