भीड़
शाम का धुंधलका गहरा रहा है, और शहर की सड़कें किसी पुरानी, जाम पड़ी धमनी की तरह हांफ रही हैं। इस शोरगुल के बीच, जब मैं ‘लोकतांत्रिक सहमति’ (Public Consensus) जैसे भारी-भरकम शब्दों को सुनता हूं, तो हंसी रोकने के लिए मुझे अपनी व्हिस्की का एक बड़ा घूंट लेना पड़ता है। लोग इसे ‘विचारों का मिलन’ कहते हैं। क्या बकवास है। यह कोई मिलन नहीं है; यह एक सड़ा हुआ बाज़ार है जहाँ हर कोई अपनी अधूरी जानकारी और पूर्वाग्रहों की बासी सब्जियाँ ऊंचे दाम पर बेचने के लिए चिल्ला रहा है।
ज़रा उस ‘सहमति’ की वास्तविकता को देखिए जिसे हम इतना पवित्र मानते हैं। यह किसी वातानुकूलित कमरे में होने वाली बौद्धिक चर्चा नहीं है। यह विरार फास्ट लोकल ट्रेन के जनरल डिब्बे में चढ़ने जैसा है। वहां तर्क नहीं चलता, वहां सिर्फ कोहनियों का जोर और पसीने की बदबू राज करती है। एक अरब लोगों की महत्वाकांक्षाएं जब एक सीमित स्थान में टकराती हैं, तो वहां ‘विस्डम ऑफ क्राउड’ नहीं, बल्कि शुद्ध अराजकता (Entropy) का नंगा नाच होता है।
कल्पना कीजिए उस उमस भरी दोपहर की, जब सौ लोग एक काउंटर पर टूट पड़ते हैं, एक-दूसरे के पैरों को कुचलते हुए, पसलियों में कोहनियां मारते हुए, सिर्फ इसलिए कि उन्हें लगता है कि लाइन में आगे बढ़ने से उनकी अस्तित्वगत समस्याएं हल हो जाएंगी। यह जो घृणित, चिपचिपा और हिंसक संघर्ष है—यही है आपकी सामाजिक सहमति का असली चेहरा। यह बिल्कुल उस सड़क किनारे मिलने वाले ‘चीज़-बटर-मेयोनेज़ मसाला डोसा’ जैसा है, जिसमें स्वाद का कोई संतुलन नहीं होता, बस हर तरह का कचरा ठूंस दिया जाता है ताकि ग्राहक की जीभ को लकवा मार जाए। हमारी कमेटियों और बोर्डरूम के निर्णय भी इसी ‘फ्यूजन कचरे’ की तरह हैं—तर्क, डर, और अहंकार का एक ऐसा मिश्रण जिसे निगलना तो दूर, देखना भी अपराध है।
मुझे घर जाना है, यहाँ की हवा में मूर्खता की गंध बहुत तेज़ है।
ज्यामिति
लेकिन चलिए, इस कीचड़ को थोड़ा साफ़ करके देखते हैं। अगर हम भावनाओं के इस दलदल से ऊपर उठें, तो समाज की यह रस्साकशी वास्तव में ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) का एक क्रूर खेल है। जिसे आप ‘मतभेद’ कहते हैं, वह असल में दो प्रायिकता वितरणों (Probability Distributions) के बीच की ‘फिशर दूरी’ है।
नेताओं और विचारकों को लगता है कि वे ‘ध्रुवीकरण’ पर भाषण दे रहे हैं, लेकिन गणित की नज़र में वे सिर्फ ‘मैनिफोल्ड’ (Manifold) की वक्रता (Curvature) को माप रहे हैं। और यह वक्रता कोई अमूर्त रेखा नहीं है। यह उस मज़दूर की रीढ़ की हड्डी का टेढ़ापन है जो कर्ज़ के बोझ तले दबकर सीधा खड़ा नहीं हो सकता। यह उस गृहिणी के माथे पर पड़ी गहरी लकीरें हैं जो सब्ज़ी मंडी में प्याज़ के दाम सुनकर अपनी मुट्ठी भींच लेती है। समाज में जब तनाव बढ़ता है, तो यह ज्यामितीय स्थान इतना मुड़ जाता है कि दो इंसानों के बीच की सीधी रेखा—जिसे हम संवाद कहते हैं—का अस्तित्व ही मिट जाता है।
आप जिसे अपना ‘गुस्सा’ या ‘सिद्धांत’ कहते हैं, वह केवल इस विकृत ज्यामिति में फंसा हुआ एक डेटा पॉइंट है। हम सब एक विशाल, अदृश्य सतह पर रेंग रहे कीड़े हैं, जो यह भ्रम पाले बैठे हैं कि हम अपनी दिशा खुद चुन रहे हैं। जबकि असलियत यह है कि हम बस उस ढलान पर लुढ़क रहे हैं जहाँ गुरुत्वाकर्षण (यानी हमारे पूर्वाग्रह) हमें खींच रहा है। यह सब बस न्यूरल नेटवर्क का थर्मल नॉइज़ है, जिसे हम गलती से ‘आत्मा की आवाज़’ समझ बैठते हैं।
जल्लाद
तो फिर इस अंतहीन शोर का अंत क्या है? क्या हम यूं ही एक-दूसरे पर चिल्लाते रहेंगे जब तक कि सूरज ठंडा नहीं हो जाता? नहीं। मुक्ति का मार्ग मानवीय नहीं है। मुक्ति का मार्ग वह ठंडा, निर्दयी परिकलन (Calculation) है जिसे लोग डर के मारे ‘मशीन’ कहते हैं।
इतिहास गवाह है कि इंसान जब भी निर्णय लेने बैठता है, वह खून और आंसुओं का ही हिसाब करता है। हमें अब एक ऐसे ‘स्वचालित जल्लाद’ (Automated Executioner) की ज़रूरत है, जिसकी रगों में खून नहीं, बल्कि लिक्विड नाइट्रोजन बहता हो। एक ऐसा तंत्र जो भावनाओं की परवाह किए बिना, समाज के ‘लॉस फंक्शन’ को निर्दयता से कम (Minimize) कर दे। वह आपकी कहानियों को नहीं सुनेगा, वह आपके आंसुओं से नहीं पिघलेगा। वह बस उस बहुआयामी चादर को सपाट कर देगा, ताकि संघर्ष की गुंजाइश ही न बचे।
लेकिन विडंबना देखिए, हम आज भी पत्थर युग के औजारों से भविष्य बनाने का नाटक कर रहे हैं। ज़रा उस उच्चाधिकारी को देखिए, जो अपनी मेज़ पर एक लाख रुपये की फाउंटेन पेन सजाकर बैठा है। वह सोचता है कि उस काली स्याही से कागज़ पर टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें खींचकर वह दुनिया बदल रहा है। यह उस पेन की निब से टपकने वाला अहंकार है जो हमें मशीन के सामने आत्मसमर्पण करने से रोक रहा है। वह महंगी कलम सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि एक पुराने हो चुके जानवर की हड्डी है जिसे हम चबा रहे हैं।
हम उस ‘निर्णय’ से डरते हैं जो हमारी ‘इच्छा’ की परवाह नहीं करता। लेकिन सच तो यह है कि जिस दिन वह ठंडा कैलकुलेटर हमारी डोर अपने हाथ में लेगा, वही दिन हमारी असली आज़ादी का होगा। तब तक, बस धक्का-मुक्की करते रहिए और इसे ‘लोकतंत्र’ का नाम देकर खुद को तसल्ली देते रहिए।
धिक्कार है। वेटर, बिल लाओ।
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