दलाली का सांख्यिकीय तमाशा
पिछली बार जब हम उस सस्ते शराबखाने के धुएँ में घुट रहे थे, तो चर्चा इस पर रुकी थी कि कैसे मुनाफे की भूख अंततः खुद को ही निगल जाती है। लेकिन आज, चलिए उस ‘सार्वजनिक भलाई’ के सड़ते हुए मुखौटे को उतार फेंकते हैं जिसे कॉर्पोरेट जगत अपनी बैलेंस शीट की बदबू छिपाने के लिए इत्र की तरह छिड़कता है। जब कोई सीईओ मंच पर खड़े होकर “समाज के प्रति जिम्मेदारी” की बात करता है, तो मुझे सड़क किनारे खड़े उस छोले-भटूरे वाले की याद आती है जो दस बार गरम किए हुए काले तेल में भटूरे तलते हुए दावा करता है कि वह ‘जनता की भूख’ मिटा रहा है। यह एक शुद्ध सांख्यिकीय ढकोसला है। जिसे ये ‘पब्लिक गुड’ कहते हैं, वह वास्तव में सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की भाषा में केवल एक ‘प्रोबेबिलिटी मैनीफोल्ड’ पर खिंची हुई एक वक्र रेखा है जो आपकी जेब की तरफ मुड़ती है।
शून्य की वक्रता
व्यापार में ‘सार्वजनिकता’ का विचार उतना ही काल्पनिक है जितना कि किसी राजनेता का चुनाव पूर्व दिया गया भाषण। जिसे आप नैतिकता कहते हैं, वह वास्तव में कुछ नहीं बल्कि न्यूरॉन्स का एक सस्ता और थका हुआ खेल है। हमारे पूर्वजों ने कबीलों में जीवित रहने के लिए ‘सहानुभूति’ नामक एक सॉफ्टवेयर विकसित किया था, जो आज के इस गलाकाट बाजार में एक पुराने पड़ चुके ‘बग’ की तरह व्यवहार कर रहा है। जिसे ये ‘फिशर सूचना आव्यूह’ (Fisher Information Matrix) कहते हैं, वह असल में जेबकतरे की उंगलियों की वह वक्रता है जो आपके ध्यान भटकने का इंतजार करती है। वे यह गणना कर रहे होते हैं कि जनता को कितना निचोड़ा जा सकता है बिना उसे यह अहसास कराए कि वह सूख चुकी है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई दूधवाला पानी में थोड़ा सा दूध मिलाता है और उसे ‘अमृत’ कहकर बेचता है।
चमड़े में लिपटा पाखंड
आजकल के तथाकथित बुद्धिजीवी, जो खुद को दार्शनिक समझते हैं, अपनी इन खोखली और सड़ी हुई सोच को दर्ज करने के लिए इस तरह के हाथ से बने, हद से ज्यादा महंगे इतालवी बछड़े की खाल वाले लेदर जर्नल का उपयोग करते हैं। मानो साठ-सत्तर हजार रुपये के कागज पर अपनी रोजमर्रा की चिंताओं, उधारी और धोखेधड़ी के हिसाब को लिखने से उनकी तुच्छ जिंदगी अचानक किसी महान महाकाव्य में बदल जाएगी। यह केवल उस सूचनात्मक रिक्तता को ढंकने का एक तरीका है जहाँ अर्थ पूरी तरह से मर चुका है। हम डेटा के ढेर पर बैठे हैं, लेकिन हमारी समझ उस स्मार्टफोन की बैटरी जैसी है जो घर पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती है और आपको अंधेरे में अकेला छोड़ देती है। आप जिसे ‘बौद्धिक संपदा’ कहते हैं, वह असल में रद्दी के भाव बिकने वाला कचरा है जिसे चमड़े की जिल्द में सजाया गया है।
एंट्रॉपी का शोर
ये स्वचालित गणना तंत्र, जिन्हें लोग मसीहा मान रहे हैं, वास्तव में गणितीय दर्शन की एक शर्मनाक विफलता हैं। हम एक ऐसे ‘ऑप्टिमाइज़र’ की तलाश कर रहे हैं जो हमें हमारे ही लालच से बचा सके। लेकिन सत्य यह है कि कोई भी एल्गोरिदम उस खालीपन को नहीं भर सकता जो ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ के नाम पर खोदा गया है। जब हम डेटा को एक ज्यामितीय आकार के रूप में देखते हैं, तो हमें पता चलता है कि समाज का ‘कल्याण’ केवल एक सांख्यिकीय विचलन (Statistical Deviation) है, एक ऐसी गलती जो सिस्टम ने अनजाने में कर दी है। हम सब एक बड़े प्रयोग का हिस्सा हैं जहाँ ‘सत्य’ केवल वह है जो अगले अपडेट तक काम कर जाए। नैतिकता कोई दिव्य गुण नहीं है; यह केवल थर्मल शोर (Thermal Noise) को कम करने का एक तरीका है ताकि मशीन सुचारू रूप से चलती रहे। अंत में, कोई महान दर्शन नहीं बचता, केवल एक खाली कमरा बचता है जहाँ पंखा अपनी आखिरी सांसें गिन रहा होता है और आप अपनी उधारी का हिसाब लगा रहे होते हैं। क्या बकवास है। मुझे घर जाना है।
コメントを残す