कॉर्पोरेट एन्ट्रॉपी

कॉर्पोरेट एन्ट्रॉपी: एक व्यवस्थित आत्महत्या

अक्सर जब मैं किसी विश्वविद्यालय के वातानुकूलित सभागार में बैठकर “कॉर्पोरेट सस्टेनेबिलिटी” पर किसी नौसिखिए सीईओ का रटा-रटाया भाषण सुनता हूँ, तो मुझे अपने सामने रखी ठंडी हो चुकी चाय और उस पर जमी मलाई की परत में ब्रह्मांड का अंत दिखाई देता है। वे लोग जिसे ‘विकास’ या ‘ग्रोथ’ कहते हैं, मैं उसे केवल ‘मृत्यु की ओर एक सुव्यवस्थित दौड़’ समझता हूँ। आम आदमी, जो अपनी ईएमआई (EMI) और भविष्यनिधि (PF) के जाल में फंसा है, यह समझता है कि संगठन एक पत्थर की इमारत है जो समय के साथ और मजबूत होती जाएगी। यह सदी की सबसे बड़ी मूर्खता है।

कोई भी व्यवसाय, चाहे वह गली के नुक्कड़ पर धूल और धुएं के बीच समोसे तलने वाला हो या सिलिकॉन वैली के कांच के महलों में बैठा कोई तकनीकी दानव, वास्तव में भौतिकी की भाषा में एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है। यह वह क्रूर सत्य है जिसे इल्या प्रिगोजिन ने दशकों पहले समझाया था, लेकिन जिसे एमबीए की किताबों ने बड़ी चालाकी से छुपा दिया। यदि आप किसी तंत्र में ऊर्जा डालना बंद कर देते हैं, तो वह बिखर जाता है। आपकी ‘नौकरी’ दरअसल उस बिखराव को रोकने के लिए दी जाने वाली ‘नेगेटिव एंट्रॉपी’ की एक मासिक किश्त है। हम सब बस एक गिरती हुई दीवार को सहारा देने वाले मजदूर हैं। कितना अजीब है न?

भ्रम (मजदूरी का छलावा)

हर सुबह जब मैं उस सड़े हुए दफ्तर की सीढ़ियां चढ़ता हूँ, तो लिफ्ट के दरवाजे खुलते ही मुझे वहां की कृत्रिम हवा में केवल ‘एन्ट्रॉपी’ की दुर्गंध आती है। हम अक्सर ‘कॉर्पोरेट कल्चर’, ‘टीम स्पिरिट’ और ‘एम्प्लॉई लॉयल्टी’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ताकि हम उस सड़ांध को ढक सकें जो हर संगठन के भीतर स्वाभाविक रूप से पैदा होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो एक कंपनी बस एक ऐसी मशीन है जो मानव श्रम, जवानी और समय रूपी ‘कम एंट्रॉपी’ वाली ऊर्जा को सोखती है और बदले में तनाव, कचरा, कार्बन और फालतू की ईमेल्स रूपी ‘उच्च एंट्रॉपी’ बाहर निकालती है।

आपकी स्थिति उस पुराने स्मार्टफोन की बैटरी जैसी है जिसे फेंका जाना तय है। शुरू में वह पूरे दिन चलती है, फिर धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य गिरने लगता है। आप कितना भी ‘वेलनेस प्रोग्राम’ चला लें या रंगीन गुब्बारे लगा लें, लिथियम-आयन के भीतर का रसायन शास्त्र हार मानता ही है। ठीक वैसे ही, जब किसी कंपनी का एचआर विभाग ‘रंगोली प्रतियोगिता’ या ‘पिज़्ज़ा पार्टी’ करवाता है, तो वह दरअसल सिस्टम में थोड़ा सा नेगेन्ट्रॉपी (Negentropy) ठूँसने की कोशिश कर रहा होता है ताकि संगठन का ‘थर्मल डेथ’ (Thermal Death) कुछ हफ्तों के लिए टल सके। लेकिन याद रखिए, आप चाहे कितना भी ‘जुगाड़’ कर लें, बिखराव को टाला जा सकता है, रोका नहीं जा सकता। यह सब एक पागलपन है।

ऊष्मागतिकी (खून चूसने का गणित)

तकनीकी रूप से, एक सफल व्यवसाय वह है जो गैर-संतुलन (Non-equilibrium) की खतरनाक स्थिति में खुद को बनाए रखने में सक्षम हो। इसका मतलब है कि उसे लगातार बाहर से ‘व्यवस्था’ (Order) का आयात करना होगा और भीतर की ‘अव्यवस्था’ (Disorder) को बाहर फेंकना होगा। मध्यम स्तर के मैनेजर इसी काम के लिए बने हैं—वे ‘लीडर’ नहीं हैं, बल्कि वे ऊष्मा परिवर्तक (Heat Exchangers) हैं। वे ऊपर से आने वाले अराजक आदेशों को फिल्टर करते हैं और नीचे के कर्मचारियों के असंतोष को ‘फीडबैक फॉर्म’ के नाम पर डस्टबिन में डाल देते हैं। यह कोई प्रबंधन का सिद्धांत नहीं है, यह शुद्ध सांख्यिकीय यांत्रिकी (Statistical Mechanics) है।

यही कारण है कि आज के दफ्तरों में वे “एर्गोनोमिक कुर्सियाँ” रखी जाती हैं जो दिखने में किसी अंतरिक्ष यान के कॉकपिट जैसी होती हैं। कल मैंने एक ऐसी ही शानदार दिखने वाली लेदर ऑफिस चेयर देखी जिसकी कीमत तीन लाख रुपये से ज्यादा थी। तीन लाख? क्या यह कुर्सी बैठने वाले के पाप धो देती है या सीधे मोक्ष की प्राप्ति कराती है? इतनी कीमत में तो एक ईमानदार आदमी अपनी पूरी नैतिकता और रीढ़ की हड्डी बेच दे। लेकिन कॉर्पोरेट जगत इस तरह के महंगे ‘एन्ट्रॉपी सिंक’ पर पैसा बहाता है ताकि उसे लगे कि वह स्थिर है। सच तो यह है कि वह कुर्सी भी एक दिन टूटेगी, और उस पर बैठने वाला स्लिप-डिस्क के दर्द के साथ रिटायर होगा। इंसान की प्रेरणा केवल एक बैटरी है—जितना ज्यादा इस्तेमाल करोगे, उतनी ही जल्दी वह रिसाइकिल बिन में जाएगी। क्या बकवास है।

बाज़ार (नरक का निरंतर विस्तार)

बाज़ार दरअसल एक विशालकाय आग है जो केवल तभी तक जीवित है जब तक वह उपभोग की आहुति डालता रहे। स्थिरता एक मिथक है जिसे उन लोगों ने बुना है जो आपकी मेहनत की मलाई खाते हैं। जिसे हम ‘सतत विकास’ (Sustainable Growth) कहते हैं, वह केवल एक ढलान पर दौड़ते हुए आदमी की गति है—जब तक वह दौड़ रहा है, वह गिर नहीं रहा। जिस पल वह रुकने की सोचेगा, गुरुत्वाकर्षण और एंट्रॉपी उसे धूल चटा देंगे। व्यवसाय का गणितीय मॉडल कोई ‘ग्रोथ चार्ट’ नहीं है, बल्कि एक गैर-रैखिक अंतर समीकरण (Non-linear differential equation) है जहाँ चर (variables) हमेशा अनिश्चित रहते हैं।

अगली बार जब आप अपने बॉस को ‘सिनर्जी’ (Synergy) के बारे में बात करते सुनें, तो समझ जाइएगा कि वह बेचारा बस सिस्टम के बढ़ते हुए तापमान को कम करने के लिए अपने मुंह से हवा कर रहा है। हम सब इस ऊष्मागतिकी के जाल में फंसे हुए चूहे हैं, जो पहिए को जितनी तेजी से घुमाते हैं, उतनी ही अधिक ऊष्मा पैदा करते हैं। संसार की सारी व्यवस्थाएँ अंततः धूल में मिल जाएँगी। आप चाहे कितनी भी महँगी कलम से अपना भाग्य लिखें या कितने ही जटिल एल्गोरिदम से अपना साम्राज्य बनाएँ, थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम कभी नहीं हारता। वह हमेशा जीतता है, खामोशी से, हर बीतते सेकंड के साथ। बस, बहुत हुआ। घर जाने का वक्त हो गया है, हालांकि वहां भी सुकून नहीं है।

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